जून न्हैं गो, पहाडो़ं रौनक लै न्हैं गै
क्वैं शहर न्हैं गो, क्वैं भाबर न्हैं गो..
और दगाड़ में लि गई प्याज कट्ट, पूलम, खुमानी, बेडू, तिमिल फोटो खिचीं स्यट...
और जन तका कै गई, असोज में भेज दिया पिहव काकड़,लाल गदू, मूवक फांच...
उ आइ, कुछ दिन बढ़ें गई गौंनौं मे चहल-पहल...
कुछ हमूहें सीख बैर, कुछ हमूहैं सीखें बैर...
सीख बैर गई आलू थैचूं और भट्टाक डूबुक बनूण , हमूकैं सीखैं बैर गई जन्मदिन-सालगिरह मनूण, रील-ब्लॉग बनूण, किटी पार्टी करण, कारों में, धारों में, गौंनौं क बजारु में...
देवी-देवताओं क मंदिरों में बजै गई घंटी, बतै गई इनर धार्मिक महत्ता...
आपणि तो मजबूरी बतै बैर, समझै गई हमूकें क्यारीं, खेतबाड़ी, गौरु-भैंस पालण, स्वरोजगार क फैद...
बस कुछै दिन ठाड़ी रई, गौंनौंक तलि-मलि सारियों में लाल-सफेद चमचमान कार, जो सरपट दौड़बैर फिर आघिल क्वैं कामकाजों में आल, हमर हाथ ले बटाल...
आब हमर यकलैपन कें देख बैर, ऐ गै रिमझिम बरखा क बूंद, निकल ऐ गई घा कोंपल, डानूंक उड़ी कूहर...
आब तो छौय ले फूटाल, गध्यर लें पुकारंल, उनूकें तरसाल, हर्षाल, और फिर यई बूलाल...
जय देवभूमि, जय उत्तराखण्ड।
— देवसती पहाड़ी बटोही
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें