शनिवार, 31 जनवरी 2026

गुड़ होता तो आटा पैंचा कर लेते मगर घी नही है



हलवा खाने का मन है, आटा जनता ले आए,
गुड़ की व्यवस्था हो जाएगी—ऐलान किया जाए।
घी की बारी आते ही समिति बैठ जाती है,
फ़ैसला अगली तारीख़ में बदल जाता है।

चुनाव में सब रसोइया बन जाते हैं,
कढ़ाही जनता की, चम्मच ये चलाते हैं।
वादे उबलते हैं भाषण की आँच पर,
बनता कुछ नहीं—बस धुआँ बहुत आता है।

खाने का समय हो तो ‘हम-हम’ होता है,
खर्च की बात हो तो ‘तुम-तुम’ होता है।
हलवा जनता का, स्वाद सत्ता का,
और जिम्मेदारी? वो फ़ाइलों में सोता है।
देव सती पहाड़ी बटोही 

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