अंकिता की लाश पर खड़े हो
तुम झंडे ऊँचे कर रहे हो,
शर्म अगर ज़िंदा होती
तो ये रंग खुद झुक रहे होते।
न्याय माँगने आए हो या
भीड़ में अपना नाम चमकाने?
CBI की पुकार से ज़्यादा
तुम्हें पोस्टर हैं छपवाने।
जिस बेटी की साँस छीनी गई,
उसका कोई दल नहीं था,
वो वोट नहीं थी, वो नारा नहीं,
बस एक ज़िंदा इंसान थी—
या शायद अब वो भी कम था?
अगर आंदोलन सच्चा है,
तो झंडे घर छोड़ आओ,
अंकिता के नाम पर
अपनी राजनीति मत सजाओ।
क्योंकि याद रखना—
इतिहास सवाल करेगा,
तुम न्याय के साथ थे
या झंडे के पीछे छिपे थे।
देव सती( पहाड़ी बटोही)
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