सोमवार, 13 अप्रैल 2026

चैंतव कौतिक

मेरी भानूमती – चैतआव कौतिक (कविता-देव सती पहाड़ी बटोही)

चैतआव कौतिक लागी, सैमधार रंगीलो,
डांडा-डांडा गूंजे, हर कोना हसीलो।
बुरांश फुली गै, लालिमा छाई,
मन को आंगन मा, माया रँग आई।
भानूमती संग मेरो, खुशियाली आई,
विकि हँसी में जसे, दुनिया समाई।
ढोल दमाऊं की थाप, दिल मा बसिगे,
हर धड़कन मा, सुर सजिगे।
चैतआव कौतिक मा, भीड़ भरी गै
नाच-गान में सारा दिन बिती गै
झोड़ा-चांचरी मा, घुमे सब लोग,
हँसी-खुशी में खोई, हर इक सोच।
हाथ मा हाथ धरी, गीत उठन लागा,
मन का हर कोना, प्रेम सैं जागा।
भानूमती संग मेरो, दिल जुड़न लागो,
हर इक पल अब, अपना बनन लागो।
जैनोली-पिलखोली, टाना-तस्वाड़,
खग्यार की माटी, स्नेह अपार।
सब मिल बैठी गै, कौतिक की छांव,
हर चेहरे मा खिलो अपनापन भाव।
चैत की यो रुत, यादगार बनि जां,
तेरो संग बितायो, हर पल बसि जां।
सैमधार कौतिक, दिल मा बसिगे,
तेरी याद संग, जीवन हँसिगे।
भानूमती बिना अब, कछु नै दिखे,
तेरो नाम लियूं, हर सांस क साथ,
तू ही मेरी खुशी, तू ही मेरी बात।
स्याल्दे बिखौती, द्वाराहाट को मेला,
देवभूमि मा सजा, रंगीलो खेला।
नाच-गाना, भक्ति, खुशियाली का दौर,
तेरो संग चलूं मैं, हर इक ठौर।
सैमधार सैं उठी, माया की डोर,
द्वाराहाट तक पहुंची, दिल की डोर।
भानूमती संग मेरो, जीवन सवरिगे,
हर इक सपना अब, साँच बनिगे।
ओ मेरी भानूमती, सैमधार मा आ,
मंदिर आंगन मा, संग झोड़ा खेला जा।
चैतआव कौतिक की, रौनक देख जा,

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें