शुक्रवार, 8 अगस्त 2025

धराली उत्तरकाशी आपदा

हजारों पेडों की बली देकर परिहास करते हो 
वनों से फिर ठण्डी हवा पानी की आस करते हो
अरे पहाड़ो को खोदकर कुरूप कर दिया तुमने 
क्या इसी को तुम विकास कहते हो 

पहाड की माटी पत्थर सोने के भाव बेच रहे हो 
क्या कभी बारीश में सहम्ति कुडियों की सुध भी लिए रहे हो
आज दरक रहे हैं पहाड दफन हो रही है मासूम है सांसे 
क्या इसी को तुम विकास कहते हो 

अरे कितने नेता आये कितने अधिकारी आये 
न रूका है ये खनन न रूक वनो का दमन  
पहाड के युवा का रोजगार छीन कर भण्डार अपने भरते हो 
क्या इसी को तुम विकास कहते हो 

अरे अब तो देखो सरयू सुख कर पैताल चली गयी 
दो नदियों के संगम में पानी के लिए त्राहि त्राहि मच गयी 
जाने क्या मिलेगा रोज सरयू माँ की छाती खोद कर
क्या इसी को विकास कहते हो 

हजारों पेडों की बली देकर परिहास करते हो 
वनों से फिर ठण्डी हवा पानी की आस करते हो
**********************************
भास्कर सिंह नेगी (गुरु)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें