मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

welcm 2026

साल २०२५बिदा, साल २०२६ स्वागत
जाणि वाल साल बिदा तू कै
सुख-दुख द्विनूं बाटी दीं।
गिरि-पड़ि बै जे सिख मिलि
तूल जीणूं ढंग समझाई दीं।
आणि साल, स्वागत छ तेरो,
नयी उज्यालो, नयी सवेरो।
टूटी सपन फिर पंख पावो,
हर मन मा मुस्कान भरि जावो।
जो छूटि गो याद बणि रो
जो मिलि गो संग निभैं जो
बीति  दिन अनुभव बणि जो
जाणि साल—धन्यबाद तेरो
आणि साल—खुशी बसै जो।
देव सती पहाड़ी बटोही

रविवार, 21 दिसंबर 2025

कुमाऊँ का गॉव (विकास क नाम पर विनाश)

कुमाऊँ का गाँव : विकास क नाम पर विनाश

आज़ादी बाद कुमाऊँ का गौं गौंनों मे विकास क नाम पर खेल चलो
हर साल पैड़ लगाई  , हर साल फोटो खिंची
पर जंगल आज ले  नंग छन।
पौध लगै दी, पर बचै कतुक?
जंगोव क नाम पर सोंव भरि गो
पानी सूखि गो, माटी सरकण लाग गो
काग़ज़ मै हरियाली,
गौं मा सुवर बानरों क उजाड़।
सड़क क नाम पर पहाड़ काट दी
न तो ढाल समझी, न पाणिक  धार।
आज सड़क छ,
भों भूस्खलन छ।
खेत गो, घर गो,
पर रिपोर्ट मे सब ठीक छ।
पाणि बचाण क योजना बनी।
नौला बूसी  गी  धारा चुप छी।
खाल खन्ती काग़ज़ मा चलि,
गों मै पाणिक टंकी आय ले सुन्न छी
सबूहें ठूल गलती
गौंक आदमी क कोई मोल न्हैति
स्याण बलो त चुप करै दीनि
ठेकेदार बलो त योजना पास।
विकास अगर यई छ,
तो पहाड़ कसिक बचाल?
हर साल काम हूण बटि मतलब न्हैति
काम ठीक कसिक हल 
पहाड़ कै बचाण छ,
तो दिखावा छोड़ों।
माट ज सीख,
पाणि ज चल,
अर गौंक आदिम है पूछ।
नतर य विकास
सिर्फ़ नक़्श मे रै जाल,
और गौ याद मा।
देव सती पहाड़ी बटोही

गुरुवार, 18 दिसंबर 2025

मनरेगा के कामदारों की व्यथा

मनरेगा के कामदारों की व्यथा

मजदूरीक ले कर ल्यो हिसाब,
कागज में स्वर्ग, धरातल में ख्वाब।
धूप-पानी में देह गलाय,
फिर भी पेट खाली घर जांय।

फावड़ा बोले—मेहनत साँच,
फाइल बोले—“कल आना आज”।
भोट बखत नेता सब साथ,
मजदूरी बखत बंद मिलै हाथ।

खण दगै नूण अर प्याज,
गरीब क भाग्य स्यै रो समाज।
प्रधान-ठेकेदार रचैं खेल,
मजदूर रहै बस नामक मेल।

कार्यस्थल पर न छ दवाई,
न छ छाया, न छ सुनवाई।
लागै चोट तो राम सहार,
अस्पताल छ कोसों पार।

शासन कहै—“हम मजबूर”,
कानून बैठी छ खुद अपाहिज़-नूर।
बीमा, सुरक्षा सब भाषण-ढोंग,
हकीकत में मजदूरक शोषण भोग।

कामदार माँगै दया न दान,
माँगै सिर्फ़ अपना हक-सम्मान।
टैम पर मजदूरी मिलै अपार,
तब साँच कहौं—विकास छ यार ॥

✍️पहाडी़ बटोही (देव सती)

बुधवार, 17 दिसंबर 2025

अंगीठी मे रखा कोयला

🔥 सगट में धरी क्वैल
(कुमाऊनी राजनीतिक व्यंग्य)

सगट में धरी क्वैल जस,
राज चलणो छ चुपचाप,
मंचन में ठंड हँसण,
भितर-भितर जलणो छ ताप।

नेताजी बोलि — सब ठीक,
महँगाई बोलि — चुप र,
जनता हाथ लगै भैठी,
हाथ जली, आवाज़ ए गुम र।

कागजन में विकास चमकण,
धरातल माजूण जस ठंड,
सवाल करो जो आम आदिम,
वी पर मुकदमा — देशद्रोही

वोट बखत फूँक मारण,
क्वैल जलो त फोटो खिंचो,
सगट सरकार हाथन में छ,
क्वैल जनता की साँस।

जैं दिन सगट उलटि जाल,
उ दिन बदलल इतिहास।

✍️ पहाड़ी बटोही (देव सती)

मंगलवार, 16 दिसंबर 2025

पूषक मैहैण बैसी

🪔 पूष क महैंण बैसी 🪔

पूष क महैण पैल पैट पहाड़ क धूणियों में प्रार्थना,
घामक इंतजार में ठिठुरी विश्वास।
धूणियोंक चौखट पर
दीये की लौ के हो,
आज बटिक बैसी छ।

बाईस दिनी…
टैम ले मॉठू मॉठ चलू,
कदम कदम में अनुशासन,
आँखों में श्रद्धा क उज्याव।
घंटी क ध्वनि में पिरोई जानि
दिन, रात और मौन क क्षण।

हवन की अग्नि
साँसों कै गरम करै,
मंत्रों क धार
ह् यू ठण्ड चीरतें न्हैं जा।
एक टैमक खण,
धरती बिछौण,
और ईष्ट क नाम—
यई त छ बैसी क सार।

घामतैल लागि गौं गौं क सयाण मैंस,
आपणि थकान उतारु।
बुज़ुर्गों क आँखों में
पुरखों क काथ चमक उठे।
और उ कौनि
पूषक मैहैंण करी जै जो साधना,
देवों क द्वार तक सीध्ध न्हैं जै।

रात भौत लम्ब हूनी,
पर विश्वास जागतें रु।
ठण्ड हड्डियों तक उतरें,
पर संकल्प पिघलन नी दिन।
हर श्वास क दगाड़,
ईष्ट नाम का सहार—
यई त बैसी क परीक्षा छ।

जब बाईसवाँ सूरज उगू,
तब लागू,
मानो ईष्टदेव स्वयं उतर ऐगी पहाड़ पन।

बैसी कोई रस्म न्हैती,
य पहाड़ क आत्मा छ—
तप, त्याग और धैर्य की पछ्याण।
पूष क ठण्ड में
जो इके निभै ल्यू,
विक जीवन
ईष्ट क कृपा महक जा।

— पहाड़ी बटोही (देव सती)

रविवार, 14 दिसंबर 2025

राम राम रैम रैम

राम-राम तो लोगों से अब होती ही नहीं,
पर मोबाइल की रैम हर महीने बढ़ती जा रही है।
रिश्तों की गर्माहट कहाँ बची आजकल,
पर फ़ोन की गर्मी सबके हाथ जलाती जा रही है।

पहले देहरी पर बैठकर गप्पें जमती थीं,
आज चैट में ही दुनिया बसाई जा रही है।
इंसान इंसान से दूर होता चला गया,
पर रैम देखकर ख़ुशियाँ मनाई जा रही हैं।

आँखों में आँखें डाल बात होती थी कभी,
अब “सीन” पर ही दोस्ती निभाई जा रही है।
सुख-दुख पूछने का वक़्त किसे है यहाँ,
स्टेटस से ही संवेदनाएँ जताई जा रही हैं।

माँ की पुकार भी वाइब्रेशन में दब गई,
बाप की सीख “नोटिफ़िकेशन” में खो गई।
घर के आँगन सूने, चौपालें वीरान,
पर स्क्रीन पे भीड़ रोज़ सजाई जा रही है।

राम-राम कम हुई, रैम बढ़ती गई,
संस्कार पीछे छूटे, सुविधा आगे बढ़ती गई।
तकनीक बुरी नहीं, नीयत का दोष है,
मोबाइल अपडेड
इंसानियत ही सबसे ज़्यादा “डाउनग्रेड” हो गई।

गौरंया

दाना चुगती, मेरे घर को अपना घर समझ गौरंया

दाना चुगती— मेरे घर को,
अपना घर समझती गौरैया…
छोटे पंखों की फड़फड़ाहट,
मन में भर दे मीठी छैयाँ… 


कभी खिड़की, कभी आंगन में,
बैठ के गुनगुन गाती है…
जैसे कोई पुरानी दोस्त,
हर सुबह मिलने आती है…

पहाड़ कि पीड़ा और बेरोजगार पहाड़

पहाड़ी बटोही

मैं पहाड़ी बटोही हूँ,
राहों से मेरी पहचान है।
पगडंडी मेरी गुरु बनी,
हर मोड़ मेरी जान है।

देवदार की छाया में
मैंने सपने सींचे हैं,
पत्थरों से टकरा कर भी
हौसलों के दीप जले हैं।

न शहर की चकाचौंध मुझे भाती,
न दौलत का दिखावा चाहिए,
दो वक्त की रोटी, सच्ची नींद
और पहाड़ का साया चाहिए।

नदियों से सीखा बहते रहना,
चट्टानों से सीखा सहना,
बर्फ़ ने सिखाया धैर्य रखना,
तूफ़ानों से डरना नहीं कहना।

मैं पलायन की पीड़ा भी जानूँ,
माँ की सूनी आँखें पहचानूँ,
फिर भी लौट आने का सपना
हर साँस में रोज़ बुनता जाऊँ।

मैं पहाड़ी बटोही हूँ,
मंज़िल से ज्यादा सफ़र जरूरी है,
क्योंकि चलना ही मेरी पूजा है
और पहाड़ मेरी मजबूरी नहीं—
मेरे लिये ज़रूरी है

पहाड़ी बटोही

पहाड़ी बटोही

मैं पहाड़ी बटोही हूँ,
राहों से मेरी पहचान है।
पगडंडी मेरी गुरु बनी,
हर मोड़ मेरी जान है।

देवदार की छाया में
मैंने सपने सींचे हैं,
पत्थरों से टकरा कर भी
हौसलों के दीप जले हैं।

न शहर की चकाचौंध मुझे भाती,
न दौलत का दिखावा चाहिए,
दो वक्त की रोटी, सच्ची नींद
और पहाड़ का साया चाहिए।

नदियों से सीखा बहते रहना,
चट्टानों से सीखा सहना,
बर्फ़ ने सिखाया धैर्य रखना,
तूफ़ानों से डरना नहीं कहना।

मैं पलायन की पीड़ा भी जानूँ,
माँ की सूनी आँखें पहचानूँ,
फिर भी लौट आने का सपना
हर साँस में रोज़ बुनता जाऊँ।

