शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

गणेश ज्यू विसर्जन देव भूमि मे ठीक न्हैती

खोली का गणेशा का उत्तराखंड मे विसर्जन ठीक न्हैंती


खोली का गणेशा
तुम चुप किले छा?
गध्यारोंक किनार मे
य हाल किले करछा?

बैई तलक त
घरक खोली में विराजमान छ्या,
फूल चढ़ै, दीप जलै,
मोदक क भोग लगै,
आरतीक थाल सजै,
हर ओर बस एकै आवाज छी
“खोली का गणेशा,
गणपति बप्पा मोरया!”

बप्पा है सुख माँगछा,
बुद्धि माँगछा,
घरक मंगल माँगछा,
दुख-दरिद्र दूर करणी
हाथ जोड़िक विनती करछा।

फिर विसर्जनक बाद
य कस सम्मान छ?
य कस भक्ति छ?

गध्यारक किनार
कैं टूटी सूँड़ पड़ी रै,
कैं हाथ टूटि रै,
कैं मुकुट बिखरि रै,
फूलनक माला सड़ि रै,
अर रंग-बिरंगी मूर्ति
टुकड़ा-टुकड़ा है रै।

हे खोली का गणेशा!

तुम त बुद्धिक देवता छा,
विघ्नहर्ता छा,
मंगलकर्ता छा—
विसर्जन करला तो 
फिर हमर बुद्धिक ले
विसर्जन है जाल?

जो हाथोंल
तुमैरि पूजा करी,
उई हाथ
विसर्जन बाद
तुमार मूर्ति के
गध्यारक किनार छोड़ि आछा

पूजा करण भक्ति छ,
पर पूजा बाद सम्मान बचूण
सच्ची श्रद्धा छ।

माटीक गणेशा
माटी मेँ मिलि जाल,
पर प्लास्टर और जहरील रंग
गध्यार-पानी मेँ घुल जाल
माछी-पंछी और प्रकृति क
दुख दी जाल।

गणेश त मंगल करनी  
गध्यार म्याल नि करन

आओ, अब संकल्प करूं—
खोली का गणेशा
श्रद्धा सँग घर ल्याऊं,
माटीक प्राकृतिक मूर्ति सजाऊं,
पर विसर्जन नी करु
 आपणि गध्यार-कुंण,
अपणी धरती-माटी क
मैल नि करूं।

क्येलैकि—

खोली का गणेशा
सिर्फ मूर्ति नि,
हमर आस्था छ,
हमर संस्कृति छ,
हमर घरक मंगल छ।
किले निष्कासित
इतू अपमानित।
कब तक चलल
य पाखंड?

आओ मिलकर करुल  य संकल्प
अब नि  करुल गणेश ज्यू विसर्जन
उके प्रति वर्ष संवारुंल
नई रंगोंल सजोंल
क्येलेकि हमार खोली क गणेश न्हैती  विसर्जन छवि
छ प्रेम प्रतिष्ठा क अक्षय निधि।

विसर्जन बप्पा क विदाई छ,
बप्पा क सम्मान क अंत न्हैति

माटी मे मिलि जाल बप्पा,
पर संदेश छोड़ि जाल—

बुद्धि बचौ,
प्रकृति बचौ,
आस्था बचौ।

खोली का गणेशा मोरया!
मंगल मूर्ति मोरया!
अगले बरस फिर आना—
पर संग हमरि
सद्बुद्धि लै ल्या
देव सती पहाड़ी बटोही

रविवार, 23 अगस्त 2026

हम वो पीढ़ी हैं.... भुला

हम वो पीढ़ी हैं… भुला
जिसने
पाथर के मकान को चूगंते देखा
पाल को गोठ जाते देखा 
हम वो पीढ़ी हैं भुला
जिसने दो-दो जमाने देखे
कभी फटी कमीज में ठिठुरे
आज ब्रांडेड कपड़े पहने देखे
फटी पैंट में भी छः-छः टाल लगाए
फिर भी ठाठ से गाँव में घूमे किसी से न शरमाए!

दस पैसे, बीस पैसे चवन्नी-अठन्नी चलते देखा
एक पैसे की टॉफी खातिर,
दुकानदार से झगड़ते देखा।

गुड़-चीनी के साथ रोटी खाई
उसे भी मिठाई समझ के खाई।

मड़ुवक रोट में क्वर-नूण
वाह क्या स्वाद निराला
आज पिज्जा-बर्गर खा रहे
फिर भी मन ढूँढे वही निवाला।

मिट्टी तेल का लम्फू जलाया
धुआँ आँख में खूब समाया
छिलुक की मशाल हाथ में लेकर
रात में रामलीला देख के आया।

स्यूत से बादाम खाते देखा
जेब में पैसा भले न था
फिर भी अपने को राजा देखा।

स्लेट-खड़िया-कमेट बाँस की कलम
मास्टर जी की डाँट सुनी
गलती पर कान भी खिंचे
मासाब ने सिसूण भी झपकाया
फिर भी पढ़ाई खूब करी।

कापी-किताब हाथ में आई
फिर बस्ता भारी हो गया
अब मोबाइल इतना भारी है
जिसमें पूरा संसार हो गया।

लैंडलाइन की घंटी बाजी
घर का हर सदस्य दौड़ा
किसका फोन है? किससे बात की?
पूरे गाँव को पता हो गया।

अब WhatsApp में हैलो
आया
नीली टिक ने चैन चुराया
देख लिया फिर जवाब नहीं
इसने नया झगड़ा खूब कराया।

चिट्ठी का इंतजार किया
पोस्टमैन जब गाँव में आया
नाम पुकारते ही आँगन में
पूरा परिवार दौड़ा आया।

ब्लैक-एंड-व्हाइट टीवी देखा
एंटीना घुमा-घुमा थके
चित्र साफ हो जाए भुला
तो सारे घर वाले खुशी से झूमे।

रामायण जब टीवी पर आती गली-मोहल्ला खाली होता जिसके घर टीवी होता  
वो आदमी सबसे निराला होता।

आज मोबाइल की छोटी स्क्रीन में
सैकड़ों चैनल आ गए
पर तब एक ही दूरदर्शन था
फिर भी हम खुशहाल कहलाए।

एक रुपये के छुट्टे खातिर
दुकानदार संग बहस करी
कल दे दूँगा कहकर हमने
कई बार उधारी भी करी।

अब UPI का QR आया
न सिक्का दिखा न नोट दिखाई
स्कैन किया और पैसा गया
वाह रे कैसी तरक्की आई।

रेडियो से सारी खबरै सुनी
अब Google, AI सब बैठे
जेब के अंदर ज्ञान समाया
भुला आज मौसम कैसा है
मोबाइल ने तुरंत बताया।

पहले खेतों में बैल चले
अब मशीनें खेत में दौड़ पडे़
पहले गाँव की पगडंडी थी
न कोई ट्रैफिक न जाम था
फिर भी जीवन मे आराम था
न Facebook न Instagram
न Reels का कोई झमेला था
चौराहै में बैठा हर बंदा
खुद ही अपना चैनल था।

पहले सुख-दुख साँझे होते
बिन बुलाए लोग चले आते
आज पड़ोसी घर में रहते
WhatsApp पर हाल पूछ जाते

पहले दूध की लौटि आती
दही-मट्ठा घर में बनता था
अब पैकेट वाला दूध देखकर
गाँव का बचपन मुस्काता है।

सच कहूँ तो हम है भाग्यशाली
दो-दो दुनिया देखी हमने
पुरखों वाली सादगी देखी
तकनीकी रफ्तार भी देखी हमने

न हम पूरे पुराने निकले
न पूरे नए हुए
समय के साथ चलते-चलते
हम खुद ही किस्से बन गए।

उम्र भले आधी सदी की ओर चली
दिल अब भी पहाड़ी जवान है।

अपने  गाँव की यादें बाकी
और जिंदगी का सफर अभी महान है।

न जाने कल कौन सा जमाना आएगा 
जमाना क्या-क्या रंग दिखाएगा।
 
जय पहाड़ जय पहाड़ी पन
पुराना दौर गया सही
पर उसकी खुशबू आज भी मन में जिंदा है भुला।

बस एक तमन्ना है इस उम्र के पड़ाव पर
तकनीक चाहे जितनी आगे बढ़ जाए
हमारे पहाड़ का अपनापन
गाँव की मिट्टी की खुशबू
और रिश्तों की गर्माहट
कहीं पीछे न छूट जाए भुला।

देव सती पहाड़ी बटोही

सोमवार, 17 अगस्त 2026

घी संक्रान्ति

पलायन क कारण उत्तराखण्ड में त्यारों की वास्तविकता पर  कुमाउनी रचना______
*कलम क गलती माफ करिया*
*दिल दुखुणक विचार न्हैं*!
*म्यर लैखी भल लागों त शेयर करणि मददगार चै*!!
नै दूध , नै दै,  नै ग्वोंठ,  नै गौरु!
नै बाड़ , नै ख्वाड़,  नै पिनाऊ ग्वाब!
त्याग हैलि खेत हमूंल 
नै जू रै ग्यो ,नै हॉव ,नै हैय्यी ,नै हलकार!
नै नय्यी, नै ठय्योक ,नै मण, नै नाई ,नै नॉव ,नै पन्यार!
काबटि मनूंछा घ्यू त्यार!
कुडि़   गड़ भिड़ छोडि़  सबैं न्हैगी भ्यार!
त्याग हैलि संस्कृति और सभ्यता
पर्वों में मतिहीनता दैखू रई!
फेसबुक व्ट्सअप में हैपी हैपी लेखि सब त्यार मनूंरई!
सबैं  प्रिय बंधुओ कें
घ्यू त्यारै क बधाई.!!
_______________देव सती

घ्यू त्यार

पलायन क कारण उत्तराखण्ड में त्यारों की वास्तविकता पर  कुमाउनी रचना______
*कलम क गलती माफ करिया*
*दिल दुखुणक विचार न्हैं*!
*म्यर लैखी भल लागों त शेयर करणि मददगार चै*!!
नै दूध , नै दै,  नै ग्वोंठ,  नै गौरु!
नै बाड़ , नै ख्वाड़,  नै पिनाऊ ग्वाब!
त्याग हैलि खेत हमूंल 
नै जू रै ग्यो ,नै हॉव ,नै हैय्यी ,नै हलकार!
नै नय्यी, नै ठय्योक ,नै मण, नै नाई ,नै नॉव ,नै पन्यार!
काबटि मनूंछा घ्यू त्यार!
कुडि़   गड़ भिड़ छोडि़  सबैं न्हैगी भ्यार!
त्याग हैलि संस्कृति और सभ्यता
पर्वों में मतिहीनता दैखू रई!
फेसबुक व्ट्सअप में हैपी हैपी लेखि सब त्यार मनूंरई!
सबैं  प्रिय बंधुओ कें
घ्यू त्यारै क बधाई.!!
_______________देव सती

शुक्रवार, 14 अगस्त 2026

स्मृति1996का15अगस्त

🇮🇳 1996 का वो 15 अगस्त… 🇮🇳

जब से मुझे याद है, स्वतंत्रता दिवस की पहली धूमिल-सी याद प्राइमरी पाठशाला घिंगारी की है, जब मैं कक्षा तीन में पढ़ता था।
उम्र छोटी थी, इसलिए उस दिन की बहुत-सी बातें अब धुंधली हो चुकी हैं, लेकिन कुछ तस्वीरें आज भी मन में ताजा हैं—स्कूल का छोटा-सा मैदान, बच्चों की कतार, तिरंगा, प्रार्थना और गूंजते हुए नारे—“भारत माता की जय!”
“वंदे मातरम्!”
“जय हिंद!” 🇮🇳
उस समय आज़ादी का अर्थ पूरी तरह समझ नहीं आता था, बस इतना पता था कि तिरंगा हमारा है और भारत हमारा देश है।
और फिर आता था सबसे खास पल—स्कूल में मिलने वाली वो गोल खट्टी-मीठी टॉफी। 
आज सोचता हूँ तो लगता है, मिठाई कितनी छोटी थी, लेकिन खुशी कितनी बड़ी थी।
न मोबाइल था, न सेल्फी, न सोशल मीडिया।
हम तस्वीरें कम खींचते थे, लेकिन यादें बहुत बनाते थे।
आज भी 15 अगस्त आते ही वो स्कूल, वो दोस्त, वो शिक्षक, वो तिरंगा और वो टॉफी याद आ जाती है। समय बदल गया, बचपन पीछे छूट गया, साथी अपनी-अपनी राह चले गए… लेकिन 1996 का वो 15 अगस्त यादों में आज भी वैसा ही है।
आज तिरंगा देखकर उन सभी वीरों को नमन करता हूँ, जिनके बलिदान से हमें आज़ादी मिली।
भारत माता की जय!
वंदे मातरम्!
जय हिंद! 🇮🇳
तब हाथ में एक छोटी-सी गोल टॉफी थी,
आज हाथ में उसकी मीठी याद है। पुनः आप सभी को स्वतंत्रता दिवस कि हार्दिक शुभकामनॉयें जय हिंद🇮🇳
देव सती पहाड़ी बटोही

शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

कुमाऊँ क्षेत्र के भूले-विसरे रिति रिवाज



     पहाडों में 'धन्यवाद'  जैसा कोई शब्द नहीं होता  था । किसी ने एहसान या मदद कर दी तो उसके बदले कहा जाता था - तुमर भल हैजौ , तुमार नानतिन बची रून , तुमार खुटन कान् ले झन बुडो़ , अगर एहसान ज्यादा ही हुवा तो कहेते थे   तुमरि एकै एक्कीस / पांचै पंच्चीस हैजौ, जै जै कारी हैजौ । बाद में जब धन्यवाद शब्द चलन में आया तो शुरु में लोग मजाक में कहते ... हैगोय यो धणियोंपात रूण दिओ ।
          अब बात करते हैं मिठाई की ... मिठाई का मतलब गुड़ होता था ... लोग कहा करते थे ... पास हैगो बल तुमर च्योल ... गूड़ खवाओ . यहां भी जवाब में धन्यवाद नहीं कहा जाता था ... कहते ... होय हैगोपै  तुमार आशीर्वादल ... घर आया   एक आंगू पिठ्या लगै ल्हिजया और गूड़ ले खै जया ... हर खुशी के मौके पर गुड़ बाटा जाता था और बधाई देने आये ब्यक्ति या महिला को पिठ्या ( टीका ) भी लगाया जाता ... कई बार अगर दोपहर या शाम को लोग बधाई देने किसी के घर जाते तो वहां पिठ्या लगता ... तो वापस जाने पर रास्ते में लोग पूछते कि - के बात  आज बड चर-बर पिठ्या लगै राखौ ... चर बर मतलब लम्बा चौडा  चटक गहरा ... वह बताता ... अरे फलाने का नाती हुवा है, वहां गया था ... इससे एक बात और होती कि लोगों को धीरे धीरे ये खुशखबरी मिल जाती,  लोग अपने आप बधाई देने निकल पडते बधाई देने को - *भलि भट्यूण* कहते थे । बधाई शब्द भी प्रचलन में नहीं था ... बधाई  के लिए प्रयुक्त होता - भल भै तुमर नाति हैगो , भल भै तुमर च्योल पास हैगो, भल भै तुमर च्योलक ब्या ठैरी गो ... जवाब वही होता ... होय यो सब तुम लोगनक आशीर्वाद छू।  कल्पना कीजिए  बधाई है - धन्यवाद की जगह जब इन आत्मीयता वाले शब्दों का प्रयोग होता होगा, तो कितना सुख कितने अपनेपन का अहसास होता होगा । किसी के पास होने पर , लड़का , लड़की होने पर , बच्चों की शादी तय होने पर , शादी हो जाने पर , नौकरी लगने पर, जनेऊ होने पर , किसी का लापता सदस्य पुन: घर वापसी पर ... भलि भट्याने का प्रचलन था, वो भी उसके घर जाकर । इसके लिए कुछ अच्छे वार (दिन) तय थे ... शनिवार  व मंगलवार भलि भट्याने के लिए वर्जित थे । घर वाले भी अनुमान लगाते कि आज मंगल है कोई नहीं आएगा फलां काम निपटा लो  या आज भल वार छू , मैंस भल भट्यूणहुं आल ... आज घरै रया सब लोग साथ में जब भल भट्याने  आते तो, चाय की केतली पूरे दिन के लिए  रौन पर चढ जाती, घर के सारे सदस्य आवभगत में लग जाते, महिलाऐं भीतर चाय पानी पीती बडे़ बुजुर्ग  आये होते तो चाख में उनके लिए  ह्वाक चिलम में तम्बाकू कोयले सज जाते ... एक बात और होती, जिसके यहां परिवार छोटा हो या घर में महिला एक ही हो तो वहां पर भल भट्याने आई महिलाएं मदद भी करती थी, जैसे चाय बनाना,  गायों को पानी देना आदि क्योंकि घर की गृहणी तो मेहमानों को पौ - पिठ्या लगाने, गूड़ बाटने में ही लगी रह जाती . यहीं पर अगर किसी के घर बाल बच्चा हुवा हो तो घर की मुखिया गृहणी भलि भट्याने आई महिलाओँ  को शाम को आकर गीत गाकर जाने का न्योता भी दे देतीं यहीं पर दुणआँचव के कुछ पैसे और एक कागज की पुडिया में घर के लिए गुड दे दिया जाता । बडे बुजुर्ग व जवान लोग चर्चा करते नामकरण में कतु आदिम खवाला, हमार हातक जो काम होल बताया । क्वे नानतिनाक हात ले जवाब भेज दिया,  उसिक हम बीच बीच में आते रूल ... आज की तरह नहीं होता कि - पार्टी कब दे रहे हो ... शाम को कहां मिलोगे ... तब ये चीजे निषेध थीं । 
तब एक परम्परा और भी थी - किसी कन्या के जन्म के बाद लडका हो गया तो  उसकी लड़की को शकुन्नी समझा जाता और उसकी पीठ पर गुड़ की भेली फोडी जाती । यदि परिवार में बार दिनी बिरादरी में  या नजदीकी रिश्तेदारी में एकसाथ दो बच्चे   नामकरण की अवधि तक पैदा हो गये तो उन बच्चों को औ-छौ कहा जाता था बाद में एक छोटा सा प्रोग्राम करके उनके कपडे-धागुले वगैरह आपस में बदले जाते ... इस कार्यक्रम को औ-छौ बाटना कहा जाता था इसे कुछ कुछ दो समधनों के समद्योड कार्यक्रम जैसा ही समझिये । 
      मुझे तो लगता है कि हमारे बुजुर्गों ने जिस प्रकार ये रीति रिवाज बनाये होगे उनका मकसद यही रहा होगा कि लोगों की आपस में आत्मीयता बढे, एक दूसरे की मदद की भावना आये , सभी एक दूसरे की खुशियों को अपना समझकर साझा करें । आज के व्यस्त समय में कुछ कोशिश कर हम इन परम्पराओं को जीवित रख सकें तो बहुत ही अच्छा होगा ... आज तो हम यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि फलां ने मुझे बताया थोडी , मुझे बुलाया ही नहीं ... मैं क्यों जाऊ .. या रास्ते में मिला था बधाई दे तो दी । 
आगे को व नई पीढ़ी को जरूर भेजना 
शुभं भवतुः सर्वदा

सोमवार, 20 जुलाई 2026

भजन


मेरा एक साथी है... बड़ा ही भोला भाला है...
मेरा एक साथी है बड़ा ही भोला भाला है,
मिले न उस जैसा वो जग से निराला है।
जब-जब दिल ये उदास होता है,
मेरा मुरली वाला मेरे पास होता है।
मेरा एक साथी है बड़ा ही भोला भाला है।
जब तक रहा अकेला बड़ा दुःख पाया मैं,
जब-जब दुःख ने घेरा तो घबराया मैं।
ये सारी दुनिया में कन्हैया का सहारा है,
मिले न उस जैसा वो जग से निराला है।
जब-जब दिल ये उदास होता है,
मेरा मुरली वाला मेरे पास होता है।
मेरा एक साथी है बड़ा ही भोला भाला है।
सब कुछ बदल गया है उसके आने से,
हिम्मत आई है उसके समझाने से।
हँसा मैं जब-जब भी उसी ने तो निकाला है।
जब-जब दिल ये उदास होता है,
मेरा मुरली वाला मेरे पास होता है।
मेरा एक साथी है बड़ा ही भोला भाला है।
नई-नई पहचान बदल गई रिश्तों में,
बनवारी मेरा सौदा पट गया सस्ते में।
गिरा मैं जब-जब भी उसी ने तो संभाला है।
जब-जब दिल ये उदास होता है,
मेरा मुरली वाला मेरे पास होता है।
मेरा एक साथी है बड़ा ही भोला भाला है।

शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

जिंदगी रहते रहते बुजुर्गों की सेवा कर लो और अपना अभिमान उनके चरणों मे रख दो

जिंदगी रहते-रहते बुजुर्गों की सेवा
जिंदगी रहते-रहते अपनों का मान कर लो,
माँ-बाप, बुजुर्गों का थोड़ा सम्मान कर लो।
जब तक सिर पर उनका साया बना हुआ है,
उनके चरणों में अपना अभिमान धर लो।
कल तस्वीरों पर फूल चढ़ाने से क्या होगा,
आज उनके संग दो पल बैठकर प्यार कर लो।
दवा से पहले मीठे बोलों की ज़रूरत होती है,
उनके चेहरे पर मुस्कान का उपहार कर लो।
समय का पहिया कब किस ओर मुड़ जाए कौन जाने,
जो करना है, आज ही दिल से कर लो।
क्योंकि... चिता की आग से पहले,
जीते-जी सेवा का दीप जलाना सीखो।
श्रद्धांजलि से बड़ा पुण्य,
बुजुर्गों की मुस्कान है।
अम्मा आपको श्रद्धांजलि

बुधवार, 15 जुलाई 2026

हरेला

🌿 हरेला 🌿
ग्य जौ अर घ्व्ग का बीज
यैल हर्याव शुरू होल।
डालि म बोई जाल
नौ दिन अँन्यार मे रौल।
फूलदेई, होली क ज
किसाणक यो त्योहार छ।
हमरि संस्कृति रीत-रिवाज
सबक आधार हर्याव छ।
अन्न-धन अर सुख-समृद्धि
हर्याव क चिन्ह माणी जाल।
बड़-बुजुर्ग आशीष द् याल
जीवन हरियाल बणाल
नौ दिन बाद पतीशी जाल
देवता लै पैलि चढ़ाल।
तिलक, अक्षत, चन्दन लगैबैर
घर-घर प्रसाद बाँटि जाल
आओ सब मिलि प्रण करौं
एक-एक पेड़ जरूर लगौल।
फोटो खींचण भूल नि जौल
उकै पाणी द् योल, संभालूल।
हर साल पेड़ त लगांल
पर बचांई कतू जांल?
य बात सब कै समझौल
धरती मैया क ऋण चुकौल।
हरेला क पावन दिन मे
धरती मैया क श्रृंगार करौल।
हरिया उत्तराखण्ड बणौल
आण वाली पीढ़ी लै उपहार 
द् योल ।
🌿 आपूं सबों कै हरेला पर्व की हार्दिक बधाई! 🌿
सिर्फ़ पेड़ लगौण काफी नि छ
उकै बचौण, पाणी दिण और पालण भी हम सबकी जिम्मेदारी छै।
 देव सती "पहाड़ी बटोही"

सोमवार, 13 जुलाई 2026

काश इस बार... (व्यंग्य कविता)




काश इस बार उत्तराखण्ड में ऐसी सरकार बने,
जो भाषण नहीं, हिसाब देने का साहस करे।
हर चुनाव में वही पुराना गीत—
शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार की बात,
जीत मिलते ही सब गायब,
जनता फिर अकेली रात।
विद्यालयों में ताले लटके,
अस्पतालों में डॉक्टर कम,
रोज़गार की राह न दिखी,
युवा भटकते कदम-कदम।
पलायन की पीड़ा पूछो,
सूने पड़े हैं गाँव,
नेता जी मंचों पर कहते—
"देखो, कितना हुआ विकास!"
घोषणापत्र में सपनों की खेती,
धरती पर सूखा हाल,
फीते कटते, फोटो छपते,
जनता पूछे—"काम का क्या हाल?"
नेता जी!
आप शासक नहीं, जनसेवक हैं,
इतना तो याद रखिए।
कुर्सी जनता की अमानत है,
इसे विरासत मत समझिए।
जिस दिन शिक्षा बिकना बंद होगी,
स्वास्थ्य भटकना छोड़ देगा,
रोज़गार घर-घर पहुँचेगा,
और पलायन रुक जाएगा—
उसी दिन जनता कहेगी,
"अबकी बार सचमुच सरकार बनी है,
सिर्फ़ सत्ता नहीं।"
पहाड़ी बटोही

रविवार, 12 जुलाई 2026

जून न्हैं गो

जून न्हैं गो, पहाडो़ं रौनक लै न्हैं गै
क्वैं शहर न्हैं गो, क्वैं भाबर न्हैं गो..
और दगाड़ में लि गई प्याज कट्ट, पूलम, खुमानी, बेडू, तिमिल फोटो खिचीं स्यट...
और जन तका कै गई, असोज में भेज दिया पिहव काकड़,लाल गदू, मूवक फांच...
उ आइ, कुछ दिन बढ़ें गई गौंनौं  मे चहल-पहल...
कुछ हमूहें सीख बैर, कुछ हमूहैं सीखें बैर...
सीख बैर गई आलू थैचूं और भट्टाक डूबुक बनूण , हमूकैं सीखैं बैर गई जन्मदिन-सालगिरह मनूण, रील-ब्लॉग बनूण, किटी पार्टी करण, कारों में, धारों में, गौंनौं क बजारु में...
देवी-देवताओं क मंदिरों में बजै गई घंटी, बतै गई इनर धार्मिक महत्ता... 
आपणि तो मजबूरी बतै बैर, समझै गई हमूकें क्यारीं, खेतबाड़ी, गौरु-भैंस पालण, स्वरोजगार क फैद...
बस कुछै दिन ठाड़ी रई, गौंनौंक तलि-मलि सारियों में लाल-सफेद चमचमान कार, जो सरपट दौड़बैर फिर आघिल क्वैं कामकाजों में आल, हमर हाथ ले बटाल...
आब हमर यकलैपन कें देख बैर, ऐ गै रिमझिम बरखा क बूंद, निकल ऐ गई घा कोंपल, डानूंक उड़ी कूहर...
आब तो छौय ले फूटाल, गध्यर लें पुकारंल, उनूकें तरसाल, हर्षाल, और फिर यई बूलाल...
जय देवभूमि, जय उत्तराखण्ड।
— देवसती पहाड़ी बटोही

शनिवार, 11 जुलाई 2026

"भल् जै के हूँ पै?"

टेक : "भल् जै के हूँ पै?"
श्रीमान हीराबल्लभ पाठक जी की पंक्तियों को आगे बढ़ाते हुये कुछ और आगे

बिदेश बसी च्यल असोजक कर्र्यल भल् जै के हूँ पै?
दबंग है अर्ज पधानक कर्ज
चटोर सैंणि द्व्ब लागणी मैंस
मतलबी यार दुख मैं फरार 
मोबाइलक नशा
भुली गै भाषा
रीलक शौक छुटिगै य लोक
दिखावक ठाठ,खाली बात
झूठी सान खोई पहचान
लोभक धन,बेचैन मन
उधारक ठाठ,घाटै घाट
काम बिना बात,दिनभर गप्प
नशेडी़ भाई,घरकि लड़ाई
ईजाक सीख,लागे अब फींक
बाज्यूक बात,छोड़दी जात
जंगल काट,सूखिगै गाड़
खेत बंजर,बैठो घरपर
दहेजक रीत,टुटिगै प्रीत
चुनावक वादा,भुलिगै इरादा
नेताक भाषण,खाली आश्वासन
घूसक चाल,जनताक हाल
मीठी बोली,भीतेर ठगी
नामक दान,मन मैं अभिमान
मेहनत छोड़,भाग्यक होड़
महँगो बजार,खाली उधार
रोजगार दूर,बैठो मजबूर
कागजक काम,चक्कर तमाम
अफसरक चाल,जनताक हाल
सिफारिस जोर,मेहनत कमजोर
झूठक साथ,बिगड़िगै बात
दिखावक मान,खाली सम्मान
धनक घमण्ड,टुटिगै सम्बन्ध
ईजा अकेले,च्यलक खेल
बाज्यूक आस,फोनक विश्वास
भाषाक लाज,भुलिगै आज
अपणि रीत,छोड़िगै प्रीत
फोटो हजार,सेवा बेकार
कुर्सीक प्यार,जनता बेकार
दूसरक दोष,अपणो नै होश
धर्मक नाम,फैलिगै दाम
साँचक बाट,सबूलैं काट
ठय्कक खेल,जनताक तेल
नेताक हँसी,जनताक फाँसी
भाषण भारी,जेब  खाली
रिश्वतक चाल,बिगड़िगै हाल
पैसाक मान,भुलिगै ईमान
फोटो खिंचाण,कामक  स्याण
सेल्फीक शौक,भुलिगै लोक
खेत बिकाण,सहर बसाण
गौ-गोठ सूनी,बज्यूँणैकि धूनी
घर मैं ताल,भ्यार कमाल
ब्याक ठाठ,उधारक बाट
दाज्यूँक मार,भुलिगै भाईचार
मन्दिर भीड़,मन मैं पीड़
झूठक जीत,हारिगै प्रीत
कपटी यार,भितर वार
पैसाक जोर,साँचो कमजोर
रिश्ताक डोर,स्वार्थक छोर
कर्जक शान,बेचैन प्राण
दिखावक दान,मन मैं गुमान
घरक बँटवार,टुटिगै प्यार
गौंक खेत,उगिगै घास
पनघटक गीत,भुलिगै प्रीत
ढोलक थाप,मोबाइल जाप
मेलाक रौनक,रैगै कौतिक
अपणि बोली,भुलिगै टोली
लालचक चाल,बिगड़िगै हाल
झूठक राज,साँचो लाज
अपणो माट पानी,बेचणि ठानी
भाषाक मान,यै छै पहचान
माटीक गंध,जीवनक सुगंध
अपणो गाँव,मिलजुल रै
अपणि संस्कृति तबै बचै
तब भलो सब हूँ पै।

शुक्रवार, 12 जून 2026

कुमाऊनी शायरी या कुमाऊनी जोड़ –


माछी लै फटक मारौ, बलुवा रेतमा। तू होंसिया छाजी रए, हरिया खेतमा।
गाड़ तरी गधेरी तरी को रौली तरुलो, पहाड़ जनम मेरो को देशा मरुलो।
आस्यारी क रेट भागी आस्यारी क रेट। ऊनै रौला दिन मांसा हुनै रौली भेंट।
पानी को मशीक सुवा पानी को मशीक ।  तु भुलना भूली जाली , मैं भूलूँ कशिक ।
एक क्यारी में धणियां बोयौ, एक क्यारी में मेथी….
म्यर कैंलै नि हुनी सुवा यौ पहाड़ै खेती…।
फूली रोछ कांस बल फूली रोछ कांस,
यो दानी उमर बल नि ऊन साँस !!
ध्न्याली को दाना घट खुलो बान , क्या नै हुनी मयादरा खड्यूनी क्या नै हुनी बाना ,क्या नै हुनी बाना बखते बेमान दाज्यू नै गुड़ नै ज्ञाना…
मुलि जुलि रैया भागी चारदइनक कि जिंदगी …
भल नक यैरै जालो भागी चारदिनि कि जिंदगी।
नान माणी मडुवा भरो ग्यूं भरा ठुल माणी । ढिन मिना घुरी नं रौली मोत्यूं कसी दाणी  ।
बांसुई का बन भागि बासुई का बन ।।  तू मेरि राधिका होली में तेरो मोहन ।
दो तारि को तार सुवा दो तारि को तारा ।बची रैया खुशी रैया धरती की चारा ।
बाकर कि खुटी सुवा बाकरे कि खुटी आपुणो जोबन देखि, आफी रैछ टूटी।
तेल त निमड़ि गोछ बुझर्ण छ बाती ।तेरि माया ले मेड़ि दियो सरपै की भांति ।
तेरा गावा मूंगे की माला मेरा गावा जन्जीरा ।तेरी मेरी भेंट होली देवी का मंदीरा ।
रमुली तेरे प्यार में , भुभरी गया मैं बाजार में।।  तू ले आपुण घर बने ले म्यर दिलेक उड़्यार में।
तुमुगु देखी लरबरी गया , खो गया मैं घर बार मे। त्यर बाटा देखमु मी बांजनी को धार में।
तेरो मेरो साथ दगड़िया, जस दी और बात । मरी जूलो ,तरी जूलो ,नि छोड़ूलो त्यर हाथ।
तू पापा की परी ,मी आपुण ईजा  का लाट प्रिये।। तू होटल की मटन करी, मैं चमु पूजे का बाट प्रिये।।
स्वर्ग बटि सर्प छुटो पाणी की तीसल । तू बोली अबोलि भैछै कब की रीसल ।
सुर सुर हवा चली उड़ी कत्ति जाणी । हिय में हापसा रैगे यो किलै निजानी ।
सल क बुनिया सुआ सल क बुनिया। दुःख दुःख झन कयै दुखी छौ दुनिया।
खांणों कौ कमेट, खांणों कौ कमेट, तु भाना जल्दी ऐ गेछै, मि है गोयूं लेट ।
रामज्यू बन बन गया शिवजी गया कैलाशा । कैल निपाय दुख दूनी में , झन हया उदासा।
गाड़ की चिफली ढुंगी,को ढुंगी टेकुलौ। पहाड़ जन्म म्यरौ,को देश मरूलौ।
पारी भीड़ा घुरड बासो वारी भीड़ा करौली, तेरी यो जवानी तसी जे की रौली ।
दन्याली को दना लिपिटानी घना ।राज हरी चना ओल रोला दिन मासा मै भूलिए झना ।
अयोध्या में राम चन्द्र,गोकुल गोविन्द, अब हम नसि जानूं ,आंखिर जै हिन्द।
लगुली क लेट, कफू बासो जेठ, आनी रैना ऋतु मास, हनी रैली भेट ।
हली यै लै हल बोय, छम छम बोया धाना, पाली खानी चुवा पंछी, फिर खानी किसाना।

शनिवार, 23 मई 2026

कैंची धाम का जाम

पहाड़ की पीड़ा प्रकृति और लोगों की आवाज़ को शब्दों में पिरोने वाला एक छोटा सा प्रयास।
पहाड़ के दर्द को समर्पित। एक कविता


कैंची धाम के लंबे जाम
रोक रहे पहाड़ की शाम।
भवाली खैरना की राह
घंटों रुकती हर इक चाह।
पहले ठंडी चलती हवा
मन को मिलता सुकून नया।
चीड़-देवदारों की खुशबू
भर देती थी मन में जादू।
अब हर मोड़ पर गाड़ियों की लाइन
धीरे-धीरे चलता टाइम।
हॉर्न और धुएँ का भार
दबने लगा पहाड़ का प्यार।
सुबह-सुबह जो घर से निकले
शाम ढले तब घर को लौटे।
हल्द्वानी का छोटा सफर
अब बन बैठा कठिन डगर।
बीमार लोग परेशान खड़े
एंबुलेंस भी जाम में पड़े।
बच्चों की बस देर से आए
हर चेहरा चिंता बतलाए।
सूनी पड़ी माल रोड की शाम
फीकी लगती बाजार की शान।
चाय की दुकानों की बातें
अब कम सुनती पहाड़ी रातें।
झूला देवी मंदिर पुकारे
कहाँ गए वो आने वाले?
घंटी की मधुर आवाज
ढूँढे फिर वही पुराना साज।
चौबटिया की ठंडी बयार
ताक रही फिर वही बहार।
सेबों के बागों की खुशबू
याद करे पर्यटकों की धुन।
हैड़ाखान की शांत कहानी
सुनने कम पहुँचे अब प्राणी।
बुबुधाम की पावन राहें
अब भी मन को अपनी चाहें।
बिनसर महादेव की वादी
याद करे पुरानी आबादी।
देवदारों की छाँव तले
कितने सपने थे जो पले।
होटल  बाजार और दुकान
सब पर छाया है सुनसान।
जो पर्यटक घूमने आते
जाम देखकर वापस जाते।
श्रद्धा से लोग यहाँ आते
बाबा के दर्शन कर जाते।
पर सड़कें अब कहती हैं 
हम भी थोड़ी राहत चाहती हैं।
यही पहाड़ की आज पुकार
बचा लो इसका शांत संसार।
जाम नहीं पहचान बने
फिर से खुश पहाड़ दिखें।
फिर गूंजे पहाड़ों की हँसी
फिर लौटे वो पुरानी खुशी।
शांत हवा का हो विस्तार
मुस्काए फिर अपना कुमाऊँ संसार।
देव सती पहाड़ी बटोही

बुधवार, 20 मई 2026

राजनीतिक व्यंग्य

पहले देश अंग्रेजों का गुलाम था,
आज जनता वादों और जुमलों की कैदी है।
तब लड़ाई आज़ादी की थी,
अब लड़ाई सच और समझदारी बचाने की है।
सड़कें वही टूटी हैं,
समस्याएँ वही पुरानी हैं,
बस नेताओं के बंगले और भाषण
हर साल नए हो जाते हैं।
स्कूलों में मास्टर नहीं,
अस्पतालों में डॉक्टर नहीं,
और सड़कों पर गड्ढे इतने हैं
कि सफ़र कम, एडवेंचर ज़्यादा लगता है।
जंगली जानवर जंगल छोड़ आबादी में घूम रहे हैं,
पहाड़ विकास के नाम पर धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं।
विडंबना देखिए जनाब —
जिस देश में नदियाँ सबसे ज़्यादा हैं,
वहीं लोग पानी और सिंचाई के लिए तरस रहे हैं।
गाँव के खड़ंजे हों या डामरीकरण,
काम ऐसा कि बनने से पहले टूटने लगता है।
पुल पाँच साल नहीं टिकते,
मगर उद्घाटन के पोस्टर सालों तक चमकते रहते हैं।
एक तरफ अंधाधुंध खनन जारी है,
दूसरी तरफ जंगल और पहाड़ काटे जा रहे हैं।
प्रकृति रोज़ कमजोर हो रही है,
और नेता रोज़ मजबूत।
जनता महँगाई से दब रही है,
लेकिन नेताओं के वेतन-भत्ते लगातार बढ़ रहे हैं।
पाँच साल जनता याद नहीं आती,
फिर चुनाव आते ही
सोशल मीडिया पर अचानक “विकास” दौड़ने लगता है।
नेता फिर हाथ जोड़कर कहेंगे —
“इस बार मौका दीजिए, सब बदल देंगे।”
और जनता फिर सोचती रह जाएगी —
“पहले बदला क्या था?”
अब हाल ये है जनाब —
देश समस्याओं से कम,
चुनावी भाषणों और दिखावटी वादों से ज़्यादा परेशान है।
सड़क टूटे तो जनता की किस्मत,
पुल टूटे तो प्राकृतिक आपदा,
लेकिन कुर्सी कभी नहीं टूटनी चाहिए —
बस यही सबसे बड़ा विकास मॉडल बन गया है।
अब मिट्टी, नदियाँ और पहाड़ तक बेचैन हैं,
मगर नेताओं की सुविधाएँ
दिन-दूनी, रात-चौगुनी बढ़ रही हैं।
लोग अब कहते हैं —
“अंग्रेजों से तो आज़ाद हो गए,
अब नेताओं की नौटंकी से आज़ादी चाहिए।
 #व्यंग्य #राजनीति #सिस्टम #जनता #सच्चाई #चुनाव #विकास #पहाड़ #गाँव #महँगाई

सोमवार, 11 मई 2026

जनगणना

भारत कि जनगणना - 2027
-------------------------------------------
भारत कि भवनगणना 2027 में,
पूछी जाणी तैंतीस सवाल।
क्ये चीजल बणी छैं भवन,
कस छैं भवनोंक हाल।।
फर्श क्येकि बनी छु,
मा्ट लाकड़ ईट सीमेंट।
दीवाल ईट और पाथर मस्याल गार,
छत में कंक्रीट, टाइल्स लगी छु सार 
मकान क् उपयोग रहणक लिजी,
या उमें चलण लै रै दुकान ।
परिवारम् घर में कतु लोग छैं,
क्ये छु मुखियाक नाम।।
घरकि मुखिया महिला छु,
 पुरुष छु या फिर ट्रांसजेंडर।
क्वे श्रेणी में आँछा तुम,
 मकान छु  कैक अंडर।।
घर में कतुक कमर छैं,
घर में कतु  विवाहित ज्वड़ छै।
 मुख्य स्रोत क्ये छु पेयजल,
 हैडपंप कुँआ ट्यूबवैल या नल।।
शौचालय घर क् भितेर छु,
या फिर छु घर क् बाहर ।
बिजली कैरोसिन सौर ऊर्जा , 
क्येल रोज उदंकार हुछ घर ।।
पीण क् पाणि कब-कब आणौ,
नल हैडपंप कुँआ प्रकार बताणौ ।।
बेकार पाणिकि निकासी कसिक ,
सीवर सोकपिट नाली बणायी लोग
ना्णक लिजी आपण बाथरुम छैं,
या सामुदायकक करण रयी उपयोग
रसोई घर क् भितेर छु या छु बाहर,
भोजन कती करी  जां तैयार।
रेडु /टांजिस्टर छु या ना ,
मिकैं बतै दियो एक बार।।
घर में टेलीविजन रंगीन छु ,
या फिर छु ब्लैक एंड हृवाइट।
इंटरनेट सुविधा कंप्यूटर उपलब्धता 
कृपाकरि जवाब दि दिया राइट।।
टेलीफोन/मोबाइल फोन है छु,
 स्मार्टफोन छु या फिर साधारण।
इंटरनेट सुविधा मोबाइल में,
हमुकैं जुटाण छु सही विवरण ।।
साइकिल स्कूटर मोटरसाइकिल,
कार जीप वैन जो छु तुमर पास।
यैकि जानकारी हमुकैं बतै दियो,
जो आपूंक सफर बनाछ खास।।
चावो ग्यौ बाजुर ध्वग और लै,
मुख्य रुपल क्ये खांछा तुम अनाज,
आखरी में मोबाइल नंबर बतै दियो,
म्यर लै पुर है जा्ल आजक काज ।।
जनगणना बै जनकल्याण में,
महारजिस्ट्रार जनगणना अधिकारी।
सफल बनाण राष्ट्रीय कार्यक्रम कैं,
हम भारतवासियोंकि छु जिम्मेवारी चार्जअधिकारी सुपरवाइजर ईएन
कर्त्तव्यनिष्ठ बणि जुटी छैं दिन रात।
युं आँकड़े देशक विकासम् सहायक
भारत उन्नति करल हृवल नव प्रभात

------------------०-------------------
कृपाल सिंह शीला (स.अ.)
प्रगणक (En.), भिकियासैंण
अल्मोड़़ा (उत्तराखंड) 263680
मो./हृवटसैप- 9410501465

हिंसालू काफल

श्री रामचंद्र कह गये सिया से, ऐसा कलयुग आयेगा,
पहाड़ी नौकरी की खातिर शहरों में उम्र बितायेगा,
और डोट्याल जंगल घूम-घूम कर काफल-हिंसालू खायेगा। 
जिस गाँव ने पाला-पोसा,
वहीं ताला लटक जायेगा,
घर की चौखट रोती रह जाएगी,
और मालिक शहर में “सेटल” कहलायेगा।
ना खेत बचेंगे, ना गौशाला,
ना चौपाल में बात होगी,
बस व्हाट्सएप स्टेटस में
“मेरा उत्तराखंड” की बात होगी।

पहाड़

🏔️🌿 अहा… पहाड़ैक सौगात 🌿🏔️

मंडुवौक रवट…गदुवैक साग…
भटै चुड़काणि…दाड़िमै खटे…तिमिलक पात…
निमुवैक झोई…माणिरौक भात… 
अहा म्येरि पहाडै़ सौगात।।

ये सिर्फ खाने की चीजें नही है,य पहाड़क आत्मा छै…य उ स्वाद छ जो दिल्ली-हल्द्वानी की चमकदार प्लेटौं में कभी नि मिलण।

आज शहरों में हजारों रुपयाक पिज्जा-बर्गर खाण वाला मनखी,जब रात में अकेलो पड़ल,तब याद आँल —ईजाक हाथक झोई…चूल्हैक धुंवैं की खुशबू…और गाँवक वो मिट्टी,जमें अपनापन लागो

कितनी अजीब बात है ना…?

जिन पहाड़ौं में पैदा हुये,आज वही पहाड़ “पिछड़ो” लग रहा है।जिन खेतौं में बूब -बाबू दिन-रात खपिगे,आज उ खेत “बेकार” दिखण लाग गे।जिन घरौं में हँसी गूँजछी,आज उ घर ताला खा र छ…

गाँवक आँगन सूण पड़िगे…गोठ सूण पड़िगे…बैलों की घंटी सूण पड़िगे…और अब त धीरे-धीरे त्योहार भी सूण पड़ण लाग गे।

पहले छुट्टी मतलब गाँव हूछी…अब छुट्टी मतलब “टूर पैकेज” है गे।

पहले ईजा फोन करी —“कब आलैं?” अब हम कूनू —“टाइम नि छ…”

समय त सबक पास छ,बस अपणौं क लि जी नी बच रो

शहरक भीड़ में आदमी अमीर जरूर होल,पर भीतर बटि गरीब पड़ि गो।ना पड़ोसी अपण,ना बोली अपणी,ना त्यो त्यार आपण ना अपनापन…
और उधर…पहाड़ आज भी बाट देख रहै है… 

किसी खिड़की में बैठी ईजा,आज भी सड़क की ओर ताकदी होगी…कि शायद इस बार छुट्टियों में मेरो लाल घर ऐजाल…

बाबू आज भी खेत में काम करते-करते धीरे सैं कहते होंगे —“नानतीन शहर में खुश होल…”

पर सच पूछो त,सब सैं ज्यादा अकेलो आज पहाड़ छै। 

जिन गाँवौं में रामलीला, जागर, झोड़ा गूंजछि,आज वहाँ मोबाइलक रिंगटोन त छै,पर इंसानी हँसी कम पड़िगे।

अपणी बोली बोलण में शर्म,अपण पहनावा पहनण में झिझक,अपण खान-पान छोड़ण में “स्टेटस”…और फिर कौल —“पहाड़ खत्म हू रौ ”

पहाड़ अपने आप खत्म नि हो रौ…हम छोड़ रै य पहाड़ के।

याद धरिया —जब आखिरी गाँव सूण ह जाल नै,तब सिर्फ घर नि टूटल,पूरी पीढ़ी जड़ों सैं कट जाल।

इसलिए…जब भी मौका मिलै,लौट अया अपण गाँव।

दो दिन ही सही,पर ईजाक हाथक खाना खाल,बाबूक संग खेत घूम आल,मंदिर की घंटी सुन आल,और बच्चों को बता आल —“यै छ हमार असली पहाड़…”

क्योंकि —मंडुवौक रवट में जो स्वाद छै,वो पाँच सितारा होटल में न्हैं।गाँवक प्रेम में जो गर्माहट छै,वो शहरक एसी में न्हैं।और अपण मिट्टी में जो सुकून छै,वो दुनिया के किसी कोने में न्हैं।

🌿“जड़ौं सैं जुड़े रहै,तभी पहाड़ जीवित रहैगें…”🌿
देव सती पहाड़ी बटोही

बुधवार, 29 अप्रैल 2026

पहाड़ की सौगात

हिसालू की मिठास, काफल की लालिमा और किल्मोड़े की खटास…
ये सिर्फ जंगलों में उगने वाले फल नहीं हैं, ये पहाड़ के बचपन की यादें हैं। 
आज भी याद है वो दिन,
जब स्कूल से लौटते वक्त जंगल की पगडंडियों में दोस्त मिल जाते थे,
किसी के हाथ में हिसालू होते
कोई काफल तोड़ते-तोड़ते पेड़ पर ही चढ़ जाता,
और किल्मोड़े की झाड़ियों से बचते-बचाते  मुट्ठी भर फल जेब में भर ही लेते थे।
न नमक चाहिए था, न मसाले,
बस पहाड़ की हवा और अपने लोगों का साथ ही काफी था।
उस स्वाद में माँ की ममता थी,
बुरांश की खुशबू थी,
और गाँव की मिट्टी का अपनापन था।
आज शहरों की भीड़ में बैठे प्रवासी जब इन फलों का नाम सुनते हैं,
तो आँखों के सामने अपना गाँव घूम जाता है…
वो जंगल, वो पगडंडी, वो दोस्तों की टोली,
और वो बेफिक्र बचपन…
मन बस यही कह उठता है—
“काश…
एक बार फिर पहाड़ की उस डाल से टूटता काफल चख पाते,
हिसालू की मिठास हथेलियों में भर पाते,
और किल्मोड़े की खटास के साथ
अपने गाँव की हवा में दो पल फिर जी पाते…” 
देव सती पहाड़ी बटोही

बुधवार, 15 अप्रैल 2026

विकास क खेल

“विकास क खेल” 
आदू रात बे लैन लागिरै, मन मा धुका-धुक,
हो दाज्यू मन मा धुका-धुक।
सिलेंडर नि मिल हो दाज्यू, चुल में फुका-फुक,
हो दाज्यू चुल में फुका-फुक।
पैली पाँच सौ नोट हराय, आब हराय सिलेंडर,
स्कूल बै मास्टर हराय, अस्पताल बै डाक्टर।
लौंड-मौडों हैं ब्यौलि हराय, ईजै हैंणि ब्वारी,
यौ कस विकास छ दाज्यू, यौ कसि तैयारी।
पलायन को ढोल बजायो, खाली हैई री गौं,
नेता जी पोस्टर मा बस, जमीन मा सूना छौं।
चुनाव आयो गाड़ी भरि, वादा क पिटारा,
चुनाव गयो—सब गायब, ना कोई सहारा।
रोजगार क नाम मा दाज्यू, फॉर्म भरौं हजार,
पेपर लीक, भर्ती रुकि—युवक भया लाचार।
“सरकारी नौकरी होल तब”—यै नई बीमारी,
तब तक कुंवारा बैठो, टलि गै कन्याकुमारी।
किसान रात भर जागी रै, खेतन में पहरा,
सूअर-बंदर, भालू-स्याल—सब खै गो मेहनत सारा।
सरकार कागज मा लिखै—“मुआवजा तैयार”,
दफ्तर-दफ्तर चक्कर काटै, थकिगो बैचार।
विकास क नाम पर दाज्यू, बिकण लागो पहाड़,
रिसोर्टन क जंगल उग्या, उजड़ि गै घर-बार।
नदी-नाला बेचि द्यौ, खनन माफिया राज,
पानी सूखि, खेत उजड़्या—कस करलुं आज?
सड़कन क फोटो चमकैं, हकीकत मा खड्डा,
ठेकेदार-नेता मिलिके, बांटि लीनि डबलू की गड्डी।
बिजली-पानी कागज मा, भाषण मा विकास,
उत्तराखण्ड मा बस जुगाड़ चलै, जनता पूरी त्रास।
ईजा-ब्वारी बाट जोते, आंखि भरी दिन-रात,
बालक शहर मा फंसिगे, भूलि गै घर-गौं क बात।
देवभूमि क नाम बिकौ, धर्म क भी व्यापार,
मंदिर-धामन क आड़ मा, चलि रै ठेकेदार।
युवा सपनन बेचि द्यौ, पैसाक खेल महान,
“स्टार्टअप” क नाम द्यौ, खाली करि द्यौ खलियान।
जंगल काटि, पहाड़ फोड़ी, बोलन “ग्रीन मिशन”,
कागज मा सब ठीक छै, जमीन मा विनाशन।
दाज्यू अब त जागि जा, समझि जा ये चाल,
नहीं त अगली पीढ़ी पूछल—“का गछो पहाड़?”नई-नई पट्ट खुल गी, शराब क ठ्येक ठिकाण,
गौं-गौं मा नशा फैलिगो, उजड़ि गै परिवारन क मान।
युवा हाथन मा बोतल आई, छूटि गै किताब,
ईजा-बाबू रोवै बैठा, कस बनलुं हिसाब?
रोजगार नि मिलो दाज्यू, मिलि गै बस ठ्येक,
भविष्य बिकण लागो, पैसाक खेल देख।
स्कूल सूना, खेत उजाड़, भरिगे बस बजार,
“विकास” क यै मॉडल छै—जनता पूरी लाचार।
दाज्यू अब त जागि जा, उठि जा सब लोग,
नशा, भ्रष्टाचार, झूठ—सबका खोल दे रोग।
अपणो गौं, अपणो पहाड़, बचाणो अब काम,
नहीं त नाम रह जाल बस, मिट जाल सब धाम।

सोमवार, 13 अप्रैल 2026

चैंतव कौतिक

मेरी भानूमती – चैतआव कौतिक (कविता-देव सती पहाड़ी बटोही)

चैतआव कौतिक लागी, सैमधार रंगीलो,
डांडा-डांडा गूंजे, हर कोना हसीलो।
बुरांश फुली गै, लालिमा छाई,
मन को आंगन मा, माया रँग आई।
भानूमती संग मेरो, खुशियाली आई,
विकि हँसी में जसे, दुनिया समाई।
ढोल दमाऊं की थाप, दिल मा बसिगे,
हर धड़कन मा, सुर सजिगे।
चैतआव कौतिक मा, भीड़ भरी गै
नाच-गान में सारा दिन बिती गै
झोड़ा-चांचरी मा, घुमे सब लोग,
हँसी-खुशी में खोई, हर इक सोच।
हाथ मा हाथ धरी, गीत उठन लागा,
मन का हर कोना, प्रेम सैं जागा।
भानूमती संग मेरो, दिल जुड़न लागो,
हर इक पल अब, अपना बनन लागो।
जैनोली-पिलखोली, टाना-तस्वाड़,
खग्यार की माटी, स्नेह अपार।
सब मिल बैठी गै, कौतिक की छांव,
हर चेहरे मा खिलो अपनापन भाव।
चैत की यो रुत, यादगार बनि जां,
तेरो संग बितायो, हर पल बसि जां।
सैमधार कौतिक, दिल मा बसिगे,
तेरी याद संग, जीवन हँसिगे।
भानूमती बिना अब, कछु नै दिखे,
तेरो नाम लियूं, हर सांस क साथ,
तू ही मेरी खुशी, तू ही मेरी बात।
स्याल्दे बिखौती, द्वाराहाट को मेला,
देवभूमि मा सजा, रंगीलो खेला।
नाच-गाना, भक्ति, खुशियाली का दौर,
तेरो संग चलूं मैं, हर इक ठौर।
सैमधार सैं उठी, माया की डोर,
द्वाराहाट तक पहुंची, दिल की डोर।
भानूमती संग मेरो, जीवन सवरिगे,
हर इक सपना अब, साँच बनिगे।
ओ मेरी भानूमती, सैमधार मा आ,
मंदिर आंगन मा, संग झोड़ा खेला जा।
चैतआव कौतिक की, रौनक देख जा,

बुधवार, 1 अप्रैल 2026

हनुमान जन्मोत्सव

🚩 हनुमान जन्मोत्सव 

आज गगन मे गूँज छ एक अद्भुत पुकार
जय बजरंगी जय मारुति, संकट काटनहार
अंजनी क आँगन मे दिव्य उज्यालो आयो
पवन जस तेज बालक जग मे बल दीप जगायो
नान्-नान् चरण मे शक्ति नैनन मे तेज अपार
बालपन मे सूरज छू ल्यौ  फल समझि संसार
राम नाम की ज्योति जली हर एक सांस मे
भक्ति बणी पहचान उकी बसि ग्या राम विश्वास मे
लंका क राजा को मान तोड़्यो अहंकार झुकायो
एक दास भक्ति बल राम राज बढ़ायो
 पहाड़ उठायो सहजै उनूल जब लक्ष्मण जीवण हारे
सेवा मे जो अडिग रये उई सच्चा सहारे
ना चा सिंहासन उनूल ना चा मान-सम्मान
“राम-राम” धुन मे मगन रयी मेरो बजरंगी हनुमान
आज ले जो सच्चे मन  उनर नाम पुकारो
संकट काटि पल भर मे द्वार दौड़ी आयो
हे पवनसुत वीर हनुमान राखो आपणी छाया
भक्ति बल बुद्धि क जीवन मे दीप जलाया।
जय श्री राम – जय हनुमान

बुधवार, 18 मार्च 2026

हिन्दू नव वर्ष

🚩रौद्र  नाम संवत्सरे २०८३

जय हो सनातन धरम की गूँज चारों धाम
रौद्र संवत्सर ऐ गो ल्यौ खुशियों को नाम
सब सनातनी जन-जन कै नव साल क बधाई
चैत्र मास क पैल तिथि में नई शुरुआत आई
उन्नीस मार्च गुरुवार दिन नई साल लागौ
नवरात्रि संग माता आई हर आँगन उज्यालौ
मन में उठ्ठो एक सवाल? अमूसी दिन क्ये बात?
कसी लागी नवरात्रि क्ये छ इनर साफ जवाब?
शास्त्रों में साफ लैख र 
 जौं प्रतिपदा नि आई
त पैंल दिन त्योहार मान्य सदा ठहराय।
धर्म ग्रंथल य बात समझाय
जो तिथि सूरज संग नी हो पैल दिन मनाय
भोर में अमूस छूटी जा रै छ बजी तिरपन मिनिट
तब तक कलश स्थापना सई टैम निश्चित
भल नक्षत्र और शुभ योग साथ में आयो
पालकी में माता आई हाथी में विदा पायो
शुक्र चंद्र मिलि बनिगे शुभ योग क रास
भल काम बनाल खुशियों क प्रकाश।
ब्रह्म योग और शुभ असर जीवन रंग भरो
मीन राशि में शुक्र भै र चार ग्रह संग ठहरो
गुरु शनि सूरज,चंद्र मिल भल योग बनाल
शुभ फल सबोंके मिलाल जीवन सुखमय बनाल
साल दुई हजार छब्बीस में ग्रह बदलल चाल
गुरु दो बार राशि बदलाल बदलाल भाग्य का हाल
मिथुन छोड़ि कर्क में जाल फिर सिंह में आल
राहु केतु ले बदलाल
 जीवनक राह दिखाल
शनि मीन में बैठी रौल कर्म का फल दय्ल
मेष कुम्भ मीन साढ़ेसाती जीवनक पाठ सिखाल
सिंह धनु में ढैया लागी टैम-टैम पर परीक्षा ल्याल
भक्ति दान पूज पाठ ले सब संकट कट जाल
रौद्र नाम संवत्सर छ कभैं खुशी कभैं क्लेश
राजा-रजवाड़ा में टकराव दुनिया बदललि भेष
अन्न दाम और द् यों मध्यम चाल चलाल
समाज राजनीति में हलचल 
गुरु जब राज बनाल सुख-समृद्धि ल्याल
अन्न दूध और धनल हर घर भरि जाल।
यज्ञ हवन और पूज-पाठ, खुशियां गूंजै चार
हर जन खुश और हर मन प्रसन्न उत्सव अपार
मंगल साथ में शक्ति दय्ल हिम्मत और बल ल्याल
पर रोग और झगड़ बटि थोड़ा डर ले ल्याल
आग और बीमारी बढ़ाल सावधानी धरि ल्या
हिम्मत से काम करिया हर मुश्किल पार करिया
ग्रहण चार पड़ाल साल में भारत में नी दिखिय्ल एक
ना सूतक ना दोष लागल भल संकेत दैखिय्ल 
अंत में बात य समझो  धरम कर्म और ध्यान
सच्च मनल जो चलाल पाल सम्मान
हर आँगन में फूल खिलों हर चेहरे में मुस्कान
रौद्र संवत्सर ल्यों तुमूहू सुख-शांति और मान
🚩 नव संवत्सर २०८३ की हार्दिक बधाई 🚩
देव सती पहाड़ी बटोही

नव संवतसर

🚩रौद्र  नाम संवत्सरे २०८३

जय हो सनातन धरम की गूँज चारों धाम
रौद्र संवत्सर ऐ गो ल्यौ खुशियों को नाम
सब सनातनी जन-जन कै नव साल क बधाई
चैत्र मास क पैल तिथि में नई शुरुआत आई
उन्नीस मार्च गुरुवार दिन नई साल लागौ
नवरात्रि संग माता आई हर आँगन उज्यालौ
मन में उठ्ठो एक सवाल? अमूसी दिन क्ये बात?
कसी लागी नवरात्रि क्ये छ इनर साफ जवाब?
शास्त्रों में साफ लैख र 
 जौं प्रतिपदा नि आई
त पैंल दिन त्योहार मान्य सदा ठहराय।
धर्म ग्रंथल य बात समझाय
जो तिथि सूरज संग नी हो पैल दिन मनाय
भोर में अमूस छूटी जा रै छ बजी तिरपन मिनिट
तब तक कलश स्थापना सई टैम निश्चित
भल नक्षत्र और शुभ योग साथ में आयो
पालकी में माता आई हाथी में विदा पायो
शुक्र चंद्र मिलि बनिगे शुभ योग क रास
भल काम बनाल खुशियों क प्रकाश।
ब्रह्म योग और शुभ असर जीवन रंग भरो
मीन राशि में शुक्र भै र चार ग्रह संग ठहरो
गुरु शनि सूरज,चंद्र मिल भल योग बनाल
शुभ फल सबोंके मिलाल जीवन सुखमय बनाल
साल दुई हजार छब्बीस में ग्रह बदलल चाल
गुरु दो बार राशि बदलाल बदलाल भाग्य का हाल
मिथुन छोड़ि कर्क में जाल फिर सिंह में आल
राहु केतु ले बदलाल
 जीवनक राह दिखाल
शनि मीन में बैठी रौल कर्म का फल दय्ल
मेष कुम्भ मीन साढ़ेसाती जीवनक पाठ सिखाल
सिंह धनु में ढैया लागी टैम-टैम पर परीक्षा ल्याल
भक्ति दान पूज पाठ ले सब संकट कट जाल
रौद्र नाम संवत्सर छ कभैं खुशी कभैं क्लेश
राजा-रजवाड़ा में टकराव दुनिया बदललि भेष
अन्न दाम और द् यों मध्यम चाल चलाल
समाज राजनीति में हलचल 
गुरु जब राज बनाल सुख-समृद्धि ल्याल
अन्न दूध और धनल हर घर भरि जाल।
यज्ञ हवन और पूज-पाठ, खुशियां गूंजै चार
हर जन खुश और हर मन प्रसन्न उत्सव अपार
मंगल साथ में शक्ति दय्ल हिम्मत और बल ल्याल
पर रोग और झगड़ बटि थोड़ा डर ले ल्याल
आग और बीमारी बढ़ाल सावधानी धरि ल्या
हिम्मत से काम करिया हर मुश्किल पार करिया
ग्रहण चार पड़ाल साल में भारत में नी दिखिय्ल एक
ना सूतक ना दोष लागल भल संकेत दैखिय्ल 
अंत में बात य समझो  धरम कर्म और ध्यान
सच्च मनल जो चलाल पाल सम्मान
हर आँगन में फूल खिलों हर चेहरे में मुस्कान
रौद्र संवत्सर ल्यों तुमूहू सुख-शांति और मान
🚩 नव संवत्सर २०८३ की हार्दिक बधाई 🚩
देव सती पहाड़ी बटोही

शनिवार, 14 मार्च 2026

फूलदेई विरासत और सवाल

🌸 फूलदेई: विरासत और सवाल 🌸
आज पूछ बैठी मिहूं—
“क्यें छ य फूलदेई?”
मैं बोल्यूं—
पुरखों की विरासत छ,
पहाड़ को पावन लोकपर्व छ — फूलदेई।
मैं न्हैं थी हैरान,
सुदूर प्रांत की दगड़ी छी,
पर गहन छ पीड़—
जब पहाड़ का नान ही
नी जाणन — फूलदेई।
कभी गांव–गांव गूँजदा गीत,
देहरी-देहरी फूल बिछैं,
आशीष बरसै हर आंगन,
हँसदा बचपन — फूलदेई।
पर आज…
सूनी देहरी,
बंद पड़े मकान,
पलायन की चुप्पी में
कहीं खो गी — फूलदेई।
अब केवल
मोबाइल की स्क्रीन में
व्हाट्सऐप स्टेटस बनि गै —
फूलदेई।
पर याद कर—
जब भोर भयी, बसंत खिली,
फ्यूँली–बुराँश मुस्कान लई,
बाँस की टोकरी हाथों में,
फूलों की खुशबू आई।
चल बालको ध्यई–ध्यई,
गांव–गांव देहरी सजी,
बसंत की पैली बेला—
फूलदेई फिर आई।
फूलदेई, फूलदेई, फूल-फूल,
तुमार देई द्वार में ऊनै रूल।
मै कूनै रूल…
फूलदेई, फूलदेई, फूल-फूल,
छम्मा देई दैण द्वार,
ऊनै रूल बारम्बार।
आपूं सबौं कृपा अपार —
जगमग रहो पहाड़।
देव सती — पहाड़ी बटोही
#FoolDei #फूलदेई #उत्तराखण्डसंस्कृति #कुमाऊँ #गढ़वाल #पहाड़ #लोकपर्व #PahadiCulture #Uttarakhad

बुधवार, 11 मार्च 2026

श्रद्धांजली दिवान दा

श्रद्धांजलि – दिवान दा

द्वी दिनाका ड्यार छ यो दुनी मे,
गीत तुमारा अमर रो
रेडियो बटि गौं–गौं गूँजो,
सबकै मन भितर बसि रो
कैसेट, सीडी, मंचन में,
तुमरी धुनि झंकार रो
कुमाऊँनी लोकगायिकी 
तुम बड़ि ऊँचाई दिगो छा
दिवान दा तुम दूर न्हैं गो छा,
पर सुर तुमारा जिंदा छ
युग–युग तक याद करुला हम,
तुमरी आवाज़ सदा य दूनी मे गूँजते रों
🙏 विनम्र श्रद्धांजलि – दिवान दा

#दिवान_कनवाल #कुमाऊँनी_लोकगायक #श्रद्धांजलि #कुमाऊँनी_संस्कृति #लोकधरोहर #Devbhoomi

सोमवार, 2 मार्च 2026

रंग रंगिलो ईश्वर की लीला

🎵 “रंग रंगिलो — ईश्वर की लीला” 🎵
रंग रंगिलो आने रुणी हो,
यसी ईश्वर की लीला रंग रंगिलो।
ग्रीष्म रितु ज्येठ-अषाढ़ा,
घाम लागछी आग की चारा,
सुखनी गध्यार, नौला-धारा
इनू दिनों मा…
रंग रंगिलो…
हो सावन-भादव बज्र की धारा,
लुपलुपिया पाणी को हुच कच्यारा,
निराई-गुड़ाई, सिचाई हुची
इनू दिनों मा…
रंग रंगिलो…
हो अशोज-कार्तिक धान काटनी,
देव-दोनों के भोग लगूनी,
गडैरी, काकड़ी, मूली-पिनालू
इनू दिनों मा…
रंग रंगिलो…
हो मंगसिर-पूषा ह्यून का दिना,
ठंड दिनो मा नी रै सकिना,
बाज का चैनी, गिना का गिना,
पूषाक-पालक, लाल जड़िया
इनू दिनों मा…
रंग रंगिलो…बारहमासा ईश्वर की माया,
रंग बदलै हर इक छाया,
हँसी-ठिठोली प्रेम बढ़ाया,
जीवन भई रंग रंगिलो…
🎵 “रंग रंगिलो — ईश्वर की लीला” 🎵
रंग रंगिलो आने रुणी हो,
यसी ईश्वर की लीला रंग रंगिलो।
ग्रीष्म रितु ज्येठ-अषाढ़ा,
घाम लागछी आग की चारा,
सुखनी गध्यार, नौला-धारा
इनू दिनों मा…
रंग रंगिलो…
हो सावन-भादव बज्र की धारा,
लुपलुपिया पाणी को हुच कच्यारा,
निराई-गुड़ाई, सिचाई हुची
इनू दिनों मा…
रंग रंगिलो…
हो अशोज-कार्तिक धान काटनी,
देव-दोनों के भोग लगूनी,
गडैरी, काकड़ी, मूली-पिनालू
इनू दिनों मा…
रंग रंगिलो…
हो मंगसिर-पूषा ह्यून का दिना,
ठंड दिनो मा नी रै सकिना,
बाज का चैनी, गिना का गिना,
पूषाक-पालक, लाल जड़िया
इनू दिनों मा…
रंग रंगिलो…

रविवार, 1 मार्च 2026

बसंत और होली

य मस्ताना फागुन में, फिर चली मधुर पुरवाई छ,
फिर से होली आई छ, पर जेब खाली पाई छ…।।
गगन में उड़ी रंग हजार,
महँगाई मुस्काई छ,
अबीर–गुलाल छोड़ि सब
सेल्फी रंग छाई छ।
फिर से होली आई छ, पर जेब खाली पाई छ…।।
ढोल–दमाऊँ बाजन लागा,
डीजे धुन बजाई छ,
बैठकी होली छोड़ि कै सब
मोबाइल मा समाई छ।
फिर से होली आई छ, पर जेब खाली पाई छ…।।
बुरांश फुलि गै डांड्यों मैं,
पर नौजवान पलायन छ,
गांव सूना, चौपाल सूनी,
सपना सब प्रवासन छ।
फिर से होली आई छ, सोचण बैठि जाई छ…।।
गुजिया छोलें सूजी भितर,
आलू गुटुक बनाई छ,
थाली भरी चिप्सों ले
पर मँहगाई रुलाई छ।
फिर से होली आई छ, पर जेब खाली पाई छ…।।
हँसि–हँसि रंग लगौ सबनै,
बुरा न मानो भाई छ,
य फागुन सच बोलि द्यालो —
होली व्यंग्य सिखाई छ।
फेर से होली आई छ… मन की बात बताई छ…।।
देव सती पहाड़ी बटोही

शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

जल कैसे भरु यमुना गहरी आधुनिक होली कविता

“जल कसै भरूँ जमुना गहरी”
(बुरा ना मानो होली है)
जल कसै भरूँ जमुना गहरी,
य तो हर गौं–गौं क कहानी ठहरी।
गौं को पाणी सूखि गै छै,
नौला–धारा बूसी गै छ,
पर नेता जी क बंगला भितर
रंगों की बरसात हू रै छ।
जल कसै भरूँ जमुना गहरी…
पलायन की बस रोज भरै छ,
छोड़ि गै आँगन–खेत सारी,
ईजा बैठी बाट जोहै,
सूनी भई चौक–द्वारी।
कागज मा विकास छपा छ,
धरती मा बंजर हालत,
भाषण मा हरियाली फूली,
गाँव मा सन्नाटा ही सन्नाट।
जल कसै भरूँ जमुना गहरी…
बानर, सूअर, बाघ डूडाट पड़ छ,
खेत भयो जंगली घर,
हल–बैलों की आवाज मिटी,
किसान शहर मा दर–दर।
स्कूल खुला पर मास्साब गायब,
अस्पताल मा ताला भारी,
फोटो खिंचि गै योजनन की,
जनता फिर भी लाचारी।
जल कसै भरूँ जमुना गहरी…
नेता जी रंग लगै कै बोल्या —
“सब बढ़िया छ, घबराना नी!”
हम बोल्या — “पैली विकास ल्याओ,
फिर बात करौ तरक्की की।”
सुख गयो पाणी गौं को सारा,
पर सूखो नी कुर्सी प्यारा,
जनता जब रंग बदलि दै छ,
हिल जाल दरबार सारा।
जल कसै भरूँ जमुना गहरी…
अब जवाब भी दिणो ठहरी,
होली छ, पर बात गहरी।
बुरा ना मानो होली है —
पर सच को रंग आज गाढ़ो है!
  बुरा ना मानों होली है
आंपू सबों के होली क हार्दिक शुभकामनायें
देव सती पहाड़ी बटोही

बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

ग्वेल ज्यू को समर्पित होली

हॉं हाँ हाँ ग्वेल ज्यू दुदाधारी,
हाँ हाँ हाँ ग्वेल ज्यू …।।
न्याय के धनी दरबार तुम्हारो,
घंटीऽऽ बाजें भारीऽऽ…
अरज सुनो जी भक्तों की तुम,
लीजो खबर हमारीऽऽ…

चंपावत धरती पावन भई रे,
जन्म लियो अवतारीऽऽ…
भक्तन की अरज सुनी झटपट,
फरियाद हमारी
सफेद घोड़ा सवार भए आयो
छवि लागे अति प्यारी

ढोल दमाऊँ बाजन लागे
रंग उडें अति भारी
अबीर गुलाल उडा़वन लागे
होली खेलें अति न्यारी

अल्मोड़ा बटि गूँजी होली,
चितई घंटी बाजें भारीऽऽ…
नैनीताल घोड़ाखाल में,
छवि लागे अति प्यारीऽऽ…

बागेश्वर-पिथौरागढ़ गावे होली ,
महिमा अपरंपारीऽऽ…
तराई ऊधमसिंह नगर में,
रंग बरसे अति न्यारीऽऽ…

देहरादून हरिद्वार धुन में,
गंगा बहे सुधारीऽऽ…
पौड़ी-टिहरी-रुद्रप्रयाग में,
जय-जयकार तुम्हारीऽऽ…

चमोली-उत्तरकाशी गावें,
हिम छाया सुखकारीऽऽ…
कुमाऊँ-गढ़वाल एक सुर भये,
होली खेलन हारीऽऽ…

आऽऽऽ हाँ हाँ हाँऽऽऽ…
रंग भरो न्याय की झोली…
जय-जय ग्वेल ज्यू दुदाधारी…
देव सती पहाड़ी बटोही

सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

पहाड़ कै छोडबैर शहर जाण पडो़

पहाड़ के छोडबैर शहर जाण पडो़
मन नी लाग वा पर लगूण पडो़
बाजे बोटों को छॉव बाखई की बात
सब मूबैलें की स्क्रीन मे खोजण पडो़
ईजा की रोटी मडूव रव्टाक स्वाद
या पिज्जा बर्गर गव उतारण पडो़
गौं मा खेत सूख गया गध्यार रुठ गया
कागजों मे विकास छपाण पडो़
नेता मंच बटि छाती ठोकी बोली गयो
रोजगार भरमार पलायन रुकी गयो
जाणि कस तुमार ख्वर बज्जर पडो़
गौ मा स्कूल छ मास्टर न्हैती
अस्पताल छ डाक्टर न्हैती
रिपोर्ट मे चकाचक जमीनें धूल उडी़ पडो़
फार्म ले भरो और फीस ले भरो
लेन मे खालि ठाड़ दिन गवाण पडो़
फिर रिजल्ट ले स्थगित है ई पडो़
डिग्री हाथ मे छ जैब छ खाली
नेताओं लिजी खालि बजाओ ताली
नि मिलेरई नानि जा न्हैती नौकरी सरकारी
रुजगारे चक्करम पलायन है ई पडो़
राजनीति क पैट भराण खातिर
हम भीड़ मे भीतेर घूसीण पडो़
वोट दिन तका दिन भर लैनों मे ठाड़
फिर पॉच बरस भुलाण पडो़
जब जड़ पूर सूख जाल
तब पहाड़ के हिलाण पडो़
लेखी है लो कागज म
तबै ते बूलाण पडो़
भलि लागली य बाता
कमेंट करना रया
विडीयो के आघिल सरकाते रया
आज मन नी लाग शहर मा
पर पेट खातिर झुकाण पड़ो।
जड़ सूखगीं जब मातृभूमि की
तब पत्थर के ले  हिलाण पड़ो।
जब जागि जाल नौजवान
तब सत्तन क सिंहासन डोलाण पड़ो।
झूठ क कागज फट जाल जो दिन मे
सच क मूछ्याव फिर जलाण पड़ो।
अब चुप बैठणो पाप होलो
आवाज के उठाण पड़ो।
अपणों हक, अपणों पहाड़ खातिर
भीड़ नि, तूफान बनाण पड़ो।
नारों  सिर्फ लगाणे ले  नी होलो,
हक सच में दिलाण पडलों।
जगाण पड़ो, ललकारण पड़ो,
अब पहाड़ के  बचाण पड़ो
@देव सती पहाड़ी बटोही

शनिवार, 31 जनवरी 2026

गुड़ होता तो आटा पैंचा कर लेते मगर घी नही है



हलवा खाने का मन है, आटा जनता ले आए,
गुड़ की व्यवस्था हो जाएगी—ऐलान किया जाए।
घी की बारी आते ही समिति बैठ जाती है,
फ़ैसला अगली तारीख़ में बदल जाता है।

चुनाव में सब रसोइया बन जाते हैं,
कढ़ाही जनता की, चम्मच ये चलाते हैं।
वादे उबलते हैं भाषण की आँच पर,
बनता कुछ नहीं—बस धुआँ बहुत आता है।

खाने का समय हो तो ‘हम-हम’ होता है,
खर्च की बात हो तो ‘तुम-तुम’ होता है।
हलवा जनता का, स्वाद सत्ता का,
और जिम्मेदारी? वो फ़ाइलों में सोता है।
देव सती पहाड़ी बटोही 

