यह कविता पहले से ही बहुत गहरी है—दर्द भी है, सवाल भी, और पहाड़ की सच्चाई भी।
❖ मैं लेखूँ त क्ये लेखूँ — (कुमाऊँनी कविता)
क्ये लेखनूँ?
देवभूमि तूँ, मैं राक्षसौं क ताँडव लेखूँ—
नेताओँक खोखलो विकास लेखूँ—
कर्मचारियूकी ठगणी नीयत लेखूँ।
दगडियो, तुमै बताओ—
आब मैं को एंगल बटिक?
पहाड़ेकि कसि-कसि खूबसूरती लेखूँ?
मैं लेखूँ त क्ये लेखूँ?
बांज गौं मैं कुरी बुज लेखूँ?
टुटि-फूटी कुड़ी-बांज बाडि-ख्वाडि लेखूँ?
बिन नानौंक सुन्न स्कूल लेखूँ?
खाल्ली सड़केकि अलख पीड़ लेखूँ?
बिन डाक्टरों क सूनौ असपताव लेखूँ?
मैं लेखूँ त क्ये लेखूँ?
एकलै थड़ि बैठी,
आम-बुबुक कवीड़ कहाणी लेखूँ?
ब्वारि गोरबाछ्नेकि पीड़ लेखूँ?
बागौंक डुडाट—सुंअर-बानरनौक उज्याड़ लेखूँ?
दगडियो, आब तुमै बताओ—
मैं लेखूँ त क्ये लेखूँ?
देव सती (पहाड़ी बटोही)
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