मैं पहाड़ी बटोही हूँ,
मंज़िल से ज्यादा सफ़र जरूरी है,
क्योंकि चलना ही मेरी पूजा है
और पहाड़ मेरी मजबूरी नहीं—
मेरे लिये ज़रूरी है

बुधवार, 26 नवंबर 2025

चार गॉव का वो पैदल रास्ता बंद है

आपके गाँवों ईनाण, चौना, गाड़ी और पाखुड़ा को शामिल करके कविता प्रस्तुत है-

चार गाँव का पैदल रास्ता अब बंद है 
(ईनाण — चौना — गाड़ी — पाखुड़ा)

ईनाण की धूप से चलकर
चौना का साया मिलता था
गाड़ी मे पहुँचकर वह शिव धारा मिलता था
पाखुड़ा की ओर चढते ही
मिलता अपनापन हर पल,
संग चलते थे पाँव हमारे
बिना शिकायत, बिना हलचल।

वो रास्ता था चार गाँवों में
रिश्तों का सेतु महान,
हर त्योहार, हर दुख-सुख में
उसी से चलता था मान-सम्मान।

अब सड़कें तो आ गई हैं
पर दिल कहीं तंग है,
तरक्की की इस भीड़ भरे में
वो पैदल रास्ता बंद है।

जहाँ बाँझ क्यारी में
खिलखिलाती थी बचपन की धूप,
और पगडंडी के मोड़ों पर
हँसी छोड़ जाते थे रूप।

बंद हुआ जो रास्ता
मिट्टी का संग छूट गया,
बचपन कहीं वहीं पड़ा है
जहाँ से सफर टूट गया।
देव सती (पहाड़ी बटोही)

गुरुवार, 20 नवंबर 2025

पहाड़ पन ब्या काज

पहाड़ पन ब्या-काज —  व्यंग्यपूर्ण 

पहाड़ पन ब्या-काज को जमाना बदली ग्यो,
अब ब्या कम — “इवेंट मैनेजमेंट” ज्यादा है गो!

एकै दिन में एक बटि जादे न्यौत आणी,
जैसे गौं मैराथन-रैली कूद रयी हो!
क्वे देखो  न देखो—
बस WhatsApp में कार्ड उछाल दीनि
और समझ ल्यो— “फर्ज निभी गो!”

पैली बटि ब्या-घर में
आमा-बुबू, काका-काकी— सब रसोई-चौंतरा मै रौनक अब
घर में सन्नाटा…
काम-काज सब ‘ठ्याक-कंपनी’ के,
और घरवाल—रात भर रील देखण में व्यस्त!

पैली बटि नानका-ठूलका ताऊ-बुबू— लकाड़ फाड़ण,
बुआ-काखी— दुकान बटि चाउ-पिसूं ल्याण,
काकी-भौजी उखो-मस्याल कूटण…
आब?
बस नैपालि बुलाय द्यै—
“काम तमाम”— एकै फोन में सेट!

पैली बटि घरौं-घर जै बै न्यौत दिछी—
मान, माया, बोल-बाणी… सब!
आब—
“इतु पैट ब्या छू—जे बखत आइजा ऐ जाया।”
जैसे ब्या को न्यौता न,
सरकारी नोटिस जारी हो!

बर्याती-बरेतिन कै हालत भी बदलि गई—
पैली बटि पींठा-ले बर्यात बिदाई टैम पर लगाई जाछी,
आब गेट पर बबाल टलाई
क्याऊ प्ंय्या पतैल वाल गेट पर लाल कपड़ वाल स्वागतम्
आब गेट पर टेंट-वाल लाल मैटिंग,
और स्वागत करण वाल डीजे—
जो बजाल— “दुल्हन हम ले जाएंगे!”
(पंडित-ज्यू भी सोचण— कौन ले जाणै, कब ले जाणै?)

लगन-पत्री पढ़ण को टाइम कनै छै—
सबू मान फोटोग्राफर-क!
उ त—
“सात फैरों में कै दीन?”
आठ फ्यार ले लगै द्यै— एंगल बढ़ो छू!

अंत मै—
ब्या काज कम,
दिखावा ज्यादा।
रिवाज कम,
रील ज्यादा।
और पहाड़—
बस पहाड़ रै गो…
ब्या-काज पूर कारोबार बनि गो!
देव सती (पहाड़ी बटोही)

मंगलवार, 18 नवंबर 2025

चाय सोशल मीडिया और पहाड़

🍃 चाय, सोशल मीडिया और पहाड़ 🍃

पहाड़ैं मे चहा  कम, स्टेटस ज्यादा बनौला,
कप ठंडो पड़ि जाला—
पर फोटो “Hot Tea Time”  लगौला।
चौंतरा खाली, पर ग्रुपचैट भरल,
रात-दिन “GMचललो,
उतरण न पड़े घर–बार मैं,
रील मैं ही पहाड़ पललो।

फेसबुक मैं सब–सबूक फिकर,
“देश–दुनिया” बचूण,
और घर मैं दगड़–धूप पड़ै—
पर लाइक-कमेंट मैं लगूण।

चाहा पियू कि न पियू—
फर्क न छ, बस फोटो आलो चाहिं,
कैप्शन लिखूं—
“Life in Mountains ☕✨ #Peace #Vibes #Nature”

चाय कि भाप उड़ी–उड़ी
सोशल मैं फैलि जाली,
हकीकत कि चुस्की सूखी—
पर वर्चुअल जिंदगी चलि जाली।

घाम कि किरन जागीं, चूला भट्टियूँ में आग,
पहाड़ कि गलियाँ बोलि उठीं — “बनौ चहा, ऐलाग!”
कितली में उबलूं पत्ती, जड़-बुटि को सुगंध,
पहाड़ैं क ठंड में चाहा— खुद में ही एक प्रबन्ध।

चौंतरों में बैठि- बैठि, चुस्की-चुस्की दिन कटि जाल,
चाय कि चम्मच जैं घूमें, मन मे घुमण-फिरण लागि जाल।

थकानक जाड़ा खाईं, ब्यथा-म्यथा सब भाग जाल,
चाहा कि दो घूँट पियू निनान ले जाग जाल।
! ☕देवसती (पहाड़ी बटोही)

हवन के पात्र

🌞: *पंडिताई का हवन-हथियार।*
*क्रम से:* 
*स्रुवा, प्रोक्षणी, प्रणीता, सलाका, स्रुची।*
[🌞: *यज्ञ-अनुष्ठानादि में हवनीय कार्य में प्रयोग  लाये जाने वाले पात्र की जानकारी भुदेवो के लिए।* 
*१. स्रुवा*:- ये एक विशेष लकड़ी की बनी हुई कलछी है। इसके सहारे हम हवनादि में घी की आहुति देते हैं। 

*२. प्रोक्षणी*:- इस पात्र के माध्यम से हवन कुण्ड को जलप्रसेचित करते हैं। सामान्य अर्थ में समझें तो इस पात्र में जल लेकर हवन वेदी के बाहर निर्देशित मन्त्रों से चारों दिशाओं में जल डालते हैं। जल प्रसेचित करते समय भावना यह रहती है कि अग्नि के चारों ओर शीतलता का घेरा बना रहे, जो हम सबके लिए शान्तिदायी हो। 
मन्त्र है:- 
पूर्व में प्रसेचन का: ॐ अदितेऽनुमन्यस्व॥
पश्चिम में प्रसेचन मन्त्र: ॐ अनुमतेऽनुमन्यस्व॥
उत्तर में प्रसेचन मन्त्र: - ॐ सरस्वत्यनुमन्यस्व॥
चारों दिशाओं में प्रसेचन का मन्त्र: ॐ देव सवित: प्रसुव यज्ञं, प्रसुव यज्ञपतिं भगाय। दिव्यो गन्धर्व: केतपू:, केतं न: पुनातु, वाचस्पति: वाचं न: स्वदतु॥
              
*३. प्रणीता*: इसमें जल भरकर रखा जाता है। इस प्रणीता पात्र के जल में घी की आहुति देने के उपरान्त बचे हुए घी को “इदं न मम” कहकर टपकाया जाता है। बाद में इस पात्र का घृतयुक्त होठों एवं मुख से लगाया है जिसे 'संसव प्राशन' कहते हैं।

*४. वज्र-यज्ञ में अशुद्ध शक्तियों से संरक्षण करने के लिये उपय मनुकश के बाद यजमान के वाम हस्त में धारण करने के लिये उपयोग में लाया जाता है।

*५. स्रुची*:  इसके माध्यम से यज्ञ अथवा हवन में मिष्ठान की पूर्णाहुति दी जाती है। मिष्ठान की इस आहुति को स्विष्टकृत होम कहते हैं। यह क्रिया यज्ञ अथवा हवन में न्यूनता को पूर्ण करने के लिए की जाती है।

सोमवार, 17 नवंबर 2025

१९९०/२०००

“नब्बे बनाम दू–हजारी – एक तगड़ो व्यंग्य”

✍️ देव सती (पहाड़ी बटोही)

नब्बे वाल बोलू —
“हमन भल जमाना देख,
चौमासें घस्यारी, सौणें रस्यार,
चूलन में धूँ फूक नैख।

स्लेट–पेन्सिल, कापी–पुस्तक,
स्कूल जाण–त्योहार
खेतन में खेल-खालि,
गुल्ली–डंडो हमार।”

दू–हजारी हँसू —
“हम रील बनौला दाज्यू,
तुम गुल्ली–डंडा में अट्क्या,
हमन लाइक–फॉलो मागा,
स्कूल बटि त बस स्टक्या!

ऑनलाइन क्लास में सोया
माइक म्यूट में गप्प मारी,
कैमरा ऑफ करि खोया मार्क्स झटकन पारी!”

नब्बे वाल चाहा पीनी,
चुल्हा–धुँए में छनकै,
दू–हजारी — “कप फोम वाला दो दाज्यू,
इंस्टा स्टोरी में जमकै!”

नब्बे बोले — “हमन काम में पक्क,
काटि दै खेत–खलां।”
दू–हजारी — “हम पबजी में पक्क,
चलूनू आंगू छलां!”

अँतिम में द्वी भिड़्या —
नब्बे बोली — “हम चलन पहाड़।”
दू–हजारी बोली — “हम चलौँ प्लेन्स,
औ ट्रेंड क रोडा़

साँच यो छ —
दोनो पीढ़ी महान, बस चाल अलग–अलग छ,
एक जमीन से जुड़ेलो,
एक वाई–फाई पर टॉगी छ!

शुक्रवार, 14 नवंबर 2025

कै लेखू

यह कविता पहले से ही बहुत गहरी है—दर्द भी है, सवाल भी, और पहाड़ की सच्चाई भी।

❖ मैं लेखूँ त क्ये लेखूँ — (कुमाऊँनी कविता)

क्ये लेखनूँ?
देवभूमि तूँ, मैं राक्षसौं क ताँडव लेखूँ—
नेताओँक खोखलो विकास लेखूँ—
कर्मचारियूकी ठगणी नीयत लेखूँ।

दगडियो, तुमै बताओ—
आब मैं को एंगल बटिक?

