रविवार, 1 मार्च 2026

बसंत और होली

य मस्ताना फागुन में, फिर चली मधुर पुरवाई छ,
फिर से होली आई छ, पर जेब खाली पाई छ…।।
गगन में उड़ी रंग हजार,
महँगाई मुस्काई छ,
अबीर–गुलाल छोड़ि सब
सेल्फी रंग छाई छ।
फिर से होली आई छ, पर जेब खाली पाई छ…।।
ढोल–दमाऊँ बाजन लागा,
डीजे धुन बजाई छ,
बैठकी होली छोड़ि कै सब
मोबाइल मा समाई छ।
फिर से होली आई छ, पर जेब खाली पाई छ…।।
बुरांश फुलि गै डांड्यों मैं,
पर नौजवान पलायन छ,
गांव सूना, चौपाल सूनी,
सपना सब प्रवासन छ।
फिर से होली आई छ, सोचण बैठि जाई छ…।।
गुजिया छोलें सूजी भितर,
आलू गुटुक बनाई छ,
थाली भरी चिप्सों ले
पर मँहगाई रुलाई छ।
फिर से होली आई छ, पर जेब खाली पाई छ…।।
हँसि–हँसि रंग लगौ सबनै,
बुरा न मानो भाई छ,
य फागुन सच बोलि द्यालो —
होली व्यंग्य सिखाई छ।
फेर से होली आई छ… मन की बात बताई छ…।।
देव सती पहाड़ी बटोही

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें