जौं सग्यान – प्रकृति, संस्कृति और जीवन क त्यार
जौं सग्यान, प्रकृति क त्यार
ठंडा हाव में गर्मी क एहसास
धूप नरम मन में जगे नई आस
जौं सग्यान ल्या उल्लास
रितू बदल बदल संसार
फुल खिले, बुरांश हँसे
हर डाल पर जीवन अपार
खेतन में लहलहाणि नई फसल
माटी बोलै, बीज हँसै
मेहनत को फल आयो आज
हर दिशा में खुशियाँ मचल
घर-आँगन में हर्ष अपार
नौळ-धार गुनगुनान लागे
हाव दगड़ बग री रंगों क सुर
फिजाँ में घुल्यो मीठ गान
खेतन में छै सरसों को भुड़
पीळ रंग ल्यावै मुस्कान
घसियारी गीत गुनगुनान
बचपन फिर लौटि आयो
यादन में बसी हर क्षण
हर पीळ रुमाव दगड़ बधी छ प्यार
जौं सग्यान पर्व अपार
वीणावादिनी मय्या सरस्वती
ज्ञान-बुद्धि को दीप जलाय
अज्ञान अंधेर हटाय द्ये
सत्य-विवेक को मार्ग दिखाय
कागज-कलम, वीणा-वादन
विद्या को साज सजे
सबों मन मे श्रद्धा भरे
आपूण संस्कृति को त्यार दगड़
रीति-रिवाजन को मान
जो सिखायो पुरखों ने हमूकें
उई छ जीवन को ज्ञान
न मोबाइल, न दिखावा
न बनावटी संसार
साद जीवन, ऊँचो विचार
यै छ पर्व क सार
यै छ संस्कृति, यै छ पहचान
यै छ पहाड़न को आधार
जौं सग्याणि ल्या संदेश
प्रकृति संग जीणो सीख
माटी, पानी, जंगल बचाया
यै छ भविष्य क नींव
आओ मिलिकै यो पर्व मनाया
सबूं के जीवन में उजियालो ल्यावै
जौं सग्यान त्यार।
वसंत पंचमी / जौं सग्यान की
हार्दिक शुभकामनाएँ 🙏
देव सती
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