पहले देश अंग्रेजों का गुलाम था,
आज जनता वादों और जुमलों की कैदी है।
तब लड़ाई आज़ादी की थी,
अब लड़ाई सच और समझदारी बचाने की है।
सड़कें वही टूटी हैं,
समस्याएँ वही पुरानी हैं,
बस नेताओं के बंगले और भाषण
हर साल नए हो जाते हैं।
स्कूलों में मास्टर नहीं,
अस्पतालों में डॉक्टर नहीं,
और सड़कों पर गड्ढे इतने हैं
कि सफ़र कम, एडवेंचर ज़्यादा लगता है।
जंगली जानवर जंगल छोड़ आबादी में घूम रहे हैं,
पहाड़ विकास के नाम पर धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं।
विडंबना देखिए जनाब —
जिस देश में नदियाँ सबसे ज़्यादा हैं,
वहीं लोग पानी और सिंचाई के लिए तरस रहे हैं।
गाँव के खड़ंजे हों या डामरीकरण,
काम ऐसा कि बनने से पहले टूटने लगता है।
पुल पाँच साल नहीं टिकते,
मगर उद्घाटन के पोस्टर सालों तक चमकते रहते हैं।
एक तरफ अंधाधुंध खनन जारी है,
दूसरी तरफ जंगल और पहाड़ काटे जा रहे हैं।
प्रकृति रोज़ कमजोर हो रही है,
और नेता रोज़ मजबूत।
जनता महँगाई से दब रही है,
लेकिन नेताओं के वेतन-भत्ते लगातार बढ़ रहे हैं।
पाँच साल जनता याद नहीं आती,
फिर चुनाव आते ही
सोशल मीडिया पर अचानक “विकास” दौड़ने लगता है।
नेता फिर हाथ जोड़कर कहेंगे —
“इस बार मौका दीजिए, सब बदल देंगे।”
और जनता फिर सोचती रह जाएगी —
“पहले बदला क्या था?”
अब हाल ये है जनाब —
देश समस्याओं से कम,
चुनावी भाषणों और दिखावटी वादों से ज़्यादा परेशान है।
सड़क टूटे तो जनता की किस्मत,
पुल टूटे तो प्राकृतिक आपदा,
लेकिन कुर्सी कभी नहीं टूटनी चाहिए —
बस यही सबसे बड़ा विकास मॉडल बन गया है।
अब मिट्टी, नदियाँ और पहाड़ तक बेचैन हैं,
मगर नेताओं की सुविधाएँ
दिन-दूनी, रात-चौगुनी बढ़ रही हैं।
लोग अब कहते हैं —
“अंग्रेजों से तो आज़ाद हो गए,
अब नेताओं की नौटंकी से आज़ादी चाहिए।
#व्यंग्य #राजनीति #सिस्टम #जनता #सच्चाई #चुनाव #विकास #पहाड़ #गाँव #महँगाई
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें