“विकास क खेल”
आदू रात बे लैन लागिरै, मन मा धुका-धुक,
हो दाज्यू मन मा धुका-धुक।
सिलेंडर नि मिल हो दाज्यू, चुल में फुका-फुक,
हो दाज्यू चुल में फुका-फुक।
पैली पाँच सौ नोट हराय, आब हराय सिलेंडर,
स्कूल बै मास्टर हराय, अस्पताल बै डाक्टर।
लौंड-मौडों हैं ब्यौलि हराय, ईजै हैंणि ब्वारी,
यौ कस विकास छ दाज्यू, यौ कसि तैयारी।
पलायन को ढोल बजायो, खाली हैई री गौं,
नेता जी पोस्टर मा बस, जमीन मा सूना छौं।
चुनाव आयो गाड़ी भरि, वादा क पिटारा,
चुनाव गयो—सब गायब, ना कोई सहारा।
रोजगार क नाम मा दाज्यू, फॉर्म भरौं हजार,
पेपर लीक, भर्ती रुकि—युवक भया लाचार।
“सरकारी नौकरी होल तब”—यै नई बीमारी,
तब तक कुंवारा बैठो, टलि गै कन्याकुमारी।
किसान रात भर जागी रै, खेतन में पहरा,
सूअर-बंदर, भालू-स्याल—सब खै गो मेहनत सारा।
सरकार कागज मा लिखै—“मुआवजा तैयार”,
दफ्तर-दफ्तर चक्कर काटै, थकिगो बैचार।
विकास क नाम पर दाज्यू, बिकण लागो पहाड़,
रिसोर्टन क जंगल उग्या, उजड़ि गै घर-बार।
नदी-नाला बेचि द्यौ, खनन माफिया राज,
पानी सूखि, खेत उजड़्या—कस करलुं आज?
सड़कन क फोटो चमकैं, हकीकत मा खड्डा,
ठेकेदार-नेता मिलिके, बांटि लीनि डबलू की गड्डी।
बिजली-पानी कागज मा, भाषण मा विकास,
उत्तराखण्ड मा बस जुगाड़ चलै, जनता पूरी त्रास।
ईजा-ब्वारी बाट जोते, आंखि भरी दिन-रात,
बालक शहर मा फंसिगे, भूलि गै घर-गौं क बात।
देवभूमि क नाम बिकौ, धर्म क भी व्यापार,
मंदिर-धामन क आड़ मा, चलि रै ठेकेदार।
युवा सपनन बेचि द्यौ, पैसाक खेल महान,
“स्टार्टअप” क नाम द्यौ, खाली करि द्यौ खलियान।
जंगल काटि, पहाड़ फोड़ी, बोलन “ग्रीन मिशन”,
कागज मा सब ठीक छै, जमीन मा विनाशन।
दाज्यू अब त जागि जा, समझि जा ये चाल,
नहीं त अगली पीढ़ी पूछल—“का गछो पहाड़?”नई-नई पट्ट खुल गी, शराब क ठ्येक ठिकाण,
गौं-गौं मा नशा फैलिगो, उजड़ि गै परिवारन क मान।
युवा हाथन मा बोतल आई, छूटि गै किताब,
ईजा-बाबू रोवै बैठा, कस बनलुं हिसाब?
रोजगार नि मिलो दाज्यू, मिलि गै बस ठ्येक,
भविष्य बिकण लागो, पैसाक खेल देख।
स्कूल सूना, खेत उजाड़, भरिगे बस बजार,
“विकास” क यै मॉडल छै—जनता पूरी लाचार।
दाज्यू अब त जागि जा, उठि जा सब लोग,
नशा, भ्रष्टाचार, झूठ—सबका खोल दे रोग।
अपणो गौं, अपणो पहाड़, बचाणो अब काम,
नहीं त नाम रह जाल बस, मिट जाल सब धाम।