रविवार, 23 अगस्त 2026

हम वो पीढ़ी हैं.... भुला

हम वो पीढ़ी हैं… भुला
जिसने
पाथर के मकान को चूगंते देखा
पाल को गोठ जाते देखा 
हम वो पीढ़ी हैं भुला
जिसने दो-दो जमाने देखे
कभी फटी कमीज में ठिठुरे
आज ब्रांडेड कपड़े पहने देखे
फटी पैंट में भी छः-छः टाल लगाए
फिर भी ठाठ से गाँव में घूमे किसी से न शरमाए!

दस पैसे, बीस पैसे चवन्नी-अठन्नी चलते देखा
एक पैसे की टॉफी खातिर,
दुकानदार से झगड़ते देखा।

गुड़-चीनी के साथ रोटी खाई
उसे भी मिठाई समझ के खाई।

मड़ुवक रोट में क्वर-नूण
वाह क्या स्वाद निराला
आज पिज्जा-बर्गर खा रहे
फिर भी मन ढूँढे वही निवाला।

मिट्टी तेल का लम्फू जलाया
धुआँ आँख में खूब समाया
छिलुक की मशाल हाथ में लेकर
रात में रामलीला देख के आया।

स्यूत से बादाम खाते देखा
जेब में पैसा भले न था
फिर भी अपने को राजा देखा।

स्लेट-खड़िया-कमेट बाँस की कलम
मास्टर जी की डाँट सुनी
गलती पर कान भी खिंचे
मासाब ने सिसूण भी झपकाया
फिर भी पढ़ाई खूब करी।

कापी-किताब हाथ में आई
फिर बस्ता भारी हो गया
अब मोबाइल इतना भारी है
जिसमें पूरा संसार हो गया।

लैंडलाइन की घंटी बाजी
घर का हर सदस्य दौड़ा
किसका फोन है? किससे बात की?
पूरे गाँव को पता हो गया।

अब WhatsApp में हैलो
आया
नीली टिक ने चैन चुराया
देख लिया फिर जवाब नहीं
इसने नया झगड़ा खूब कराया।

चिट्ठी का इंतजार किया
पोस्टमैन जब गाँव में आया
नाम पुकारते ही आँगन में
पूरा परिवार दौड़ा आया।

ब्लैक-एंड-व्हाइट टीवी देखा
एंटीना घुमा-घुमा थके
चित्र साफ हो जाए भुला
तो सारे घर वाले खुशी से झूमे।

रामायण जब टीवी पर आती गली-मोहल्ला खाली होता जिसके घर टीवी होता  
वो आदमी सबसे निराला होता।

आज मोबाइल की छोटी स्क्रीन में
सैकड़ों चैनल आ गए
पर तब एक ही दूरदर्शन था
फिर भी हम खुशहाल कहलाए।

एक रुपये के छुट्टे खातिर
दुकानदार संग बहस करी
कल दे दूँगा कहकर हमने
कई बार उधारी भी करी।

अब UPI का QR आया
न सिक्का दिखा न नोट दिखाई
स्कैन किया और पैसा गया
वाह रे कैसी तरक्की आई।

रेडियो से सारी खबरै सुनी
अब Google, AI सब बैठे
जेब के अंदर ज्ञान समाया
भुला आज मौसम कैसा है
मोबाइल ने तुरंत बताया।

पहले खेतों में बैल चले
अब मशीनें खेत में दौड़ पडे़
पहले गाँव की पगडंडी थी
न कोई ट्रैफिक न जाम था
फिर भी जीवन मे आराम था
न Facebook न Instagram
न Reels का कोई झमेला था
चौराहै में बैठा हर बंदा
खुद ही अपना चैनल था।

पहले सुख-दुख साँझे होते
बिन बुलाए लोग चले आते
आज पड़ोसी घर में रहते
WhatsApp पर हाल पूछ जाते

पहले दूध की लौटि आती
दही-मट्ठा घर में बनता था
अब पैकेट वाला दूध देखकर
गाँव का बचपन मुस्काता है।

