🌸 फूलदेई: विरासत और सवाल 🌸
आज पूछ बैठी मिहूं—
“क्यें छ य फूलदेई?”
मैं बोल्यूं—
पुरखों की विरासत छ,
पहाड़ को पावन लोकपर्व छ — फूलदेई।
मैं न्हैं थी हैरान,
सुदूर प्रांत की दगड़ी छी,
पर गहन छ पीड़—
जब पहाड़ का नान ही
नी जाणन — फूलदेई।
कभी गांव–गांव गूँजदा गीत,
देहरी-देहरी फूल बिछैं,
आशीष बरसै हर आंगन,
हँसदा बचपन — फूलदेई।
पर आज…
सूनी देहरी,
बंद पड़े मकान,
पलायन की चुप्पी में
कहीं खो गी — फूलदेई।
अब केवल
मोबाइल की स्क्रीन में
व्हाट्सऐप स्टेटस बनि गै —
फूलदेई।
पर याद कर—
जब भोर भयी, बसंत खिली,
फ्यूँली–बुराँश मुस्कान लई,
बाँस की टोकरी हाथों में,
फूलों की खुशबू आई।
चल बालको ध्यई–ध्यई,
गांव–गांव देहरी सजी,
बसंत की पैली बेला—
फूलदेई फिर आई।
फूलदेई, फूलदेई, फूल-फूल,
तुमार देई द्वार में ऊनै रूल।
मै कूनै रूल…
फूलदेई, फूलदेई, फूल-फूल,
छम्मा देई दैण द्वार,
ऊनै रूल बारम्बार।
आपूं सबौं कृपा अपार —
जगमग रहो पहाड़।
देव सती — पहाड़ी बटोही
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