पहाड़ी बटोही
मैं पहाड़ी बटोही हूँ,
राहों से मेरी पहचान है।
पगडंडी मेरी गुरु बनी,
हर मोड़ मेरी जान है।
देवदार की छाया में
मैंने सपने सींचे हैं,
पत्थरों से टकरा कर भी
हौसलों के दीप जले हैं।
न शहर की चकाचौंध मुझे भाती,
न दौलत का दिखावा चाहिए,
दो वक्त की रोटी, सच्ची नींद
और पहाड़ का साया चाहिए।
नदियों से सीखा बहते रहना,
चट्टानों से सीखा सहना,
बर्फ़ ने सिखाया धैर्य रखना,
तूफ़ानों से डरना नहीं कहना।
मैं पलायन की पीड़ा भी जानूँ,
माँ की सूनी आँखें पहचानूँ,
फिर भी लौट आने का सपना
हर साँस में रोज़ बुनता जाऊँ।
मैं पहाड़ी बटोही हूँ,
मंज़िल से ज्यादा सफ़र जरूरी है,
क्योंकि चलना ही मेरी पूजा है
और पहाड़ मेरी मजबूरी नहीं—
मेरे लिये ज़रूरी है
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