गुरुवार, 18 दिसंबर 2025

मनरेगा के कामदारों की व्यथा

मनरेगा के कामदारों की व्यथा

मजदूरीक ले कर ल्यो हिसाब,
कागज में स्वर्ग, धरातल में ख्वाब।
धूप-पानी में देह गलाय,
फिर भी पेट खाली घर जांय।

फावड़ा बोले—मेहनत साँच,
फाइल बोले—“कल आना आज”।
भोट बखत नेता सब साथ,
मजदूरी बखत बंद मिलै हाथ।

खण दगै नूण अर प्याज,
गरीब क भाग्य स्यै रो समाज।
प्रधान-ठेकेदार रचैं खेल,
मजदूर रहै बस नामक मेल।

कार्यस्थल पर न छ दवाई,
न छ छाया, न छ सुनवाई।
लागै चोट तो राम सहार,
अस्पताल छ कोसों पार।

शासन कहै—“हम मजबूर”,
कानून बैठी छ खुद अपाहिज़-नूर।
बीमा, सुरक्षा सब भाषण-ढोंग,
हकीकत में मजदूरक शोषण भोग।

कामदार माँगै दया न दान,
माँगै सिर्फ़ अपना हक-सम्मान।
टैम पर मजदूरी मिलै अपार,
तब साँच कहौं—विकास छ यार ॥

✍️पहाडी़ बटोही (देव सती)

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