🪔 पूष क महैंण बैसी 🪔
पूष क महैण पैल पैट पहाड़ क धूणियों में प्रार्थना,
घामक इंतजार में ठिठुरी विश्वास।
धूणियोंक चौखट पर
दीये की लौ के हो,
आज बटिक बैसी छ।
बाईस दिनी…
टैम ले मॉठू मॉठ चलू,
कदम कदम में अनुशासन,
आँखों में श्रद्धा क उज्याव।
घंटी क ध्वनि में पिरोई जानि
दिन, रात और मौन क क्षण।
हवन की अग्नि
साँसों कै गरम करै,
मंत्रों क धार
ह् यू ठण्ड चीरतें न्हैं जा।
एक टैमक खण,
धरती बिछौण,
और ईष्ट क नाम—
यई त छ बैसी क सार।
घामतैल लागि गौं गौं क सयाण मैंस,
आपणि थकान उतारु।
बुज़ुर्गों क आँखों में
पुरखों क काथ चमक उठे।
और उ कौनि
पूषक मैहैंण करी जै जो साधना,
देवों क द्वार तक सीध्ध न्हैं जै।
रात भौत लम्ब हूनी,
पर विश्वास जागतें रु।
ठण्ड हड्डियों तक उतरें,
पर संकल्प पिघलन नी दिन।
हर श्वास क दगाड़,
ईष्ट नाम का सहार—
यई त बैसी क परीक्षा छ।
जब बाईसवाँ सूरज उगू,
तब लागू,
मानो ईष्टदेव स्वयं उतर ऐगी पहाड़ पन।
बैसी कोई रस्म न्हैती,
य पहाड़ क आत्मा छ—
तप, त्याग और धैर्य की पछ्याण।
पूष क ठण्ड में
जो इके निभै ल्यू,
विक जीवन
ईष्ट क कृपा महक जा।
— पहाड़ी बटोही (देव सती)
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