सोमवार, 13 जुलाई 2026

काश इस बार... (व्यंग्य कविता)




काश इस बार उत्तराखण्ड में ऐसी सरकार बने,
जो भाषण नहीं, हिसाब देने का साहस करे।
हर चुनाव में वही पुराना गीत—
शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार की बात,
जीत मिलते ही सब गायब,
जनता फिर अकेली रात।
विद्यालयों में ताले लटके,
अस्पतालों में डॉक्टर कम,
रोज़गार की राह न दिखी,
युवा भटकते कदम-कदम।
पलायन की पीड़ा पूछो,
सूने पड़े हैं गाँव,
नेता जी मंचों पर कहते—
"देखो, कितना हुआ विकास!"
घोषणापत्र में सपनों की खेती,
धरती पर सूखा हाल,
फीते कटते, फोटो छपते,
जनता पूछे—"काम का क्या हाल?"
नेता जी!
आप शासक नहीं, जनसेवक हैं,
इतना तो याद रखिए।
कुर्सी जनता की अमानत है,
इसे विरासत मत समझिए।
जिस दिन शिक्षा बिकना बंद होगी,
स्वास्थ्य भटकना छोड़ देगा,
रोज़गार घर-घर पहुँचेगा,
और पलायन रुक जाएगा—
उसी दिन जनता कहेगी,
"अबकी बार सचमुच सरकार बनी है,
सिर्फ़ सत्ता नहीं।"
पहाड़ी बटोही

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