शनिवार, 5 जुलाई 2025

श्रीमान हि रा बल्लभ पाठक जी की रचना

आब् मीं घरै रूंल्  
🌹🌿🌹🌿🌹
अहो दाज्यु लछीकाक् च्यल् घर ऐ रौ 
सूट-बूट पैरिबेर् बुलबुलि फटके ल्यैरौ
हाय अंकल हाय आन्टी 
क्याप्-क्याप् कुंण लैरौ 
अहो दाज्यु लछीकाक् .........।
मिकैं मिलि पड़ौ कुंण लागौ हाऊ आर यू 
मिल् इथां-उथां चा कां छ रे यू (कुकूर)
तब कूंणौ यू आर फूल 
मिल् कौ आयि लगैई नि रै कां बटी फुल्ल।
अहो दाज्यू लछीकाक् ......... ।
आंगण में मोवक् थुपुड़ देखिबेर
छी: छी: कूंण लैरौ
यौ गन्दगीक् ढेर घर आघिल् क्यले लगै रौ
अपणि ईज थैं कूंण लैरौ
अहो दाज्यू लछीकाक् ......।
गन्दगीक् ढेर न्हाति प्वथा
जैविक खाद छु यौ
खेतन् में हालिबेर भलौ-भल् नांज 
और साग-पात लै हुंछ यौ खादैल्
जै में स्वाद और मिठास लै हैंछ
और हैंछ तागत, क्यै पगली रौछै
अहो दाज्यू लछीकाक् ......।
हमर् पहाड़ैकि ठन्डि हव
शहर  में कां छू एसि फिजा
होइ इजा सई कुनैछै 
भबरि गयूं शहर जै बै
अहो दाज्यू लछीकाक् ......।
इजा आब् यांई रूंल् 
अपणि खेति कमिन करूल्
गोरु बाछा भैंस बाकर 
पाइ बेर जीवन बचूल्
शहरी जिनगी बेकार छु इजा
आब् मी घरै रूंल , आब् मी घरै रूंल्
अहो दाज्यू लछीकाक् .......।
○•○•○•○•○•○•○•
( हीराबल्लभ पाठक "निर्मल",  
स्वर साधना संगीत विद्यालय

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें