खेत सब बंजर हैं,
जौ अब खेतों में नहीं,
त्योहार निभाने को
गमलों में बोए जाते हैं।
बचपन का वह पीला रुमाल
आज भी आस लगाए बैठा है—
कि बच्चे पहनकर
खुलकर हँसें, दौड़ें, गाएँ।
पर अब त्योहार
बच्चों में नहीं,
मोबाइल की स्क्रीन में
जिंदा हैं।
उत्तराखण्ड से लोग गए,
खेत बेच दिए गए,
जो बचे
उन्हें जंगली जानवरों ने उजाड़ दिया—
फिर भी हम तसल्ली से कहते हैं,
“संस्कृति ज़िंदा है।”
हाँ, ज़िंदा है—
रिल्स में, पोस्ट में,
सरकारी कार्यक्रम में।
पीला रुमाल दीवार पर टंगा है,
और बसंत
चार इमोजी में निपट जाता है।
बसंत पंचमी से बैठकी होली तक
गीत गूँजते हैं,
पर आँगन खाली हैं।
ढोल बजता है,
पर गाँव चुप है।
जिस दिन
त्योहार फिर बच्चों के हाथ में होंगे,
खेत फिर बीज माँगेंगे—
उस दिन मानेंगे
संस्कृति सच में
जिंदा है।
देव सती पहाड़ी बटोही
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