सच कहूँ तो हम है भाग्यशाली
दो-दो दुनिया देखी हमने
पुरखों वाली सादगी देखी
तकनीकी रफ्तार भी देखी हमने

न हम पूरे पुराने निकले
न पूरे नए हुए
समय के साथ चलते-चलते
हम खुद ही किस्से बन गए।

उम्र भले आधी सदी की ओर चली
दिल अब भी पहाड़ी जवान है।

अपने  गाँव की यादें बाकी
और जिंदगी का सफर अभी महान है।

न जाने कल कौन सा जमाना आएगा 
जमाना क्या-क्या रंग दिखाएगा।
 
जय पहाड़ जय पहाड़ी पन
पुराना दौर गया सही
पर उसकी खुशबू आज भी मन में जिंदा है भुला।

बस एक तमन्ना है इस उम्र के पड़ाव पर
तकनीक चाहे जितनी आगे बढ़ जाए
हमारे पहाड़ का अपनापन
गाँव की मिट्टी की खुशबू
और रिश्तों की गर्माहट
कहीं पीछे न छूट जाए भुला।

देव सती पहाड़ी बटोही

सोमवार, 17 अगस्त 2026

घी संक्रान्ति

पलायन क कारण उत्तराखण्ड में त्यारों की वास्तविकता पर  कुमाउनी रचना______
*कलम क गलती माफ करिया*
*दिल दुखुणक विचार न्हैं*!
*म्यर लैखी भल लागों त शेयर करणि मददगार चै*!!
नै दूध , नै दै,  नै ग्वोंठ,  नै गौरु!
नै बाड़ , नै ख्वाड़,  नै पिनाऊ ग्वाब!
त्याग हैलि खेत हमूंल 
नै जू रै ग्यो ,नै हॉव ,नै हैय्यी ,नै हलकार!
नै नय्यी, नै ठय्योक ,नै मण, नै नाई ,नै नॉव ,नै पन्यार!
काबटि मनूंछा घ्यू त्यार!
कुडि़   गड़ भिड़ छोडि़  सबैं न्हैगी भ्यार!
त्याग हैलि संस्कृति और सभ्यता
पर्वों में मतिहीनता दैखू रई!
फेसबुक व्ट्सअप में हैपी हैपी लेखि सब त्यार मनूंरई!
सबैं  प्रिय बंधुओ कें
घ्यू त्यारै क बधाई.!!
_______________देव सती

घ्यू त्यार

पलायन क कारण उत्तराखण्ड में त्यारों की वास्तविकता पर  कुमाउनी रचना______
*कलम क गलती माफ करिया*
*दिल दुखुणक विचार न्हैं*!
*म्यर लैखी भल लागों त शेयर करणि मददगार चै*!!
नै दूध , नै दै,  नै ग्वोंठ,  नै गौरु!
नै बाड़ , नै ख्वाड़,  नै पिनाऊ ग्वाब!
त्याग हैलि खेत हमूंल 
नै जू रै ग्यो ,नै हॉव ,नै हैय्यी ,नै हलकार!
नै नय्यी, नै ठय्योक ,नै मण, नै नाई ,नै नॉव ,नै पन्यार!
काबटि मनूंछा घ्यू त्यार!
कुडि़   गड़ भिड़ छोडि़  सबैं न्हैगी भ्यार!
त्याग हैलि संस्कृति और सभ्यता
पर्वों में मतिहीनता दैखू रई!
फेसबुक व्ट्सअप में हैपी हैपी लेखि सब त्यार मनूंरई!
सबैं  प्रिय बंधुओ कें
घ्यू त्यारै क बधाई.!!
_______________देव सती

शुक्रवार, 14 अगस्त 2026

स्मृति1996का15अगस्त

🇮🇳 1996 का वो 15 अगस्त… 🇮🇳

जब से मुझे याद है, स्वतंत्रता दिवस की पहली धूमिल-सी याद प्राइमरी पाठशाला घिंगारी की है, जब मैं कक्षा तीन में पढ़ता था।
उम्र छोटी थी, इसलिए उस दिन की बहुत-सी बातें अब धुंधली हो चुकी हैं, लेकिन कुछ तस्वीरें आज भी मन में ताजा हैं—स्कूल का छोटा-सा मैदान, बच्चों की कतार, तिरंगा, प्रार्थना और गूंजते हुए नारे—“भारत माता की जय!”
“वंदे मातरम्!”
“जय हिंद!” 🇮🇳
उस समय आज़ादी का अर्थ पूरी तरह समझ नहीं आता था, बस इतना पता था कि तिरंगा हमारा है और भारत हमारा देश है।
और फिर आता था सबसे खास पल—स्कूल में मिलने वाली वो गोल खट्टी-मीठी टॉफी। 
आज सोचता हूँ तो लगता है, मिठाई कितनी छोटी थी, लेकिन खुशी कितनी बड़ी थी।
न मोबाइल था, न सेल्फी, न सोशल मीडिया।
हम तस्वीरें कम खींचते थे, लेकिन यादें बहुत बनाते थे।
आज भी 15 अगस्त आते ही वो स्कूल, वो दोस्त, वो शिक्षक, वो तिरंगा और वो टॉफी याद आ जाती है। समय बदल गया, बचपन पीछे छूट गया, साथी अपनी-अपनी राह चले गए… लेकिन 1996 का वो 15 अगस्त यादों में आज भी वैसा ही है।
आज तिरंगा देखकर उन सभी वीरों को नमन करता हूँ, जिनके बलिदान से हमें आज़ादी मिली।
भारत माता की जय!
वंदे मातरम्!
जय हिंद! 🇮🇳
तब हाथ में एक छोटी-सी गोल टॉफी थी,
आज हाथ में उसकी मीठी याद है। पुनः आप सभी को स्वतंत्रता दिवस कि हार्दिक शुभकामनॉयें जय हिंद🇮🇳
देव सती पहाड़ी बटोही

शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

कुमाऊँ क्षेत्र के भूले-विसरे रिति रिवाज



     पहाडों में 'धन्यवाद'  जैसा कोई शब्द नहीं होता  था । किसी ने एहसान या मदद कर दी तो उसके बदले कहा जाता था - तुमर भल हैजौ , तुमार नानतिन बची रून , तुमार खुटन कान् ले झन बुडो़ , अगर एहसान ज्यादा ही हुवा तो कहेते थे   तुमरि एकै एक्कीस / पांचै पंच्चीस हैजौ, जै जै कारी हैजौ । बाद में जब धन्यवाद शब्द चलन में आया तो शुरु में लोग मजाक में कहते ... हैगोय यो धणियोंपात रूण दिओ ।
          अब बात करते हैं मिठाई की ... मिठाई का मतलब गुड़ होता था ... लोग कहा करते थे ... पास हैगो बल तुमर च्योल ... गूड़ खवाओ . यहां भी जवाब में धन्यवाद नहीं कहा जाता था ... कहते ... होय हैगोपै  तुमार आशीर्वादल ... घर आया   एक आंगू पिठ्या लगै ल्हिजया और गूड़ ले खै जया ... हर खुशी के मौके पर गुड़ बाटा जाता था और बधाई देने आये ब्यक्ति या महिला को पिठ्या ( टीका ) भी लगाया जाता ... कई बार अगर दोपहर या शाम को लोग बधाई देने किसी के घर जाते तो वहां पिठ्या लगता ... तो वापस जाने पर रास्ते में लोग पूछते कि - के बात  आज बड चर-बर पिठ्या लगै राखौ ... चर बर मतलब लम्बा चौडा  चटक गहरा ... वह बताता ... अरे फलाने का नाती हुवा है, वहां गया था ... इससे एक बात और होती कि लोगों को धीरे धीरे ये खुशखबरी मिल जाती,  लोग अपने आप बधाई देने निकल पडते बधाई देने को - *भलि भट्यूण* कहते थे । बधाई शब्द भी प्रचलन में नहीं था ... बधाई  के लिए प्रयुक्त होता - भल भै तुमर नाति हैगो , भल भै तुमर च्योल पास हैगो, भल भै तुमर च्योलक ब्या ठैरी गो ... जवाब वही होता ... होय यो सब तुम लोगनक आशीर्वाद छू।  कल्पना कीजिए  बधाई है - धन्यवाद की जगह जब इन आत्मीयता वाले शब्दों का प्रयोग होता होगा, तो कितना सुख कितने अपनेपन का अहसास होता होगा । किसी के पास होने पर , लड़का , लड़की होने पर , बच्चों की शादी तय होने पर , शादी हो जाने पर , नौकरी लगने पर, जनेऊ होने पर , किसी का लापता सदस्य पुन: घर वापसी पर ... भलि भट्याने का प्रचलन था, वो भी उसके घर जाकर । इसके लिए कुछ अच्छे वार (दिन) तय थे ... शनिवार  व मंगलवार भलि भट्याने के लिए वर्जित थे । घर वाले भी अनुमान लगाते कि आज मंगल है कोई नहीं आएगा फलां काम निपटा लो  या आज भल वार छू , मैंस भल भट्यूणहुं आल ... आज घरै रया सब लोग साथ में जब भल भट्याने  आते तो, चाय की केतली पूरे दिन के लिए  रौन पर चढ जाती, घर के सारे सदस्य आवभगत में लग जाते, महिलाऐं भीतर चाय पानी पीती बडे़ बुजुर्ग  आये होते तो चाख में उनके लिए  ह्वाक चिलम में तम्बाकू कोयले सज जाते ... एक बात और होती, जिसके यहां परिवार छोटा हो या घर में महिला एक ही हो तो वहां पर भल भट्याने आई महिलाएं मदद भी करती थी, जैसे चाय बनाना,  गायों को पानी देना आदि क्योंकि घर की गृहणी तो मेहमानों को पौ - पिठ्या लगाने, गूड़ बाटने में ही लगी रह जाती . यहीं पर अगर किसी के घर बाल बच्चा हुवा हो तो घर की मुखिया गृहणी भलि भट्याने आई महिलाओँ  को शाम को आकर गीत गाकर जाने का न्योता भी दे देतीं यहीं पर दुणआँचव के कुछ पैसे और एक कागज की पुडिया में घर के लिए गुड दे दिया जाता । बडे बुजुर्ग व जवान लोग चर्चा करते नामकरण में कतु आदिम खवाला, हमार हातक जो काम होल बताया । क्वे नानतिनाक हात ले जवाब भेज दिया,  उसिक हम बीच बीच में आते रूल ... आज की तरह नहीं होता कि - पार्टी कब दे रहे हो ... शाम को कहां मिलोगे ... तब ये चीजे निषेध थीं । 
तब एक परम्परा और भी थी - किसी कन्या के जन्म के बाद लडका हो गया तो  उसकी लड़की को शकुन्नी समझा जाता और उसकी पीठ पर गुड़ की भेली फोडी जाती । यदि परिवार में बार दिनी बिरादरी में  या नजदीकी रिश्तेदारी में एकसाथ दो बच्चे   नामकरण की अवधि तक पैदा हो गये तो उन बच्चों को औ-छौ कहा जाता था बाद में एक छोटा सा प्रोग्राम करके उनके कपडे-धागुले वगैरह आपस में बदले जाते ... इस कार्यक्रम को औ-छौ बाटना कहा जाता था इसे कुछ कुछ दो समधनों के समद्योड कार्यक्रम जैसा ही समझिये । 
      मुझे तो लगता है कि हमारे बुजुर्गों ने जिस प्रकार ये रीति रिवाज बनाये होगे उनका मकसद यही रहा होगा कि लोगों की आपस में आत्मीयता बढे, एक दूसरे की मदद की भावना आये , सभी एक दूसरे की खुशियों को अपना समझकर साझा करें । आज के व्यस्त समय में कुछ कोशिश कर हम इन परम्पराओं को जीवित रख सकें तो बहुत ही अच्छा होगा ... आज तो हम यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि फलां ने मुझे बताया थोडी , मुझे बुलाया ही नहीं ... मैं क्यों जाऊ .. या रास्ते में मिला था बधाई दे तो दी । 
आगे को व नई पीढ़ी को जरूर भेजना 
शुभं भवतुः सर्वदा