पहाड़ेकि कसि-कसि खूबसूरती लेखूँ?
मैं लेखूँ त क्ये लेखूँ?

बांज गौं मैं कुरी बुज लेखूँ?
टुटि-फूटी कुड़ी-बांज बाडि-ख्वाडि लेखूँ?
बिन नानौंक सुन्न स्कूल लेखूँ?
खाल्ली सड़केकि अलख पीड़ लेखूँ?
बिन डाक्टरों क सूनौ असपताव लेखूँ?

मैं लेखूँ त क्ये लेखूँ?

एकलै थड़ि बैठी,
आम-बुबुक कवीड़ कहाणी लेखूँ?
ब्वारि गोरबाछ्नेकि पीड़ लेखूँ?
बागौंक डुडाट—सुंअर-बानरनौक उज्याड़ लेखूँ?

दगडियो, आब तुमै बताओ—
मैं लेखूँ त क्ये लेखूँ?
देव सती (पहाड़ी बटोही)

शनिवार, 8 नवंबर 2025

उत्तराखंड राज्य स्थापना दिवस पर

एक बीसी पॉंच साल क उत्तराखंड देखों कस बीत गो
पच्चीस साल क उत्तराखंड कस आज है गो।
कुमाऊँनीं क मधुरता का गै
गढ़वाली क गहराई का गै
जौनसारी त हराई गो
फूलदेई घूगूती त्यार 
हरर्याव त्यार हरई गो
पहाडो़ं विकास आज काथा आज
न्हैं गो 
कुर्सी क दौड़ में कभैं  कमल तो कभैं हाथ जीत गो।
आवाद छी जो खेत बाडी़, उ सब बंजर पड़ गो
पुश्तैनी मकानों क बूनैदू कै पलायन  जर्जर कर गो।
पहाड़ों क रौनक गौ गौनों के सुनसान कर गो!
विकास पहाड़ों में आन है पैली, धरातल मे डर गो!
स्कूलों में लटकि ताव, अस्पतालों में सन्नाटा छ!
सड़कों को जाल बिछा पर, रोज़गार का कई ना अत्त -पत्त  छ!
गध्योरों  क कल-कल, फूलों क खुशबू, सब फीक कर गो!
जवानी क जोश के पहाड़ों बै, शहरों क ओर भबरै  गो!
देवभूमि क नाम तो छ, पर द् य्प्तों क वास का?
मंदिरों के कपाट खुली छ, पर उ भक्तों का विश्वास का?
शहादत क बल पर मिलों छि , हमूंके य धाम,
आज ले विकास क नाम पर, पहाड़ों के  मिलरो आराम!!
चलो फिर से संवारुल मिलकर, अपण   उत्तराखंड के
विकास की नई राह दिखूल , रोकूल  पलायन के
संघर्षों ल जो जन्मी रो
उ स्वाभिमान क शान छ
देवभूमि उत्तराखंड,
त्यर हर शहीदों पर अभिमान छ
हम उत्तराखंडवासी छू
संघर्ष हमैरी पहचान छ
संस्कृति हम री साँसों में,
शौर्य हम र मान छ
देवभूमि के हर अंश में,
बसू हिन्दुस्तान,
जय-जय उत्तराखंड हमरी —
जय भारत, जय देवभूमि महान!
@देव सती (पहाड़ी बटोही)

सोमवार, 11 अगस्त 2025

संकट व्रत जानकारी

आज संकट चौथ (संकष्टि) क व्रत छू य साल में द्वी बार मनायी जा, एक तो माघ मास कृष्ण पक्ष क चतुर्थी हुं मनायी जा और एक  भाद्र माह कृष्ण पक्ष कि चतुर्थी हुं मनायी जा, 
य व्रत को घरक ठुल सदस्य करु, 
यमे  घरक सब सदस्यों क नामक (महीला सदस्यों लिजी २८ और पुरुष सदस्यों लिजी १०८ दुबा) गिन बेर गणेश जू के चढाई जानी , 
और तिलक मोदक ले बने बेर चढानी , और ऊं संकष्ट हर गणपतये नमः क जाप करे और ब्याल के भगवान गणेश जूक पूजन कर चंन्द्रमा जूक पूजन कर और अर्घ्य दि बेर व्रत क पूर्ण हुं,
श्री गणेश जु सबनक कष्ट दूर करो, जय श्री गणेश  🙏🏿

शुक्रवार, 8 अगस्त 2025

धराली उत्तरकाशी आपदा

हजारों पेडों की बली देकर परिहास करते हो 
वनों से फिर ठण्डी हवा पानी की आस करते हो
अरे पहाड़ो को खोदकर कुरूप कर दिया तुमने 
क्या इसी को तुम विकास कहते हो 

पहाड की माटी पत्थर सोने के भाव बेच रहे हो 
क्या कभी बारीश में सहम्ति कुडियों की सुध भी लिए रहे हो
आज दरक रहे हैं पहाड दफन हो रही है मासूम है सांसे 
क्या इसी को तुम विकास कहते हो 

अरे कितने नेता आये कितने अधिकारी आये 
न रूका है ये खनन न रूक वनो का दमन  
पहाड के युवा का रोजगार छीन कर भण्डार अपने भरते हो 
क्या इसी को तुम विकास कहते हो 

अरे अब तो देखो सरयू सुख कर पैताल चली गयी 
दो नदियों के संगम में पानी के लिए त्राहि त्राहि मच गयी 
जाने क्या मिलेगा रोज सरयू माँ की छाती खोद कर
क्या इसी को विकास कहते हो 

हजारों पेडों की बली देकर परिहास करते हो 
वनों से फिर ठण्डी हवा पानी की आस करते हो
**********************************
भास्कर सिंह नेगी (गुरु)

मंगलवार, 29 जुलाई 2025

शाबास म्यर मोतिया बल्दा

शाबास म्यर मोतिया बल्दा त्वीलें धारौ बोला
नौ रुपैं को मोतिया बल्दा सौ रुपैं को सींगा 
लोटि पडौ़ म्यर मोतिया बल्दा टोडि़ ल्यायों सींगा 

शाबास ़़़़़़़़़़
(बोई हाली मैथी बची रौलौ मोतिया बल्दा!
खूब करुंला खेती)
शाबास़़़़़़़़़़़
(धार में कि टूणी पहाड़ नें बसी गई बानर और गुणी )
शाबास़़़़़़़़़़़़
पहाडा़ का धार मजि मंदिरों का गेटा
इज बाबू कणि छोडि़  बेर च्याल ब्वारी देशा)
शाबास ़़़़़
(बूड़ बाणियों दाणा पहाड़ मे पलायनैं क मारा 
कुडि़ बाड़ी छूटी सारी छूटी सारी सारा )
शाबास ़़़़़़़़़़़
(कतू भली बोलि हमरी कतू भलि रीता
चांचरी और न्योलि छपेली कतू भला गीता )शाबास़़़़़़़़़़़
(किलै छोडो़ पहाड़ तुमूलें घर कूडी़  किला छोडी़ 
इज बाबुल बणाई हय हांटा भांटा टोडी़)
शाबास ़़़़़़़

शनिवार, 26 जुलाई 2025

कविता तुम बन जाओ किसी की

(( मित्र तुम और मधुकवि))
मधुर कृत कविता

कविता तुम बन जाओ किसी की||
बजह बनो तुम कहीं हँसी की||

क्यों तुम अहंकार में डूबे||
तुम्हें एक दिन कोई ना पूछे||
सुंदरता स्थिर ना रहती,
कभी कहीं यह भी तो रूठे||
अहंकार से हो कुरूप सब,अहंकार की वृत्ति न नीकी||
कविता तुम बन जाओ किसी की||

मित्र भाव होकर घुल जाओ||
आओ साथ हमारे आओ|
जीवन सुंदर हो जाता है,
जब तुम थोड़ा भी मुसकाओ||
मुख की कान्ति चमका उठती है,आ जाती रितु  प्रेम खुशी की||
कविता तुम बन जाओ किसी की||

करो प्रोत्साहित तुम मुझको||
मै अपना सा समझूँ तुम को||
हृदय धरा हो उठे अंकुरित,
ऐसा बीज बनादो खुदको||
करता हूँ नित यही निवेदन,स्वीकार कर प्रीति दुखी की||
कविता तुम बन जाओ किसी की||

जीवन का तुम हो उजियारा||
फिर भी जाने क्यों अँधियारा||
तुम ऊषा का नव सूरज हो,
मैने कितनी बार निहारा||
अलंकार रस छंद शब्द तुम,तुम बेरा हो प्रणय घड़ी की||
तुम कविता बन जाओ किसी की||

pahadi batohi

परिचय - बाट् में हिटणी कैं बटौव,बटोही या बटौ कैई जाँ,चाहे वील जांण काँईं हो,वीकि मंजिल चाहे क्यै लै हवो,उधैं कैई बटौही जाँ।
  आखिर में कें देखूण चाँ कि 'बटौही आपण पहाड़,गैल पातल,डान-कान,जंगोव-जमीन,गाड़-गध्यार,भिड़-कनाव्,ढुंग-पाथर,बाट् नमस्कार दोस्तों मेरा नाम है देव सती रानीखेत उत्तराखंड से हमारे चैनल मे आपको
कुमाऊनी भाषा से संम्बधित लेख,
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कुमाऊ की प्रसिद्ध रामलीला व
गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरित मानस
सुंदरकांड
एवं भजनों से सम्बधित विडियों देखने हेतु लाईक व सस्क्राईब करेंगें! 

रविवार, 20 जुलाई 2025

चुनाव चिन्ह

!!चुनाव चिन्ह !!
जो उम्मीदवार कभैं नी उठ रत्तिव्यान वी चुनाव चिन्ह छ उगता सुरज निशान!!

 जो उम्मीदवार क नी है रो ब्या उ चुनाव चिन्ह अंगूठी ल्या!!

 जो उम्मीदवार क गौं छ रोड बटी दस किलोमीटर दूर  वी चुनाव चिन्ह छ अंगुर!!

 जो उम्मीदवार कै चै गाड़ी मे फ्रंट सीट वी चुनाव चिन्ह छ ईट!!

जो उम्मीदवार ल बजै है आपूण खेती बाडी़ वी चुनाव चिन्ह छ अनाजै बाली!!

जो उम्मीदवार ल कभैं नी पढ़ किताब वी चुनाव चिन्ह छ कलम दवात!!

जो उम्मीदवार ल नी कर आपण गौंक विकास वी चुनाव चिन्ह छ अन्नानास!!

 जो उम्मीदवार ल जंगोंव नी कर हरि भरी ग्रीन विक चुनाव चिन्ह छ आइसक्रीम!!

जो उम्मीदवार सबूहें लेट वी चुनाव चिन्ह छ कप प्लेट!!

जो उम्मीदवार ल नी काट कभैं आपूंण बाटोंक झाड़ी वीक चुनाव चिन्ह छ  कुल्हाड़ी!!

जो उम्मीदवार ना जाण ना पन्यार उनर चुनाव चिन्ह अनार!!

