रविवार, 14 दिसंबर 2025

राम राम रैम रैम

राम-राम तो लोगों से अब होती ही नहीं,
पर मोबाइल की रैम हर महीने बढ़ती जा रही है।
रिश्तों की गर्माहट कहाँ बची आजकल,
पर फ़ोन की गर्मी सबके हाथ जलाती जा रही है।

पहले देहरी पर बैठकर गप्पें जमती थीं,
आज चैट में ही दुनिया बसाई जा रही है।
इंसान इंसान से दूर होता चला गया,
पर रैम देखकर ख़ुशियाँ मनाई जा रही हैं।

आँखों में आँखें डाल बात होती थी कभी,
अब “सीन” पर ही दोस्ती निभाई जा रही है।
सुख-दुख पूछने का वक़्त किसे है यहाँ,
स्टेटस से ही संवेदनाएँ जताई जा रही हैं।

माँ की पुकार भी वाइब्रेशन में दब गई,
बाप की सीख “नोटिफ़िकेशन” में खो गई।
घर के आँगन सूने, चौपालें वीरान,
पर स्क्रीन पे भीड़ रोज़ सजाई जा रही है।

राम-राम कम हुई, रैम बढ़ती गई,
संस्कार पीछे छूटे, सुविधा आगे बढ़ती गई।
तकनीक बुरी नहीं, नीयत का दोष है,
मोबाइल अपडेड
इंसानियत ही सबसे ज़्यादा “डाउनग्रेड” हो गई।

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