शनिवार, 24 जनवरी 2026

कडा़कें कि ठण्ड

कडाके की ठंड और पहाड़ का सच
पहाड़ों की ठंड कोई मौसम भर नहीं होती, यह अनुभव होती है—सीधे हड्डियों में उतरने वाली। जब मैदानों में “हल्की ठंड” की खबरें चलती हैं, तब पहाड़ों में नल पानी छोड़ने से पहले दो बार सोचता है। कुछ दिनों से मौसम ठंड-ठंड हो गया है और एक-आध हफ्ते से तुस्यार पड़नी शुरू हो गई है। अब तो हाल यह है कि अच्यालू पड़ी बड़ी कडाके की ठंड है।
सुबह-सुबह उठकर बाहर निकलना किसी साहसिक अभियान से कम नहीं। हवा का फरफराट ऐसा लगता है जैसे वह पुराने हिसाब चुकाने आई हो। चलने में आदमी नहीं, पहले दाँत काँपते हैं। बिछुणा छोड़ने का मन नहीं करता, और अगर मजबूरी में उठ भी जाएँ तो शरीर पूछता है—“इतनी जल्दी किस बात की?”
ठंड का असली इम्तिहान तब होता है जब हाथ में ठंडा पानी लग जाए। उस एक पल में पूरी तबियत झण्ड हो जाती है। डॉक्टर गरम पानी पीने की सलाह देते हैं, लेकिन पहाड़ का नल बड़ी शांति से कह देता है—“बसंत में मिलते हैं।” तब समझ आता है कि पहाड़ों में स्वास्थ्य केवल दवाइयों से नहीं, धैर्य से चलता है।
इन दिनों पकौड़ी और समोसा सिर्फ़ खाने की चीज़ नहीं रहे, वे ठंड से लड़ने के औज़ार बन गए हैं। लसणेकि चटडि साथ में हो तो लगता है—स्वर्ग हो या नर्क, फिलहाल यही सही जगह है। रसोईघर पहाड़ का अस्थायी हीटर बन जाता है, जहाँ आग और स्वाद दोनों से राहत मिलती है।
टोपी और मफलर अब फैशन नहीं, पहचान हैं। जो ढंग से पहन ले, वही अनुभवी पहाड़ी माना जाता है। बनैन और जैकिट की अहमियत इन दिनों किसी डिग्री से कम नहीं। ठंड में काम वही आता है जो सच में गरम रखे, बाकी सब दिखावा है।
दो महीने की यह ठंड कई बार अनंत लगने लगती है। लेकिन पहाड़ी मन फिर भी धीरज धरता है। हर सुबह यही भरोसा रहता है कि बसंत जरूर आएगा, चाहे थोड़ा देर से ही सही। यही धैर्य पहाड़ को ज़िंदा रखता है।
कडाके की ठंड का धन्यवाद इसलिए भी जरूरी है कि यह हमें हमारी जड़ों की याद दिलाती है—सादा जीवन, मजबूत हौसला और कठिन हालात में भी मुस्कराने की आदत। पहाड़ों में ठंड सिर्फ़ मौसम नहीं, एक शिक्षक है, जो हर साल हमें सहनशील होना सिखा जाती है।
— देव सती
(पहाड़ी बटोही)

गुरुवार, 22 जनवरी 2026

बसंत पंचमी

खेत सब बंजर हैं,
जौ अब खेतों में नहीं,
त्योहार निभाने को
गमलों में बोए जाते हैं।
बचपन का वह पीला रुमाल
आज भी आस लगाए बैठा है—
कि बच्चे पहनकर
खुलकर हँसें, दौड़ें, गाएँ।
पर अब त्योहार
बच्चों में नहीं,
मोबाइल की स्क्रीन में
जिंदा हैं।
उत्तराखण्ड से लोग गए,
खेत बेच दिए गए,
जो बचे
उन्हें जंगली जानवरों ने उजाड़ दिया—
फिर भी हम तसल्ली से कहते हैं,
“संस्कृति ज़िंदा है।”
हाँ, ज़िंदा है—
रिल्स में, पोस्ट में,
सरकारी कार्यक्रम में।
पीला रुमाल दीवार पर टंगा है,
और बसंत
चार इमोजी में निपट जाता है।
बसंत पंचमी से बैठकी होली तक
गीत गूँजते हैं,
पर आँगन खाली हैं।
ढोल बजता है,
पर गाँव चुप है।
जिस दिन
त्योहार फिर बच्चों के हाथ में होंगे,
खेत फिर बीज माँगेंगे—
उस दिन मानेंगे
संस्कृति सच में
जिंदा है।
देव सती पहाड़ी बटोही

उत्तरैणी त्यार

उत्तर में खिचड़ी, पुण्य स्नान।
उत्तराखंड उत्तरायणी, घुघुतों क शान।
पंजाब में लोहड़ी, आग क मान।
हरियाणा माघी, पावन स्नान।
राजस्थान पतंग, नील आसमान।
गुजरात उत्तरायण, “काई पो” जान।
महाराष्ट्र तिलगुल, मीठी बात।
मध्य प्रदेश दान, पुण्य साथ।
आंध्र संक्रांति, फसल मुस्कान।
तेलंगाना रंगोली, घर पहचान।
तमिलनाडु पोंगल, सूर्य सम्मान।
केरल मकरविलक्कु, भक्ति जान।
असम माघ बिहू, भोज महान।
ओडिशा मकर चौला, अन्न दान।
बंगाल पौष संक्रांति, गंगासागर स्नान।

हम त्यौहार बचा रहे हैं या बस उसकी तस्वीरें?
संस्कार बाँट रहे हैं या सिर्फ़ पोस्ट कर रहे हैं? घुगुतिया त्यार की शुभकामनाएँ
🌿 परंपरा निभाएँ, दिखावा नहीं
देव सती(पहाड़ी बटोही)

जौं सग्यानि

जौं सग्यान – प्रकृति, संस्कृति और जीवन क त्यार
जौं सग्यान, प्रकृति क त्यार
ठंडा हाव में गर्मी क एहसास
धूप नरम मन में जगे नई आस
जौं सग्यान ल्या उल्लास
रितू बदल बदल संसार
फुल खिले, बुरांश हँसे
हर डाल पर जीवन अपार
खेतन में लहलहाणि नई फसल
माटी बोलै, बीज हँसै
मेहनत को फल आयो आज
हर दिशा में खुशियाँ मचल
घर-आँगन में हर्ष अपार
नौळ-धार गुनगुनान लागे
हाव दगड़ बग री रंगों क सुर
फिजाँ में घुल्यो मीठ गान
खेतन में छै सरसों को भुड़
पीळ रंग ल्यावै मुस्कान
घसियारी गीत गुनगुनान
बचपन फिर लौटि आयो
यादन में बसी हर क्षण
हर पीळ रुमाव दगड़ बधी छ प्यार
जौं सग्यान पर्व अपार
वीणावादिनी मय्या सरस्वती
ज्ञान-बुद्धि को दीप जलाय
अज्ञान अंधेर हटाय द्ये
सत्य-विवेक को मार्ग दिखाय
कागज-कलम, वीणा-वादन
विद्या को साज सजे
सबों मन मे श्रद्धा भरे
आपूण संस्कृति को त्यार दगड़
रीति-रिवाजन को मान
जो सिखायो पुरखों ने हमूकें
उई छ जीवन को ज्ञान
न मोबाइल, न दिखावा
न बनावटी संसार
साद जीवन, ऊँचो विचार
यै छ पर्व क सार
यै छ संस्कृति, यै छ पहचान
यै छ पहाड़न को आधार
जौं सग्याणि ल्या संदेश
प्रकृति संग जीणो सीख
माटी, पानी, जंगल बचाया
यै छ भविष्य क नींव
आओ मिलिकै यो पर्व मनाया
सबूं के जीवन में उजियालो ल्यावै
जौं सग्यान त्यार।
वसंत पंचमी / जौं सग्यान की
हार्दिक शुभकामनाएँ 🙏
देव सती

जौं सग्यानि

जौं सग्यान – प्रकृति, संस्कृति और जीवन क त्यार
जौं सग्यान, प्रकृति क त्यार
ठंडा हाव में गर्मी क एहसास
धूप नरम मन में जगे नई आस
जौं सग्यान ल्या उल्लास
रितू बदल बदल संसार
फुल खिले, बुरांश हँसे
हर डाल पर जीवन अपार
खेतन में लहलहाणि नई फसल
माटी बोलै, बीज हँसै
मेहनत को फल आयो आज
हर दिशा में खुशियाँ मचल
घर-आँगन में हर्ष अपार
नौळ-धार गुनगुनान लागे
हाव दगड़ बग री रंगों क सुर
फिजाँ में घुल्यो मीठ गान
खेतन में छै सरसों को भुड़
पीळ रंग ल्यावै मुस्कान
घसियारी गीत गुनगुनान
बचपन फिर लौटि आयो
यादन में बसी हर क्षण
हर पीळ रुमाव दगड़ बधी छ प्यार
जौं सग्यान पर्व अपार
वीणावादिनी मय्या सरस्वती
ज्ञान-बुद्धि को दीप जलाय
अज्ञान अंधेर हटाय द्ये
सत्य-विवेक को मार्ग दिखाय
कागज-कलम, वीणा-वादन
विद्या को साज सजे
सबों मन मे श्रद्धा भरे
आपूण संस्कृति को त्यार दगड़
रीति-रिवाजन को मान
जो सिखायो पुरखों ने हमूकें
उई छ जीवन को ज्ञान
न मोबाइल, न दिखावा
न बनावटी संसार
साद जीवन, ऊँचो विचार
यै छ पर्व क सार
यै छ संस्कृति, यै छ पहचान
यै छ पहाड़न को आधार
जौं सग्याणि ल्या संदेश
प्रकृति संग जीणो सीख
माटी, पानी, जंगल बचाया
यै छ भविष्य क नींव
आओ मिलिकै यो पर्व मनाया
सबूं के जीवन में उजियालो ल्यावै
जौं सग्यान त्यार।
वसंत पंचमी / जौं सग्यान की
हार्दिक शुभकामनाएँ 🙏
देव सती

शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

उत्रैणी

°°°°°°°°घुघुतिया त्यार°°°°°°
( कुमाऊँ की स्मृतियों और पलायन के बीच एक लोक कविता)

नान छनां, मैं सोचछीं—
य चार-चार-चार (४४४)
किलै बनूं री?
कौ किताब मैं लेख रो?
कौ मास्टर, कौ पंडित
ज्यूल पढ़ै रो?
यैक क्यें हिसाब लगूं रो?
और यैक नाम घुघुत
किलैं कू रो?
ना पाँख, ना पूँठ,
ना मुनव, ना खुट,
ना हिटणी, ना उड़ाणी,
ना फरफड़ाणी—
फिर ले यैहू
घुघुत किलैं कू रो?
यू त गुड़ क पाक मैं
घ्यूँ-पिसू मिलै बैर,
हाथूं क साँच मैं
ढलैं बैर—
मीठो, सादा,
खास-खास
बनूं रो।
नान छनां जब हम
माघा क दिन गिनछीं,
त्यारों क इंतजार करछीं—
उ दिवाई ना होई,
धुधुती त्यार हूछी।
ईज रत्ति-फजल उठी,
चूल्हौ फूँकि,
घ्यूँ चढ़ी,
पिसू सानी,
हम भैं-बैणी
आस-पास भै रोछीं—
“ईज, घुघुत बणै बैर?”
पैली घुघुत
काव है धरैछी,
लम्ब-लम्ब धुधुती माव
हमूंहू गठें दीछी।
घुघुत धागूं मैं बांधि,
खिड़की-छज्जा
सजी जांछी।
फिर दूहर दिन
कौवां कै बूलोछी—
“काले कव्वा,
काले घुघुती,
माला खाले कूछी!”
पर आज…
हमर गों मैं
खिड़की बंद छ,
छज्जा सूना छ।
ना धागूं मैं
घुघुत लटकूं,
ना नानतिनों क
हंसी छ।
गों-गों पलायनैं
मार झैलें रौं।
क्वैं रोज़गार न्हैं,
क्वैं पढ़ाई न्हैं,
क्वैं स्वास्थ्य सुविधा न्हैं—
यई मजबूरी छ।
गों बटी निकल बैर
भाबरों मैं
भबरी जारो।
गों मैं आज
लम्ब-चौड़ बाखई न्हैती,
एक हाथ लम्ब
घुघुती क माव
अब कहानी बणी गै।
काले-काले,
कालें कैबैर—
आज बुलांणि वाल
उ आवाज
आज सुन्न छ?
आज ना काव बच री,
ना घुघुती माव,
ना उ रंगत,
ना उ स्वाद,
जो नानछनों क
संज्ञानों मैं हूछी।
आज त्यार छ—
पर फोटो मैं,
रील मैं,
स्टेटस मैं।
घुघुती हाथ मैं कम,
मोबाइल हाथ मैं ज्याद।
फिर भी…
माघा आयो छ,
उत्तरैणि आयी छ।
सूरज मकर राशि मैं
आज प्रवेश करूं छ।
नव उज्यालों,
नव शुरुआत—
पर पहाड़
आज ले भी
अपण बात कहूं छ।
माघा क मंगल हूनी,
पूषाक इतवार,
य बार उत्तरैणी कौतिक
जाया बागेश्वरै बजार!
ढोल-दमाऊँ,
झोड़ा-चांचरी
आज ले बाट देखनि।
क्वैं मनै ल्या भों,
क्वैं मनै ल्या आज—
पर अपूंण संस्कार,
अपूंण बोली,
अपूंण त्यार
ना छूटण दिया।
घुघुती भले
आज कम बणी,
पर यादूं मैं
आज भी मीठी छ।
✍️ देव सती
(पहाड़ी बटोही)

