सोमवार, 11 मई 2026

जनगणना

भारत कि जनगणना - 2027
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भारत कि भवनगणना 2027 में,
पूछी जाणी तैंतीस सवाल।
क्ये चीजल बणी छैं भवन,
कस छैं भवनोंक हाल।।
फर्श क्येकि बनी छु,
मा्ट लाकड़ ईट सीमेंट।
दीवाल ईट और पाथर मस्याल गार,
छत में कंक्रीट, टाइल्स लगी छु सार 
मकान क् उपयोग रहणक लिजी,
या उमें चलण लै रै दुकान ।
परिवारम् घर में कतु लोग छैं,
क्ये छु मुखियाक नाम।।
घरकि मुखिया महिला छु,
 पुरुष छु या फिर ट्रांसजेंडर।
क्वे श्रेणी में आँछा तुम,
 मकान छु  कैक अंडर।।
घर में कतुक कमर छैं,
घर में कतु  विवाहित ज्वड़ छै।
 मुख्य स्रोत क्ये छु पेयजल,
 हैडपंप कुँआ ट्यूबवैल या नल।।
शौचालय घर क् भितेर छु,
या फिर छु घर क् बाहर ।
बिजली कैरोसिन सौर ऊर्जा , 
क्येल रोज उदंकार हुछ घर ।।
पीण क् पाणि कब-कब आणौ,
नल हैडपंप कुँआ प्रकार बताणौ ।।
बेकार पाणिकि निकासी कसिक ,
सीवर सोकपिट नाली बणायी लोग
ना्णक लिजी आपण बाथरुम छैं,
या सामुदायकक करण रयी उपयोग
रसोई घर क् भितेर छु या छु बाहर,
भोजन कती करी  जां तैयार।
रेडु /टांजिस्टर छु या ना ,
मिकैं बतै दियो एक बार।।
घर में टेलीविजन रंगीन छु ,
या फिर छु ब्लैक एंड हृवाइट।
इंटरनेट सुविधा कंप्यूटर उपलब्धता 
कृपाकरि जवाब दि दिया राइट।।
टेलीफोन/मोबाइल फोन है छु,
 स्मार्टफोन छु या फिर साधारण।
इंटरनेट सुविधा मोबाइल में,
हमुकैं जुटाण छु सही विवरण ।।
साइकिल स्कूटर मोटरसाइकिल,
कार जीप वैन जो छु तुमर पास।
यैकि जानकारी हमुकैं बतै दियो,
जो आपूंक सफर बनाछ खास।।
चावो ग्यौ बाजुर ध्वग और लै,
मुख्य रुपल क्ये खांछा तुम अनाज,
आखरी में मोबाइल नंबर बतै दियो,
म्यर लै पुर है जा्ल आजक काज ।।
जनगणना बै जनकल्याण में,
महारजिस्ट्रार जनगणना अधिकारी।
सफल बनाण राष्ट्रीय कार्यक्रम कैं,
हम भारतवासियोंकि छु जिम्मेवारी चार्जअधिकारी सुपरवाइजर ईएन
कर्त्तव्यनिष्ठ बणि जुटी छैं दिन रात।
युं आँकड़े देशक विकासम् सहायक
भारत उन्नति करल हृवल नव प्रभात

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कृपाल सिंह शीला (स.अ.)
प्रगणक (En.), भिकियासैंण
अल्मोड़़ा (उत्तराखंड) 263680
मो./हृवटसैप- 9410501465

हिंसालू काफल

श्री रामचंद्र कह गये सिया से, ऐसा कलयुग आयेगा,
पहाड़ी नौकरी की खातिर शहरों में उम्र बितायेगा,
और डोट्याल जंगल घूम-घूम कर काफल-हिंसालू खायेगा। 
जिस गाँव ने पाला-पोसा,
वहीं ताला लटक जायेगा,
घर की चौखट रोती रह जाएगी,
और मालिक शहर में “सेटल” कहलायेगा।
ना खेत बचेंगे, ना गौशाला,
ना चौपाल में बात होगी,
बस व्हाट्सएप स्टेटस में
“मेरा उत्तराखंड” की बात होगी।

पहाड़

🏔️🌿 अहा… पहाड़ैक सौगात 🌿🏔️

मंडुवौक रवट…गदुवैक साग…
भटै चुड़काणि…दाड़िमै खटे…तिमिलक पात…
निमुवैक झोई…माणिरौक भात… 
अहा म्येरि पहाडै़ सौगात।।