सबका साथ सबका विकास आपूण बोतल आपूण गिलास

देव सती

बुधवार, 16 जुलाई 2025

हरेला

गेहूं,जौ और मक्का के बीजों से 
होती इसकी शुरुआत है।
डलिया में बोया जाता,अंधेरे मे रखा जाता,
कोई ना कोई बात है।।

बैशाखी, होली की तरह,
कृषि प्रधान त्योहार है।
हमारी सामाजिक,पारिवारिक और
धार्मिक सास्कृतियों का आधार है।।

अन्न,धन-धान्य् और प्रतीक
"हरेला" समृद्धि का ।
अंबर सा ऊंचा,धरती सा विशाल,
दूब सा विस्तार,आशीर्वाद है वृद्धि का ।।
ऋतु परिवर्तन का सूचक,
पर्व हरियाली का होता है।
आशीर्वाद मिलता है बड़ों का,
वातावरण ख़ुशहाली का होता है।।
नौ दिन रहता अँधेरे में, 
पतीशा जाता दसवें दिन ।
तिलक चन्दन अक्षत से अभिमंत्रित होता।
देवों को होता प्रथम अर्पित,
शुरु ना होता पूजा बिन।।
 एक पहल हम सब
मिलकर इस बार करें।
हरेला के पावन पर्व पर,
*वृक्ष लगाकर, धरती का श्रृंगार करें।।*

*आप सभी को हरेला पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं*

देव सती(पहाड़ी बटोही)

शनिवार, 5 जुलाई 2025

श्रीमान हि रा बल्लभ पाठक जी की रचना

आब् मीं घरै रूंल्  
🌹🌿🌹🌿🌹
अहो दाज्यु लछीकाक् च्यल् घर ऐ रौ 
सूट-बूट पैरिबेर् बुलबुलि फटके ल्यैरौ
हाय अंकल हाय आन्टी 
क्याप्-क्याप् कुंण लैरौ 
अहो दाज्यु लछीकाक् .........।
मिकैं मिलि पड़ौ कुंण लागौ हाऊ आर यू 
मिल् इथां-उथां चा कां छ रे यू (कुकूर)
तब कूंणौ यू आर फूल 
मिल् कौ आयि लगैई नि रै कां बटी फुल्ल।
अहो दाज्यू लछीकाक् ......... ।
आंगण में मोवक् थुपुड़ देखिबेर
छी: छी: कूंण लैरौ
यौ गन्दगीक् ढेर घर आघिल् क्यले लगै रौ
अपणि ईज थैं कूंण लैरौ
अहो दाज्यू लछीकाक् ......।
गन्दगीक् ढेर न्हाति प्वथा
जैविक खाद छु यौ
खेतन् में हालिबेर भलौ-भल् नांज 
और साग-पात लै हुंछ यौ खादैल्
जै में स्वाद और मिठास लै हैंछ
और हैंछ तागत, क्यै पगली रौछै
अहो दाज्यू लछीकाक् ......।
हमर् पहाड़ैकि ठन्डि हव
शहर  में कां छू एसि फिजा
होइ इजा सई कुनैछै 
भबरि गयूं शहर जै बै
अहो दाज्यू लछीकाक् ......।
इजा आब् यांई रूंल् 
अपणि खेति कमिन करूल्
गोरु बाछा भैंस बाकर 
पाइ बेर जीवन बचूल्
शहरी जिनगी बेकार छु इजा
आब् मी घरै रूंल , आब् मी घरै रूंल्
अहो दाज्यू लछीकाक् .......।
○•○•○•○•○•○•○•
( हीराबल्लभ पाठक "निर्मल",  
स्वर साधना संगीत विद्यालय

शनिवार, 21 जून 2025

श्रीमान प्रकाश चन्द्र तिवाडी़ ज्यू रचना

*योग करो ,पराणि चंख धरो*
योग जरूरी छ, सबै योग करो ।
योग करिबे पराणि चंख धरो ।
रत्तै जल्दी उठो ठंडी हाव खाओ ,शरीरैकैं खूब चलाओ ।
रात हैं अबेर तक जागि बे,
रोगूँ कैं आपुहैं नि बुलाओ । 
जदूकै खांचा अन्न पाणि, उद्कै शरीरैकैं लै चलाओ ।
जैल पस्यण भ्यार आओ,
उदुकै व्यायाम करि जाओ ।
बैठी बैठियै शरीरैकि गाड़ि जाम हैजैं ।
बिन बुलाइयै बीमार होणै नौमत ऐंजैं ।
आजाकि आराम तलब जिन्दगी में, योग और जरूरी हैगो । 
किलैकि काम करिबे पस्यण बगौणौं जमान न्हैगो ।
यैक लिजी रोज रत्तै ब्याव , भलिकै योग करो ।
योग करिबे आपण - आपण , पराणि चंख घरो ।1।

आज योग व्यायाम किलै जरूरी छ सब जाणण लैरी ।
जगां जगां योग सिखौ हैं , 
नयी नयी उपाय हैरी ।
बाबा रामदेव योग सिखैबे , योग गुरु नामैल प्रसिद्ध हैरी ।
लोग टी वी चैनल देखबे लै,
 रोज योग करण लैरी ।
आओ हम सब लै योग कर णौ, आज बे संकल्प लिनु ।
रोज रत्तै - व्याव कुछ टैम ,
योग करहैं धर लिनु । 
योग करिबे तन और मन ,
दिमाग कैं स्वस्थ धरो । 
योग करिबे आपण -आपण,
पराणि चंख धरो ।2। - प्रकाश चन्द्र तेवाड़ी - अध्यापक

सोमवार, 7 अप्रैल 2025

श्रीमान विनोद पंत ज्यू क कुमाउनी कविता

एक दिन घरवाई कूण बैठी - 

दिगौ तुम देखीण चाण बान हुना ,
 लम्ब चौड पोठ्ठी पबलवान हुना  |
नौकरी हुनि सरकारि , खूब हुन कैश ,
तुम कमैबेर लूना , मी करन्यू ऐश | 
हल्द्वाणि मे मकान फोरह्वीलर गाडि हुनि ,
टमाटर जास गलाड उमे झक्क दाडि हुनि |
  पर कि करूं ......
ख्याड पडन म्यार सोल सोमवार ,
एक्कै दुल्हौ मिलौ उ ले बेरोजगार | 
.....   ....... ........ .......

मैलि कौ - 
बात तो तू सोल आ्न सही कैगेछी ,

तदुक चीज जै मेर पास हुनी तो फिर मेर लिजी त्वी रैगेछी ?
मेके खूब दैज मिलन भाल रिश्त उन ,
सौरास बटी पिठ्याक ठुल किश्त उन |
काकडि फुल्यूड जसि स्यैणि गोरि फनार हुनि ,
उ ले मास्टर्याणि हुनि खूब होशियार हुनि |
उ जपान और छी , बरनक अकाव छी ,
तब मेर जासनक ले एक लाख क भाव छी |
हमार आजकला लौडनाक जास हाल नि छी , 
हमार लिजी चेलिनक अकाल नि छी |
सरकारि नौकरी हल्द्वाणि मकान के भांग फुला |
फ्री फकोट मे जस मिलि रयूं उसलि काम चला ||
 #विनोद_पन्त_खन्तोली

गुरुवार, 13 मार्च 2025

फूलदेई

आज पूछ बैठी मिहूं
 क्यें छ य फूलदेई?
मैं बोल्यूं  पुरखों क विरासत छ
पहाड़ी लोकपर्व- फूलदेई

मैं न्हैं  थी हैरान, सुदूर प्रान्त क दगड़ी छी पर
उ क्यैं  जाणूं  - फूलदेई
पर, गहन छी पीड़
पहाड़ी नान ले नी जाणन  फूलदेई

रंग-रँगील फूल चुनबैर
उमड़-घुमड़ गीत गाछि
सबूकें  मंगलकामनाएँ 
गुंजन-भरी स्वर 
फूलदेई फूलदेई गुनगुनाछी

फूलदेई केवल रै ग्यों
वट्टसप्प -स्टेटस सिंबल
ज्यूनैं  निगई  गो - फूलदेई
आणि पीढ़ी अंजान हैरान,
परेशान छ शर्मिंदा छ- फूलदेई
उत्तराखण्ड संस्कृति के भूल बैर,
अब गुड मॉर्निंग छ फूलदेई

फूल हराय  बचपन हराय,
बस मूबैलों मे जिन्द छ - फूलदेई
नान छना कतु भल छी, खेल-कूद-पढ़ाई दगड़ दगड़
खेलछी फूलदेई 
आशीष, संस्कार,
मंदिरों  क  घंटी ज पवित्र- फूलदेई त्यार
हे सकों  त ताज कर द् यों फूल म  पानी छिटमारबैर 
आई ले बासी न्हैं ती - फूलदेई 

रविवार, 2 फ़रवरी 2025

वसंत पंचमी {जौ संग्यान त्यार}

जौं सग्यान प्रकृति त्यार

ठण्ड हॉव मे गर्मीक एसास
जौं संग्यान ल्या प्रकृतिक उल्लास।
खेतों मे लहलहाणि नई फसल
सब दिशा मे खुशिया मचल।
हॉव दगड़ बग री रंगों क सुर
खेतों मे छै री सरसों क भुड़।
हर पील रुमाव दगड़ बधिं छ प्यार
जौ संग्यानि पर्व अपार।
वीणावादिनी मय्या आशीर्वाद दगड़
आपूण संस्कृति क त्यार दगड़।
यई छ संस्कृति यई छ सार
सबूहें है भल जौं संग्यानि त्यार।

वसंत पंचमी क भौत भौत शुभकामनायें @देव सती

बुधवार, 22 जनवरी 2025

उतरैणी काव

*उत्तरैणी क कव्वाक नई मांग*

नी उन लाख धते ल्यों
मि नी खान तुमि खै ल्यों।
म्यर लिजी सूखी घूगुत
आपूं मोमो खचा।
म्यर लिजी दड़म डमरु
आपूं पिज्जा मगूंछा।
म्यर माव मे ले जब चौमिन लटकाला।
तब सोचूल आणेंकि जब बर्गर ले लटकाला।
मे त्यर काले काले कै बैर किले आऊ बाँधी न्हैति।
कान खोल बैर सुण ले तू 
मि काव छू गधा न्हैति।
 
घूघूतिया त्यारक भौत बधै

सोमवार, 20 जनवरी 2025

चौइस श्रीमान शंकर दत्त जोशी जी की

चौइस
पहाड़ा नानतिना थें पुछो 
कौनि हल्द्वानी भले लागों
हल्द्वानी नानतिनां छें पुछो
 कौनि दिल्ली भले लागों 
दिल्ली नानतिनां में पुछो तो 
मुंबई बैंगलौर कौनि 
मुंबई बैंगलौरा नानतिना छें पुछो 
तो विदेश भले लागों कौनि 
और विदेशा नानतिना हैं पुछो तो
 उत्तराखंडा कें सबों है भल बतोंनि ।।