°°°°°°°°घुघुतिया त्यार°°°°°°
( कुमाऊँ की स्मृतियों और पलायन के बीच एक लोक कविता)
नान छनां, मैं सोचछीं—
य चार-चार-चार (४४४)
किलै बनूं री?
कौ किताब मैं लेख रो?
कौ मास्टर, कौ पंडित
ज्यूल पढ़ै रो?
यैक क्यें हिसाब लगूं रो?
और यैक नाम घुघुत
किलैं कू रो?
ना पाँख, ना पूँठ,
ना मुनव, ना खुट,
ना हिटणी, ना उड़ाणी,
ना फरफड़ाणी—
फिर ले यैहू
घुघुत किलैं कू रो?
यू त गुड़ क पाक मैं
घ्यूँ-पिसू मिलै बैर,
हाथूं क साँच मैं
ढलैं बैर—
मीठो, सादा,
खास-खास
बनूं रो।
नान छनां जब हम
माघा क दिन गिनछीं,
त्यारों क इंतजार करछीं—
उ दिवाई ना होई,
धुधुती त्यार हूछी।
ईज रत्ति-फजल उठी,
चूल्हौ फूँकि,
घ्यूँ चढ़ी,
पिसू सानी,
हम भैं-बैणी
आस-पास भै रोछीं—
“ईज, घुघुत बणै बैर?”
पैली घुघुत
काव है धरैछी,
लम्ब-लम्ब धुधुती माव
हमूंहू गठें दीछी।
घुघुत धागूं मैं बांधि,
खिड़की-छज्जा
सजी जांछी।
फिर दूहर दिन
कौवां कै बूलोछी—
“काले कव्वा,
काले घुघुती,
माला खाले कूछी!”
पर आज…
हमर गों मैं
खिड़की बंद छ,
छज्जा सूना छ।
ना धागूं मैं
घुघुत लटकूं,
ना नानतिनों क
हंसी छ।
गों-गों पलायनैं
मार झैलें रौं।
क्वैं रोज़गार न्हैं,
क्वैं पढ़ाई न्हैं,
क्वैं स्वास्थ्य सुविधा न्हैं—
यई मजबूरी छ।
गों बटी निकल बैर
भाबरों मैं
भबरी जारो।
गों मैं आज
लम्ब-चौड़ बाखई न्हैती,
एक हाथ लम्ब
घुघुती क माव
अब कहानी बणी गै।
काले-काले,
कालें कैबैर—
आज बुलांणि वाल
उ आवाज
आज सुन्न छ?
आज ना काव बच री,
ना घुघुती माव,
ना उ रंगत,
ना उ स्वाद,
जो नानछनों क
संज्ञानों मैं हूछी।
आज त्यार छ—
पर फोटो मैं,
रील मैं,
स्टेटस मैं।
घुघुती हाथ मैं कम,
मोबाइल हाथ मैं ज्याद।
फिर भी…
माघा आयो छ,
उत्तरैणि आयी छ।
सूरज मकर राशि मैं
आज प्रवेश करूं छ।
नव उज्यालों,
नव शुरुआत—
पर पहाड़
आज ले भी
अपण बात कहूं छ।
माघा क मंगल हूनी,
पूषाक इतवार,
य बार उत्तरैणी कौतिक
जाया बागेश्वरै बजार!
ढोल-दमाऊँ,
झोड़ा-चांचरी
आज ले बाट देखनि।
क्वैं मनै ल्या भों,
क्वैं मनै ल्या आज—
पर अपूंण संस्कार,
अपूंण बोली,
अपूंण त्यार
ना छूटण दिया।
घुघुती भले
आज कम बणी,
पर यादूं मैं
आज भी मीठी छ।
✍️ देव सती
(पहाड़ी बटोही)
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