ये सिर्फ खाने की चीजें नही है,य पहाड़क आत्मा छै…य उ स्वाद छ जो दिल्ली-हल्द्वानी की चमकदार प्लेटौं में कभी नि मिलण।

आज शहरों में हजारों रुपयाक पिज्जा-बर्गर खाण वाला मनखी,जब रात में अकेलो पड़ल,तब याद आँल —ईजाक हाथक झोई…चूल्हैक धुंवैं की खुशबू…और गाँवक वो मिट्टी,जमें अपनापन लागो

कितनी अजीब बात है ना…?

जिन पहाड़ौं में पैदा हुये,आज वही पहाड़ “पिछड़ो” लग रहा है।जिन खेतौं में बूब -बाबू दिन-रात खपिगे,आज उ खेत “बेकार” दिखण लाग गे।जिन घरौं में हँसी गूँजछी,आज उ घर ताला खा र छ…

गाँवक आँगन सूण पड़िगे…गोठ सूण पड़िगे…बैलों की घंटी सूण पड़िगे…और अब त धीरे-धीरे त्योहार भी सूण पड़ण लाग गे।

पहले छुट्टी मतलब गाँव हूछी…अब छुट्टी मतलब “टूर पैकेज” है गे।

पहले ईजा फोन करी —“कब आलैं?” अब हम कूनू —“टाइम नि छ…”

समय त सबक पास छ,बस अपणौं क लि जी नी बच रो

शहरक भीड़ में आदमी अमीर जरूर होल,पर भीतर बटि गरीब पड़ि गो।ना पड़ोसी अपण,ना बोली अपणी,ना त्यो त्यार आपण ना अपनापन…
और उधर…पहाड़ आज भी बाट देख रहै है… 

किसी खिड़की में बैठी ईजा,आज भी सड़क की ओर ताकदी होगी…कि शायद इस बार छुट्टियों में मेरो लाल घर ऐजाल…

बाबू आज भी खेत में काम करते-करते धीरे सैं कहते होंगे —“नानतीन शहर में खुश होल…”

पर सच पूछो त,सब सैं ज्यादा अकेलो आज पहाड़ छै। 

जिन गाँवौं में रामलीला, जागर, झोड़ा गूंजछि,आज वहाँ मोबाइलक रिंगटोन त छै,पर इंसानी हँसी कम पड़िगे।

अपणी बोली बोलण में शर्म,अपण पहनावा पहनण में झिझक,अपण खान-पान छोड़ण में “स्टेटस”…और फिर कौल —“पहाड़ खत्म हू रौ ”

पहाड़ अपने आप खत्म नि हो रौ…हम छोड़ रै य पहाड़ के।

याद धरिया —जब आखिरी गाँव सूण ह जाल नै,तब सिर्फ घर नि टूटल,पूरी पीढ़ी जड़ों सैं कट जाल।

इसलिए…जब भी मौका मिलै,लौट अया अपण गाँव।

दो दिन ही सही,पर ईजाक हाथक खाना खाल,बाबूक संग खेत घूम आल,मंदिर की घंटी सुन आल,और बच्चों को बता आल —“यै छ हमार असली पहाड़…”

क्योंकि —मंडुवौक रवट में जो स्वाद छै,वो पाँच सितारा होटल में न्हैं।गाँवक प्रेम में जो गर्माहट छै,वो शहरक एसी में न्हैं।और अपण मिट्टी में जो सुकून छै,वो दुनिया के किसी कोने में न्हैं।

