हजारों पेडों की बली देकर परिहास करते हो
वनों से फिर ठण्डी हवा पानी की आस करते हो
अरे पहाड़ो को खोदकर कुरूप कर दिया तुमने
क्या इसी को तुम विकास कहते हो
पहाड की माटी पत्थर सोने के भाव बेच रहे हो
क्या कभी बारीश में सहम्ति कुडियों की सुध भी लिए रहे हो
आज दरक रहे हैं पहाड दफन हो रही है मासूम है सांसे
क्या इसी को तुम विकास कहते हो
अरे कितने नेता आये कितने अधिकारी आये
न रूका है ये खनन न रूक वनो का दमन
पहाड के युवा का रोजगार छीन कर भण्डार अपने भरते हो
क्या इसी को तुम विकास कहते हो
अरे अब तो देखो सरयू सुख कर पैताल चली गयी
दो नदियों के संगम में पानी के लिए त्राहि त्राहि मच गयी
जाने क्या मिलेगा रोज सरयू माँ की छाती खोद कर
क्या इसी को विकास कहते हो
हजारों पेडों की बली देकर परिहास करते हो
वनों से फिर ठण्डी हवा पानी की आस करते हो
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भास्कर सिंह नेगी (गुरु)
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