शनिवार, 23 मई 2026

कैंची धाम का जाम

पहाड़ की पीड़ा प्रकृति और लोगों की आवाज़ को शब्दों में पिरोने वाला एक छोटा सा प्रयास।
पहाड़ के दर्द को समर्पित। एक कविता


कैंची धाम के लंबे जाम
रोक रहे पहाड़ की शाम।
भवाली खैरना की राह
घंटों रुकती हर इक चाह।
पहले ठंडी चलती हवा
मन को मिलता सुकून नया।
चीड़-देवदारों की खुशबू
भर देती थी मन में जादू।
अब हर मोड़ पर गाड़ियों की लाइन
धीरे-धीरे चलता टाइम।
हॉर्न और धुएँ का भार
दबने लगा पहाड़ का प्यार।
सुबह-सुबह जो घर से निकले
शाम ढले तब घर को लौटे।
हल्द्वानी का छोटा सफर
अब बन बैठा कठिन डगर।
बीमार लोग परेशान खड़े
एंबुलेंस भी जाम में पड़े।
बच्चों की बस देर से आए
हर चेहरा चिंता बतलाए।
सूनी पड़ी माल रोड की शाम
फीकी लगती बाजार की शान।
चाय की दुकानों की बातें
अब कम सुनती पहाड़ी रातें।
झूला देवी मंदिर पुकारे
कहाँ गए वो आने वाले?
घंटी की मधुर आवाज
ढूँढे फिर वही पुराना साज।
चौबटिया की ठंडी बयार
ताक रही फिर वही बहार।
सेबों के बागों की खुशबू
याद करे पर्यटकों की धुन।
हैड़ाखान की शांत कहानी
सुनने कम पहुँचे अब प्राणी।
बुबुधाम की पावन राहें
अब भी मन को अपनी चाहें।
बिनसर महादेव की वादी
याद करे पुरानी आबादी।
देवदारों की छाँव तले
कितने सपने थे जो पले।
होटल  बाजार और दुकान
सब पर छाया है सुनसान।
जो पर्यटक घूमने आते
जाम देखकर वापस जाते।
श्रद्धा से लोग यहाँ आते
बाबा के दर्शन कर जाते।
पर सड़कें अब कहती हैं 
हम भी थोड़ी राहत चाहती हैं।
यही पहाड़ की आज पुकार
बचा लो इसका शांत संसार।
जाम नहीं पहचान बने
फिर से खुश पहाड़ दिखें।
फिर गूंजे पहाड़ों की हँसी
फिर लौटे वो पुरानी खुशी।
शांत हवा का हो विस्तार
मुस्काए फिर अपना कुमाऊँ संसार।
देव सती पहाड़ी बटोही

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें