हम वो पीढ़ी हैं… भुला
जिसने
पाथर के मकान को चूगंते देखा
पाल को गोठ जाते देखा
हम वो पीढ़ी हैं भुला
जिसने दो-दो जमाने देखे
कभी फटी कमीज में ठिठुरे
आज ब्रांडेड कपड़े पहने देखे
फटी पैंट में भी छः-छः टाल लगाए
फिर भी ठाठ से गाँव में घूमे किसी से न शरमाए!
दस पैसे, बीस पैसे चवन्नी-अठन्नी चलते देखा
एक पैसे की टॉफी खातिर,
दुकानदार से झगड़ते देखा।
गुड़-चीनी के साथ रोटी खाई
उसे भी मिठाई समझ के खाई।
मड़ुवक रोट में क्वर-नूण
वाह क्या स्वाद निराला
आज पिज्जा-बर्गर खा रहे
फिर भी मन ढूँढे वही निवाला।
मिट्टी तेल का लम्फू जलाया
धुआँ आँख में खूब समाया
छिलुक की मशाल हाथ में लेकर
रात में रामलीला देख के आया।
स्यूत से बादाम खाते देखा
जेब में पैसा भले न था
फिर भी अपने को राजा देखा।
स्लेट-खड़िया-कमेट बाँस की कलम
मास्टर जी की डाँट सुनी
गलती पर कान भी खिंचे
मासाब ने सिसूण भी झपकाया
फिर भी पढ़ाई खूब करी।
कापी-किताब हाथ में आई
फिर बस्ता भारी हो गया
अब मोबाइल इतना भारी है
जिसमें पूरा संसार हो गया।
लैंडलाइन की घंटी बाजी
घर का हर सदस्य दौड़ा
किसका फोन है? किससे बात की?
पूरे गाँव को पता हो गया।
अब WhatsApp में हैलो
आया
नीली टिक ने चैन चुराया
देख लिया फिर जवाब नहीं
इसने नया झगड़ा खूब कराया।
चिट्ठी का इंतजार किया
पोस्टमैन जब गाँव में आया
नाम पुकारते ही आँगन में
पूरा परिवार दौड़ा आया।
ब्लैक-एंड-व्हाइट टीवी देखा
एंटीना घुमा-घुमा थके
चित्र साफ हो जाए भुला
तो सारे घर वाले खुशी से झूमे।
रामायण जब टीवी पर आती गली-मोहल्ला खाली होता जिसके घर टीवी होता
वो आदमी सबसे निराला होता।
आज मोबाइल की छोटी स्क्रीन में
सैकड़ों चैनल आ गए
पर तब एक ही दूरदर्शन था
फिर भी हम खुशहाल कहलाए।
एक रुपये के छुट्टे खातिर
दुकानदार संग बहस करी
कल दे दूँगा कहकर हमने
कई बार उधारी भी करी।
अब UPI का QR आया
न सिक्का दिखा न नोट दिखाई
स्कैन किया और पैसा गया
वाह रे कैसी तरक्की आई।
रेडियो से सारी खबरै सुनी
अब Google, AI सब बैठे
जेब के अंदर ज्ञान समाया
भुला आज मौसम कैसा है
मोबाइल ने तुरंत बताया।
पहले खेतों में बैल चले
अब मशीनें खेत में दौड़ पडे़
पहले गाँव की पगडंडी थी
न कोई ट्रैफिक न जाम था
फिर भी जीवन मे आराम था
न Facebook न Instagram
न Reels का कोई झमेला था
चौराहै में बैठा हर बंदा
खुद ही अपना चैनल था।
पहले सुख-दुख साँझे होते
बिन बुलाए लोग चले आते
आज पड़ोसी घर में रहते
WhatsApp पर हाल पूछ जाते
पहले दूध की लौटि आती
दही-मट्ठा घर में बनता था
अब पैकेट वाला दूध देखकर
गाँव का बचपन मुस्काता है।
सच कहूँ तो हम है भाग्यशाली
दो-दो दुनिया देखी हमने
पुरखों वाली सादगी देखी
तकनीकी रफ्तार भी देखी हमने
न हम पूरे पुराने निकले
न पूरे नए हुए
समय के साथ चलते-चलते
हम खुद ही किस्से बन गए।
उम्र भले आधी सदी की ओर चली
दिल अब भी पहाड़ी जवान है।
अपने गाँव की यादें बाकी
और जिंदगी का सफर अभी महान है।
न जाने कल कौन सा जमाना आएगा
जमाना क्या-क्या रंग दिखाएगा।
जय पहाड़ जय पहाड़ी पन
पुराना दौर गया सही
पर उसकी खुशबू आज भी मन में जिंदा है भुला।
बस एक तमन्ना है इस उम्र के पड़ाव पर
तकनीक चाहे जितनी आगे बढ़ जाए
हमारे पहाड़ का अपनापन
गाँव की मिट्टी की खुशबू
और रिश्तों की गर्माहट
कहीं पीछे न छूट जाए भुला।
देव सती पहाड़ी बटोही