कोवा की नई माँग
नहीं आऊँगा, लाख बुला लो,
मैं ना खाऊँगा, तुम ही खा लो।
मेरे लिए सूखे घुगुतें
अपना मोमो खाते हो,
मेरे लिए दाड़िम, डमरू,
अपना पिज़्ज़ा मंगवाते हो।
मेरी माला में भी जब
चाउमीन लिपटाओगे,
तब सोचूँगा आने की
जब बर्गर भी लटकाओगे।
वरना तेरे चिल्लाने से
क्यों आऊँ मैं? बँधा नहीं,
कान खोल के सुन ले तू,
कोवा हूँ मैं, गधा नहीं।
अब कोवा भी समझदार हो गया,
समय के साथ बदल गया,
डमरु, दाड़िम,घुगुतें की माला
अब कहानी बन गया।
पहले छज्जे-छज्जे घूमते थे
काले कंठ में बोलते थे,
आज शहर की छतों पर
प्लास्टिक, धुआँ, शोर भरा।
कहता है—
“मेरे हिस्से का संस्कार
तुमने खुद ही खा डाला,
मेरे नाम का त्यौहार
तस्वीरों में सजा डाला।
मेरे लिए सूखा टुकड़ा,
अपने लिए थाली भर,
मेरे गीत बस ‘काँव-काँव’,
अपने लिए DJ का स्वर।
मैं त्यौहार का बहाना था,
तुम अपनों से मिलने का,
आज मुझे ही भूल गए
शौक़ मोबाइल में रहने का।
अगर बुलाना है तो ऐसे बुलाओ,
जैसे पहले बुलाते थे,
थोड़ा मन, थोड़ा अपनापन
छज्जों पर लटकाते थे।
वरना मत बुलाओ अब,
मैं भी आत्मसम्मान रखता हूँ,
कोवा हूँ, मजबूर नहीं,
समय की भाषा समझता हूँ।”
और पहाड़ चुपचाप खड़ा है,
सब कुछ देख-सुन रहा,
कोवे की इस नई माँग में
अपना ही सच चुन रहा।
यह कविता सवाल पूछती है
हम त्यौहार बचा रहे हैं या बस उसकी तस्वीरें?
संस्कार बाँट रहे हैं या सिर्फ़ पोस्ट कर रहे हैं? घुगुतिया त्यार की शुभकामनाएँ
परंपरा निभाएँ, दिखावा नहीं
देव सती (पहाड़ी बटोही)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें