रविवार, 14 दिसंबर 2025

गौरंया

दाना चुगती, मेरे घर को अपना घर समझ गौरंया

दाना चुगती— मेरे घर को,
अपना घर समझती गौरैया…
छोटे पंखों की फड़फड़ाहट,
मन में भर दे मीठी छैयाँ… 


कभी खिड़की, कभी आंगन में,
बैठ के गुनगुन गाती है…
जैसे कोई पुरानी दोस्त,
हर सुबह मिलने आती है…

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