हिसालू की मिठास, काफल की लालिमा और किल्मोड़े की खटास…
ये सिर्फ जंगलों में उगने वाले फल नहीं हैं, ये पहाड़ के बचपन की यादें हैं।
आज भी याद है वो दिन,
जब स्कूल से लौटते वक्त जंगल की पगडंडियों में दोस्त मिल जाते थे,
किसी के हाथ में हिसालू होते
कोई काफल तोड़ते-तोड़ते पेड़ पर ही चढ़ जाता,
और किल्मोड़े की झाड़ियों से बचते-बचाते मुट्ठी भर फल जेब में भर ही लेते थे।
न नमक चाहिए था, न मसाले,
बस पहाड़ की हवा और अपने लोगों का साथ ही काफी था।
उस स्वाद में माँ की ममता थी,
बुरांश की खुशबू थी,
और गाँव की मिट्टी का अपनापन था।
आज शहरों की भीड़ में बैठे प्रवासी जब इन फलों का नाम सुनते हैं,
तो आँखों के सामने अपना गाँव घूम जाता है…
वो जंगल, वो पगडंडी, वो दोस्तों की टोली,
और वो बेफिक्र बचपन…
मन बस यही कह उठता है—
“काश…
एक बार फिर पहाड़ की उस डाल से टूटता काफल चख पाते,
हिसालू की मिठास हथेलियों में भर पाते,
और किल्मोड़े की खटास के साथ
अपने गाँव की हवा में दो पल फिर जी पाते…”
देव सती पहाड़ी बटोही
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