खोली का गणेशा का उत्तराखंड मे विसर्जन ठीक न्हैंती
खोली का गणेशा
तुम चुप किले छा?
गध्यारोंक किनार मे
य हाल किले करछा?
बैई तलक त
घरक खोली में विराजमान छ्या,
फूल चढ़ै, दीप जलै,
मोदक क भोग लगै,
आरतीक थाल सजै,
हर ओर बस एकै आवाज छी
“खोली का गणेशा,
गणपति बप्पा मोरया!”
बप्पा है सुख माँगछा,
बुद्धि माँगछा,
घरक मंगल माँगछा,
दुख-दरिद्र दूर करणी
हाथ जोड़िक विनती करछा।
फिर विसर्जनक बाद
य कस सम्मान छ?
य कस भक्ति छ?
गध्यारक किनार
कैं टूटी सूँड़ पड़ी रै,
कैं हाथ टूटि रै,
कैं मुकुट बिखरि रै,
फूलनक माला सड़ि रै,
अर रंग-बिरंगी मूर्ति
टुकड़ा-टुकड़ा है रै।
हे खोली का गणेशा!
तुम त बुद्धिक देवता छा,
विघ्नहर्ता छा,
मंगलकर्ता छा—
विसर्जन करला तो
फिर हमर बुद्धिक ले
विसर्जन है जाल?
जो हाथोंल
तुमैरि पूजा करी,
उई हाथ
विसर्जन बाद
तुमार मूर्ति के
गध्यारक किनार छोड़ि आछा
पूजा करण भक्ति छ,
पर पूजा बाद सम्मान बचूण
सच्ची श्रद्धा छ।
माटीक गणेशा
माटी मेँ मिलि जाल,
पर प्लास्टर और जहरील रंग
गध्यार-पानी मेँ घुल जाल
माछी-पंछी और प्रकृति क
दुख दी जाल।
गणेश त मंगल करनी
गध्यार म्याल नि करन
आओ, अब संकल्प करूं—
खोली का गणेशा
श्रद्धा सँग घर ल्याऊं,
माटीक प्राकृतिक मूर्ति सजाऊं,
पर विसर्जन नी करु
आपणि गध्यार-कुंण,
अपणी धरती-माटी क
मैल नि करूं।
क्येलैकि—
खोली का गणेशा
सिर्फ मूर्ति नि,
हमर आस्था छ,
हमर संस्कृति छ,
हमर घरक मंगल छ।
किले निष्कासित
इतू अपमानित।
कब तक चलल
य पाखंड?
आओ मिलकर करुल य संकल्प
अब नि करुल गणेश ज्यू विसर्जन
उके प्रति वर्ष संवारुंल
नई रंगोंल सजोंल
क्येलेकि हमार खोली क गणेश न्हैती विसर्जन छवि
छ प्रेम प्रतिष्ठा क अक्षय निधि।
विसर्जन बप्पा क विदाई छ,
बप्पा क सम्मान क अंत न्हैति
माटी मे मिलि जाल बप्पा,
पर संदेश छोड़ि जाल—
बुद्धि बचौ,
प्रकृति बचौ,
आस्था बचौ।
खोली का गणेशा मोरया!
मंगल मूर्ति मोरया!
अगले बरस फिर आना—
पर संग हमरि
सद्बुद्धि लै ल्या
देव सती पहाड़ी बटोही