पहाडों में 'धन्यवाद' जैसा कोई शब्द नहीं होता था । किसी ने एहसान या मदद कर दी तो उसके बदले कहा जाता था - तुमर भल हैजौ , तुमार नानतिन बची रून , तुमार खुटन कान् ले झन बुडो़ , अगर एहसान ज्यादा ही हुवा तो कहेते थे तुमरि एकै एक्कीस / पांचै पंच्चीस हैजौ, जै जै कारी हैजौ । बाद में जब धन्यवाद शब्द चलन में आया तो शुरु में लोग मजाक में कहते ... हैगोय यो धणियोंपात रूण दिओ ।
अब बात करते हैं मिठाई की ... मिठाई का मतलब गुड़ होता था ... लोग कहा करते थे ... पास हैगो बल तुमर च्योल ... गूड़ खवाओ . यहां भी जवाब में धन्यवाद नहीं कहा जाता था ... कहते ... होय हैगोपै तुमार आशीर्वादल ... घर आया एक आंगू पिठ्या लगै ल्हिजया और गूड़ ले खै जया ... हर खुशी के मौके पर गुड़ बाटा जाता था और बधाई देने आये ब्यक्ति या महिला को पिठ्या ( टीका ) भी लगाया जाता ... कई बार अगर दोपहर या शाम को लोग बधाई देने किसी के घर जाते तो वहां पिठ्या लगता ... तो वापस जाने पर रास्ते में लोग पूछते कि - के बात आज बड चर-बर पिठ्या लगै राखौ ... चर बर मतलब लम्बा चौडा चटक गहरा ... वह बताता ... अरे फलाने का नाती हुवा है, वहां गया था ... इससे एक बात और होती कि लोगों को धीरे धीरे ये खुशखबरी मिल जाती, लोग अपने आप बधाई देने निकल पडते बधाई देने को - *भलि भट्यूण* कहते थे । बधाई शब्द भी प्रचलन में नहीं था ... बधाई के लिए प्रयुक्त होता - भल भै तुमर नाति हैगो , भल भै तुमर च्योल पास हैगो, भल भै तुमर च्योलक ब्या ठैरी गो ... जवाब वही होता ... होय यो सब तुम लोगनक आशीर्वाद छू। कल्पना कीजिए बधाई है - धन्यवाद की जगह जब इन आत्मीयता वाले शब्दों का प्रयोग होता होगा, तो कितना सुख कितने अपनेपन का अहसास होता होगा । किसी के पास होने पर , लड़का , लड़की होने पर , बच्चों की शादी तय होने पर , शादी हो जाने पर , नौकरी लगने पर, जनेऊ होने पर , किसी का लापता सदस्य पुन: घर वापसी पर ... भलि भट्याने का प्रचलन था, वो भी उसके घर जाकर । इसके लिए कुछ अच्छे वार (दिन) तय थे ... शनिवार व मंगलवार भलि भट्याने के लिए वर्जित थे । घर वाले भी अनुमान लगाते कि आज मंगल है कोई नहीं आएगा फलां काम निपटा लो या आज भल वार छू , मैंस भल भट्यूणहुं आल ... आज घरै रया सब लोग साथ में जब भल भट्याने आते तो, चाय की केतली पूरे दिन के लिए रौन पर चढ जाती, घर के सारे सदस्य आवभगत में लग जाते, महिलाऐं भीतर चाय पानी पीती बडे़ बुजुर्ग आये होते तो चाख में उनके लिए ह्वाक चिलम में तम्बाकू कोयले सज जाते ... एक बात और होती, जिसके यहां परिवार छोटा हो या घर में महिला एक ही हो तो वहां पर भल भट्याने आई महिलाएं मदद भी करती थी, जैसे चाय बनाना, गायों को पानी देना आदि क्योंकि घर की गृहणी तो मेहमानों को पौ - पिठ्या लगाने, गूड़ बाटने में ही लगी रह जाती . यहीं पर अगर किसी के घर बाल बच्चा हुवा हो तो घर की मुखिया गृहणी भलि भट्याने आई महिलाओँ को शाम को आकर गीत गाकर जाने का न्योता भी दे देतीं यहीं पर दुणआँचव के कुछ पैसे और एक कागज की पुडिया में घर के लिए गुड दे दिया जाता । बडे बुजुर्ग व जवान लोग चर्चा करते नामकरण में कतु आदिम खवाला, हमार हातक जो काम होल बताया । क्वे नानतिनाक हात ले जवाब भेज दिया, उसिक हम बीच बीच में आते रूल ... आज की तरह नहीं होता कि - पार्टी कब दे रहे हो ... शाम को कहां मिलोगे ... तब ये चीजे निषेध थीं ।
तब एक परम्परा और भी थी - किसी कन्या के जन्म के बाद लडका हो गया तो उसकी लड़की को शकुन्नी समझा जाता और उसकी पीठ पर गुड़ की भेली फोडी जाती । यदि परिवार में बार दिनी बिरादरी में या नजदीकी रिश्तेदारी में एकसाथ दो बच्चे नामकरण की अवधि तक पैदा हो गये तो उन बच्चों को औ-छौ कहा जाता था बाद में एक छोटा सा प्रोग्राम करके उनके कपडे-धागुले वगैरह आपस में बदले जाते ... इस कार्यक्रम को औ-छौ बाटना कहा जाता था इसे कुछ कुछ दो समधनों के समद्योड कार्यक्रम जैसा ही समझिये ।
मुझे तो लगता है कि हमारे बुजुर्गों ने जिस प्रकार ये रीति रिवाज बनाये होगे उनका मकसद यही रहा होगा कि लोगों की आपस में आत्मीयता बढे, एक दूसरे की मदद की भावना आये , सभी एक दूसरे की खुशियों को अपना समझकर साझा करें । आज के व्यस्त समय में कुछ कोशिश कर हम इन परम्पराओं को जीवित रख सकें तो बहुत ही अच्छा होगा ... आज तो हम यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि फलां ने मुझे बताया थोडी , मुझे बुलाया ही नहीं ... मैं क्यों जाऊ .. या रास्ते में मिला था बधाई दे तो दी ।
आगे को व नई पीढ़ी को जरूर भेजना
शुभं भवतुः सर्वदा
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