🌿“जड़ौं सैं जुड़े रहै,तभी पहाड़ जीवित रहैगें…”🌿
देव सती पहाड़ी बटोही

बुधवार, 29 अप्रैल 2026

पहाड़ की सौगात

हिसालू की मिठास, काफल की लालिमा और किल्मोड़े की खटास…
ये सिर्फ जंगलों में उगने वाले फल नहीं हैं, ये पहाड़ के बचपन की यादें हैं। 
आज भी याद है वो दिन,
जब स्कूल से लौटते वक्त जंगल की पगडंडियों में दोस्त मिल जाते थे,
किसी के हाथ में हिसालू होते
कोई काफल तोड़ते-तोड़ते पेड़ पर ही चढ़ जाता,
और किल्मोड़े की झाड़ियों से बचते-बचाते  मुट्ठी भर फल जेब में भर ही लेते थे।
न नमक चाहिए था, न मसाले,
बस पहाड़ की हवा और अपने लोगों का साथ ही काफी था।
उस स्वाद में माँ की ममता थी,
बुरांश की खुशबू थी,
और गाँव की मिट्टी का अपनापन था।
आज शहरों की भीड़ में बैठे प्रवासी जब इन फलों का नाम सुनते हैं,
तो आँखों के सामने अपना गाँव घूम जाता है…
वो जंगल, वो पगडंडी, वो दोस्तों की टोली,
और वो बेफिक्र बचपन…
मन बस यही कह उठता है—
“काश…
एक बार फिर पहाड़ की उस डाल से टूटता काफल चख पाते,
हिसालू की मिठास हथेलियों में भर पाते,
और किल्मोड़े की खटास के साथ
अपने गाँव की हवा में दो पल फिर जी पाते…” 
देव सती पहाड़ी बटोही

बुधवार, 15 अप्रैल 2026

विकास क खेल

“विकास क खेल” 
आदू रात बे लैन लागिरै, मन मा धुका-धुक,
हो दाज्यू मन मा धुका-धुक।
सिलेंडर नि मिल हो दाज्यू, चुल में फुका-फुक,
हो दाज्यू चुल में फुका-फुक।
पैली पाँच सौ नोट हराय, आब हराय सिलेंडर,
स्कूल बै मास्टर हराय, अस्पताल बै डाक्टर।
लौंड-मौडों हैं ब्यौलि हराय, ईजै हैंणि ब्वारी,
यौ कस विकास छ दाज्यू, यौ कसि तैयारी।
पलायन को ढोल बजायो, खाली हैई री गौं,
नेता जी पोस्टर मा बस, जमीन मा सूना छौं।
चुनाव आयो गाड़ी भरि, वादा क पिटारा,
चुनाव गयो—सब गायब, ना कोई सहारा।
रोजगार क नाम मा दाज्यू, फॉर्म भरौं हजार,
पेपर लीक, भर्ती रुकि—युवक भया लाचार।
“सरकारी नौकरी होल तब”—यै नई बीमारी,
तब तक कुंवारा बैठो, टलि गै कन्याकुमारी।
किसान रात भर जागी रै, खेतन में पहरा,
सूअर-बंदर, भालू-स्याल—सब खै गो मेहनत सारा।
सरकार कागज मा लिखै—“मुआवजा तैयार”,
दफ्तर-दफ्तर चक्कर काटै, थकिगो बैचार।
विकास क नाम पर दाज्यू, बिकण लागो पहाड़,
रिसोर्टन क जंगल उग्या, उजड़ि गै घर-बार।
नदी-नाला बेचि द्यौ, खनन माफिया राज,
पानी सूखि, खेत उजड़्या—कस करलुं आज?
सड़कन क फोटो चमकैं, हकीकत मा खड्डा,
ठेकेदार-नेता मिलिके, बांटि लीनि डबलू की गड्डी।
बिजली-पानी कागज मा, भाषण मा विकास,
उत्तराखण्ड मा बस जुगाड़ चलै, जनता पूरी त्रास।
ईजा-ब्वारी बाट जोते, आंखि भरी दिन-रात,
बालक शहर मा फंसिगे, भूलि गै घर-गौं क बात।
देवभूमि क नाम बिकौ, धर्म क भी व्यापार,
मंदिर-धामन क आड़ मा, चलि रै ठेकेदार।
युवा सपनन बेचि द्यौ, पैसाक खेल महान,
“स्टार्टअप” क नाम द्यौ, खाली करि द्यौ खलियान।
जंगल काटि, पहाड़ फोड़ी, बोलन “ग्रीन मिशन”,
कागज मा सब ठीक छै, जमीन मा विनाशन।
दाज्यू अब त जागि जा, समझि जा ये चाल,
नहीं त अगली पीढ़ी पूछल—“का गछो पहाड़?”नई-नई पट्ट खुल गी, शराब क ठ्येक ठिकाण,
गौं-गौं मा नशा फैलिगो, उजड़ि गै परिवारन क मान।
युवा हाथन मा बोतल आई, छूटि गै किताब,
ईजा-बाबू रोवै बैठा, कस बनलुं हिसाब?
रोजगार नि मिलो दाज्यू, मिलि गै बस ठ्येक,
भविष्य बिकण लागो, पैसाक खेल देख।
स्कूल सूना, खेत उजाड़, भरिगे बस बजार,
“विकास” क यै मॉडल छै—जनता पूरी लाचार।
दाज्यू अब त जागि जा, उठि जा सब लोग,
नशा, भ्रष्टाचार, झूठ—सबका खोल दे रोग।
अपणो गौं, अपणो पहाड़, बचाणो अब काम,
नहीं त नाम रह जाल बस, मिट जाल सब धाम।

सोमवार, 13 अप्रैल 2026

चैंतव कौतिक

मेरी भानूमती – चैतआव कौतिक (कविता-देव सती पहाड़ी बटोही)

चैतआव कौतिक लागी, सैमधार रंगीलो,
डांडा-डांडा गूंजे, हर कोना हसीलो।
बुरांश फुली गै, लालिमा छाई,
मन को आंगन मा, माया रँग आई।
भानूमती संग मेरो, खुशियाली आई,
विकि हँसी में जसे, दुनिया समाई।
ढोल दमाऊं की थाप, दिल मा बसिगे,
हर धड़कन मा, सुर सजिगे।
चैतआव कौतिक मा, भीड़ भरी गै
नाच-गान में सारा दिन बिती गै
झोड़ा-चांचरी मा, घुमे सब लोग,
हँसी-खुशी में खोई, हर इक सोच।
हाथ मा हाथ धरी, गीत उठन लागा,
मन का हर कोना, प्रेम सैं जागा।
भानूमती संग मेरो, दिल जुड़न लागो,
हर इक पल अब, अपना बनन लागो।
जैनोली-पिलखोली, टाना-तस्वाड़,
खग्यार की माटी, स्नेह अपार।
सब मिल बैठी गै, कौतिक की छांव,
हर चेहरे मा खिलो अपनापन भाव।
चैत की यो रुत, यादगार बनि जां,
तेरो संग बितायो, हर पल बसि जां।
सैमधार कौतिक, दिल मा बसिगे,
तेरी याद संग, जीवन हँसिगे।
भानूमती बिना अब, कछु नै दिखे,
तेरो नाम लियूं, हर सांस क साथ,
तू ही मेरी खुशी, तू ही मेरी बात।
स्याल्दे बिखौती, द्वाराहाट को मेला,
देवभूमि मा सजा, रंगीलो खेला।
नाच-गाना, भक्ति, खुशियाली का दौर,
तेरो संग चलूं मैं, हर इक ठौर।
सैमधार सैं उठी, माया की डोर,
द्वाराहाट तक पहुंची, दिल की डोर।
भानूमती संग मेरो, जीवन सवरिगे,
हर इक सपना अब, साँच बनिगे।
ओ मेरी भानूमती, सैमधार मा आ,
मंदिर आंगन मा, संग झोड़ा खेला जा।
चैतआव कौतिक की, रौनक देख जा,

बुधवार, 1 अप्रैल 2026

हनुमान जन्मोत्सव

🚩 हनुमान जन्मोत्सव 

आज गगन मे गूँज छ एक अद्भुत पुकार
जय बजरंगी जय मारुति, संकट काटनहार
अंजनी क आँगन मे दिव्य उज्यालो आयो
पवन जस तेज बालक जग मे बल दीप जगायो
नान्-नान् चरण मे शक्ति नैनन मे तेज अपार
बालपन मे सूरज छू ल्यौ  फल समझि संसार
राम नाम की ज्योति जली हर एक सांस मे
भक्ति बणी पहचान उकी बसि ग्या राम विश्वास मे
लंका क राजा को मान तोड़्यो अहंकार झुकायो
एक दास भक्ति बल राम राज बढ़ायो
 पहाड़ उठायो सहजै उनूल जब लक्ष्मण जीवण हारे
सेवा मे जो अडिग रये उई सच्चा सहारे
ना चा सिंहासन उनूल ना चा मान-सम्मान
“राम-राम” धुन मे मगन रयी मेरो बजरंगी हनुमान
आज ले जो सच्चे मन  उनर नाम पुकारो
संकट काटि पल भर मे द्वार दौड़ी आयो
हे पवनसुत वीर हनुमान राखो आपणी छाया
भक्ति बल बुद्धि क जीवन मे दीप जलाया।
जय श्री राम – जय हनुमान