🏔️🌿 अहा… पहाड़ैक सौगात 🌿🏔️
मंडुवौक रवट…गदुवैक साग…
भटै चुड़काणि…दाड़िमै खटे…तिमिलक पात…
निमुवैक झोई…माणिरौक भात…
अहा म्येरि पहाडै़ सौगात।।
ये सिर्फ खाने की चीजें नही है,य पहाड़क आत्मा छै…य उ स्वाद छ जो दिल्ली-हल्द्वानी की चमकदार प्लेटौं में कभी नि मिलण।
आज शहरों में हजारों रुपयाक पिज्जा-बर्गर खाण वाला मनखी,जब रात में अकेलो पड़ल,तब याद आँल —ईजाक हाथक झोई…चूल्हैक धुंवैं की खुशबू…और गाँवक वो मिट्टी,जमें अपनापन लागो
कितनी अजीब बात है ना…?
जिन पहाड़ौं में पैदा हुये,आज वही पहाड़ “पिछड़ो” लग रहा है।जिन खेतौं में बूब -बाबू दिन-रात खपिगे,आज उ खेत “बेकार” दिखण लाग गे।जिन घरौं में हँसी गूँजछी,आज उ घर ताला खा र छ…
गाँवक आँगन सूण पड़िगे…गोठ सूण पड़िगे…बैलों की घंटी सूण पड़िगे…और अब त धीरे-धीरे त्योहार भी सूण पड़ण लाग गे।
पहले छुट्टी मतलब गाँव हूछी…अब छुट्टी मतलब “टूर पैकेज” है गे।
पहले ईजा फोन करी —“कब आलैं?” अब हम कूनू —“टाइम नि छ…”
समय त सबक पास छ,बस अपणौं क लि जी नी बच रो
शहरक भीड़ में आदमी अमीर जरूर होल,पर भीतर बटि गरीब पड़ि गो।ना पड़ोसी अपण,ना बोली अपणी,ना त्यो त्यार आपण ना अपनापन…
और उधर…पहाड़ आज भी बाट देख रहै है…
किसी खिड़की में बैठी ईजा,आज भी सड़क की ओर ताकदी होगी…कि शायद इस बार छुट्टियों में मेरो लाल घर ऐजाल…
बाबू आज भी खेत में काम करते-करते धीरे सैं कहते होंगे —“नानतीन शहर में खुश होल…”
पर सच पूछो त,सब सैं ज्यादा अकेलो आज पहाड़ छै।
जिन गाँवौं में रामलीला, जागर, झोड़ा गूंजछि,आज वहाँ मोबाइलक रिंगटोन त छै,पर इंसानी हँसी कम पड़िगे।
अपणी बोली बोलण में शर्म,अपण पहनावा पहनण में झिझक,अपण खान-पान छोड़ण में “स्टेटस”…और फिर कौल —“पहाड़ खत्म हू रौ ”
पहाड़ अपने आप खत्म नि हो रौ…हम छोड़ रै य पहाड़ के।
याद धरिया —जब आखिरी गाँव सूण ह जाल नै,तब सिर्फ घर नि टूटल,पूरी पीढ़ी जड़ों सैं कट जाल।
इसलिए…जब भी मौका मिलै,लौट अया अपण गाँव।
दो दिन ही सही,पर ईजाक हाथक खाना खाल,बाबूक संग खेत घूम आल,मंदिर की घंटी सुन आल,और बच्चों को बता आल —“यै छ हमार असली पहाड़…”
क्योंकि —मंडुवौक रवट में जो स्वाद छै,वो पाँच सितारा होटल में न्हैं।गाँवक प्रेम में जो गर्माहट छै,वो शहरक एसी में न्हैं।और अपण मिट्टी में जो सुकून छै,वो दुनिया के किसी कोने में न्हैं।
🌿“जड़ौं सैं जुड़े रहै,तभी पहाड़ जीवित रहैगें…”🌿
देव सती पहाड़ी बटोही
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