सोमवार, 17 नवंबर 2025

१९९०/२०००

“नब्बे बनाम दू–हजारी – एक तगड़ो व्यंग्य”

✍️ देव सती (पहाड़ी बटोही)

नब्बे वाल बोलू —
“हमन भल जमाना देख,
चौमासें घस्यारी, सौणें रस्यार,
चूलन में धूँ फूक नैख।

स्लेट–पेन्सिल, कापी–पुस्तक,
स्कूल जाण–त्योहार
खेतन में खेल-खालि,
गुल्ली–डंडो हमार।”

दू–हजारी हँसू —
“हम रील बनौला दाज्यू,
तुम गुल्ली–डंडा में अट्क्या,
हमन लाइक–फॉलो मागा,
स्कूल बटि त बस स्टक्या!

ऑनलाइन क्लास में सोया
माइक म्यूट में गप्प मारी,
कैमरा ऑफ करि खोया मार्क्स झटकन पारी!”

नब्बे वाल चाहा पीनी,
चुल्हा–धुँए में छनकै,
दू–हजारी — “कप फोम वाला दो दाज्यू,
इंस्टा स्टोरी में जमकै!”

नब्बे बोले — “हमन काम में पक्क,
काटि दै खेत–खलां।”
दू–हजारी — “हम पबजी में पक्क,
चलूनू आंगू छलां!”

अँतिम में द्वी भिड़्या —
नब्बे बोली — “हम चलन पहाड़।”
दू–हजारी बोली — “हम चलौँ प्लेन्स,
औ ट्रेंड क रोडा़

साँच यो छ —
दोनो पीढ़ी महान, बस चाल अलग–अलग छ,
एक जमीन से जुड़ेलो,
एक वाई–फाई पर टॉगी छ!

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