बुधवार, 14 जनवरी 2026

उत्तरैणी त्यार

उत्तर में खिचड़ी, पुण्य स्नान।
उत्तराखंड उत्तरायणी, घुघुतों क शान।
पंजाब में लोहड़ी, आग क मान।
हरियाणा माघी, पावन स्नान।
राजस्थान पतंग, नील आसमान।
गुजरात उत्तरायण, “काई पो” जान।
महाराष्ट्र तिलगुल, मीठी बात।
मध्य प्रदेश दान, पुण्य साथ।
आंध्र संक्रांति, फसल मुस्कान।
तेलंगाना रंगोली, घर पहचान।
तमिलनाडु पोंगल, सूर्य सम्मान।
केरल मकरविलक्कु, भक्ति जान।
असम माघ बिहू, भोज महान।
ओडिशा मकर चौला, अन्न दान।
बंगाल पौष संक्रांति, गंगासागर स्नान।

हम त्यौहार बचा रहे हैं या बस उसकी तस्वीरें?
संस्कार बाँट रहे हैं या सिर्फ़ पोस्ट कर रहे हैं? घुगुतिया त्यार की शुभकामनाएँ
🌿 परंपरा निभाएँ, दिखावा नहीं
देव सती(पहाड़ी बटोही)

कौआ की नई मॉग

कोवा की नई माँग
नहीं आऊँगा, लाख बुला लो,
मैं ना खाऊँगा, तुम ही खा लो।
मेरे लिए सूखे घुगुतें
अपना मोमो खाते हो,
मेरे लिए दाड़िम, डमरू,
अपना पिज़्ज़ा मंगवाते हो।
मेरी माला में भी जब
चाउमीन लिपटाओगे,
तब सोचूँगा आने की
जब बर्गर भी लटकाओगे।
वरना तेरे चिल्लाने से
क्यों आऊँ मैं? बँधा नहीं,
कान खोल के सुन ले तू,
कोवा हूँ मैं, गधा नहीं।

अब कोवा भी समझदार हो गया,
समय के साथ बदल गया,
डमरु, दाड़िम,घुगुतें  की माला
अब कहानी बन गया।
पहले छज्जे-छज्जे घूमते थे 
काले कंठ में बोलते थे,
आज शहर की छतों पर
प्लास्टिक, धुआँ, शोर भरा।
कहता है—
“मेरे हिस्से का संस्कार
तुमने खुद ही खा डाला,
मेरे नाम का त्यौहार
तस्वीरों में सजा डाला।
मेरे लिए सूखा टुकड़ा,
अपने लिए थाली भर,
मेरे गीत बस ‘काँव-काँव’,
अपने लिए DJ का स्वर।
मैं त्यौहार का बहाना था,
तुम अपनों से मिलने का,
आज मुझे ही भूल गए
शौक़ मोबाइल में रहने का।
अगर बुलाना है तो ऐसे बुलाओ,
जैसे पहले बुलाते थे,
थोड़ा मन, थोड़ा अपनापन
छज्जों पर लटकाते थे।
वरना मत बुलाओ अब,
मैं भी आत्मसम्मान रखता हूँ,
कोवा हूँ, मजबूर नहीं,
समय की भाषा समझता हूँ।”
और पहाड़ चुपचाप खड़ा है,
सब कुछ देख-सुन रहा,
कोवे की इस नई माँग में
अपना ही सच चुन रहा।

यह कविता सवाल पूछती है
हम त्यौहार बचा रहे हैं या बस उसकी तस्वीरें?
संस्कार बाँट रहे हैं या सिर्फ़ पोस्ट कर रहे हैं? घुगुतिया त्यार की शुभकामनाएँ
परंपरा निभाएँ, दिखावा नहीं
देव सती (पहाड़ी बटोही)

शनिवार, 10 जनवरी 2026

मनुष्य के 100कर्म

काशी में मणिकर्णिका घाट पर चिता जब शांत हो जाती है तब मुखाग्नि देने वाला व्यक्ति चिता भस्म पर 94 लिखता है।
यह सभी को नहीं मालूम है। खांटी बनारसी लोग या अगल बगल के लोग ही इस परम्परा को जानते हैं। बाहर से आये शवदाहक जन इस बात को नहीं जानते।

जीवन के शतपथ होते हैं। 100 शुभ कर्मों को करने वाला व्यक्ति मरने के बाद उसी के आधार पर अगला जीवन शुभ या अशुभ प्राप्त करता है। 94 कर्म मनुष्य के अधीन हैं। वह इन्हें करने में समर्थ है पर 6 कर्म का परिणाम ब्रह्मा जी के अधीन होता है।हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश- अपयश ये 6 कर्म विधि के नियंत्रण में होते हैं। 

अतः आज चिता के साथ ही तुम्हारे 94 कर्म भस्म हो गये। आगे के 6 कर्म अब तुम्हारे लिए नया जीवन सृजित करेंगे।
अतः 100 - 6 = 94 लिखा जाता है।

गीता में भी प्रतिपादित है कि मृत्यु के बाद मन अपने साथ 5 ज्ञानेन्द्रियों को लेकर जाता है। यह संख्या 6 होती है। मन और पांच ज्ञान इन्द्रियाँ।
अगला जन्म किस देश में कहाँ और किन लोगों के बीच होगा यह प्रकृति के अतिरिक्त किसी को ज्ञात नहीं होता है। अतः 94 कर्म भस्म हुए 6 साथ जा रहे हैं।
विदा यात्री। तुम्हारे 6 कर्म तुम्हारे साथ हैं।

आपके लिए इन 100 शुभ कर्मों का विस्तृत विवरण दिया जा रहा है जो जीवन को धर्म और सत्कर्म की ओर ले जाते हैं एवं यह सूची आपके जीवन को सत्कर्म करने की प्रेरणा देगी......

  100 शुभ कर्मों की गणना धर्म और नैतिकता के कर्म-
1.सत्य बोलना
2.अहिंसा का पालन
3.चोरी न करना
4.लोभ से बचना
5.क्रोध पर नियंत्रण
6.क्षमा करना
7.दया भाव रखना
8.दूसरों की सहायता करना
9.दान देना (अन्न, वस्त्र, धन)
10.गुरु की सेवा
11.माता-पिता का सम्मान
12.अतिथि सत्कार
13.धर्मग्रंथों का अध्ययन
14.वेदों और शास्त्रों का पाठ
15.तीर्थ यात्रा करना
16.यज्ञ और हवन करना
17.मंदिर में पूजा-अर्चना
18.पवित्र नदियों में स्नान
19.संयम और ब्रह्मचर्य का पालन 
20.नियमित ध्यान और योग सामाजिक और पारिवारिक कर्म                                      
21.परिवार का पालन-पोषण
22.बच्चों को अच्छी शिक्षा देना
23.गरीबों को भोजन देना
24.रोगियों की सेवा
25.अनाथों की सहायता
26.वृद्धों का सम्मान
27.समाज में शांति स्थापना
28.झूठे वाद-विवाद से बचना
29.दूसरों की निंदा न करना
30.सत्य और न्याय का समर्थन
31.परोपकार करना
32.सामाजिक कार्यों में भाग लेना
33.पर्यावरण की रक्षा
34.वृक्षारोपण करना
35.जल संरक्षण
36.पशु-पक्षियों की रक्षा
37.सामाजिक एकता को बढ़ावा देना
38.दूसरों को प्रेरित करना
39.समाज में कमजोर वर्गों का उत्थान
40.धर्म के प्रचार में सहयोग आध्यात्मिक और व्यक्तिगत कर्म                                           
41.नियमित जप करना
42.भगवान का स्मरण
43.प्राणायाम करना
44.आत्मचिंतन
45.मन की शुद्धि
46.इंद्रियों पर नियंत्रण
47.लालच से मुक्ति
48.मोह-माया से दूरी
49.सादा जीवन जीना
50.स्वाध्याय (आत्म-अध्ययन)
51.संतों का सान्निध्य
52.सत्संग में भाग लेना
53.भक्ति में लीन होना
54.कर्मफल भगवान को समर्पित करना
55.तृष्णा का त्याग
56.ईर्ष्या से बचना
57.शांति का प्रसार
58.आत्मविश्वास बनाए रखना
59.दूसरों के प्रति उदारता
60.सकारात्मक सोच रखना सेवा और दान के कर्म
61.भूखों को भोजन देना
62.नग्न को वस्त्र देना
63.बेघर को आश्रय देना
64.शिक्षा के लिए दान
65.चिकित्सा के लिए सहायता
66.धार्मिक स्थानों का निर्माण
67.गौ सेवा
68.पशुओं को चारा देना
69.जलाशयों की सफाई
70.रास्तों का निर्माण
71.यात्री निवास बनवाना
72.स्कूलों को सहायता
73.पुस्तकालय स्थापना
74.धार्मिक उत्सवों में सहयोग
75.गरीबों के लिए निःशुल्क भोजन
76.वस्त्र दान
77.औषधि दान
78.विद्या दान
79.कन्या दान
80.भूमि दान, नैतिक और मानवीय कर्म                                          
81.विश्वासघात न करना
82.वचन का पालन
83.कर्तव्यनिष्ठा
84.समय की प्रतिबद्धता 
85.धैर्य रखना
86.दूसरों की भावनाओं का सम्मान
87.सत्य के लिए संघर्ष
88.अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना
89.दुखियों के आँसू पोंछना
90.बच्चों को नैतिक शिक्षा
91.प्रकृति के प्रति कृतज्ञता
92.दूसरों को प्रोत्साहन
93.मन, वचन, कर्म से शुद्धता
94.जीवन में संतुलन बनाए रखना

 विधि के अधीन 6 कर्म                                         
95.हानि jn
96.लाभ श्री
97.जीवन
98.मरण
99.यश
100.अपयश

🙏🙏

गुरुवार, 8 जनवरी 2026

इंसाफ हल्का झंडा भारी


अंकिता की लाश पर खड़े हो
तुम झंडे ऊँचे कर रहे हो,
शर्म अगर ज़िंदा होती
तो ये रंग खुद झुक रहे होते।
न्याय माँगने आए हो या
भीड़ में अपना नाम चमकाने?
CBI की पुकार से ज़्यादा
तुम्हें पोस्टर हैं छपवाने।
जिस बेटी की साँस छीनी गई,
उसका कोई दल नहीं था,
वो वोट नहीं थी, वो नारा नहीं,
बस एक ज़िंदा इंसान थी—
या शायद अब वो भी कम था?
अगर आंदोलन सच्चा है,
तो झंडे घर छोड़ आओ,
अंकिता के नाम पर
अपनी राजनीति मत सजाओ।
क्योंकि याद रखना—
इतिहास सवाल करेगा,
तुम न्याय के साथ थे
या झंडे के पीछे छिपे थे।
देव सती( पहाड़ी बटोही)

शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

ब्याक पोस्टमार्टम

गौं में रुणी वाल च्यल और ब्याक फॉर्म
— देव सती (पहाड़ी बटोही)
गौंक च्यल लैन में ठाढ़ है र
हाथ में कुनई, दिल में भरोस ल्ये र।
च्यैलि वाल पूछनि:
“नौकरी कै करु?”
बस यई रिश्त मर र।
च्यल कू:
“गौं में खेती करनू, ईज बाज्यूक सहार छू।”
च्यैलि वाल कूनी:
“अरे! य त सब टैम पास छ।
तिपर सब डिग्री छ, पर पैकेज न्हैती।
संस्कार छ, पर सैलरी न्हैती।
ईमानदारी भारी पड़ गै च्यला,
क्यैलैकि त्यर बैंक में डबल न्हैति।
शहर में हमर च्यल लै ओपिसु में चहा पैऊ,
उ लै ‘सेटल’ छ।
च्येलि न्हैति दोषी इमें पूर,
उकैं सिखाई गै मजबूरी।
‘खेती-पाति, घरबार बाद देखियल,
पैली बैंक बैलेंस ज़रूरी।’”
गौं क च्यल फिर पू छू:
“क्यै मैं इंसान न्हैति?”
जवाब उ:
“छै, त सई नै, पर हमर च्यैलिक लेक न्हैते।”
च्यैलि क घर जाओ तो दै ख हमूल।
च्येलि क ददा ले भै रोछी:
“पूछो, उन्हू तुम क्य़ै करछा?”
बढ़ मुस्करातें हुए क आई त कै नी करन,
पै हमूंल क जवैं लिजी शर्त भारि।
बैणी क ब्योल चै सरकारी,
तुम खुद छा बेरोज़गारी में,
हमूहू कुरछा हम छू सरकारी नौकरी क तैयारी में।
ए घर, द्वी माप,
यई पहाड़ क कड़ू हिसाब।
कटु सत्य, मगर साफ़ बात,
रिश्त अब मेहनत ना हालात देखनि आज।
य एक खा लि कविता न्हैति,
रिश्तों क पोस्टमार्टम रिपोर्ट छ।
जा बेरोज़गारी अपराध छ,
और पहाड़ आपण गौ में रुण वी है बै ले ठूल अपराध।