(( मित्र तुम और मधुकवि))
मधुर कृत कविता
कविता तुम बन जाओ किसी की||
बजह बनो तुम कहीं हँसी की||
क्यों तुम अहंकार में डूबे||
तुम्हें एक दिन कोई ना पूछे||
सुंदरता स्थिर ना रहती,
कभी कहीं यह भी तो रूठे||
अहंकार से हो कुरूप सब,अहंकार की वृत्ति न नीकी||
कविता तुम बन जाओ किसी की||
मित्र भाव होकर घुल जाओ||
आओ साथ हमारे आओ|
जीवन सुंदर हो जाता है,
जब तुम थोड़ा भी मुसकाओ||
मुख की कान्ति चमका उठती है,आ जाती रितु प्रेम खुशी की||
कविता तुम बन जाओ किसी की||
करो प्रोत्साहित तुम मुझको||
मै अपना सा समझूँ तुम को||
हृदय धरा हो उठे अंकुरित,
ऐसा बीज बनादो खुदको||
करता हूँ नित यही निवेदन,स्वीकार कर प्रीति दुखी की||
कविता तुम बन जाओ किसी की||
जीवन का तुम हो उजियारा||
फिर भी जाने क्यों अँधियारा||
तुम ऊषा का नव सूरज हो,
मैने कितनी बार निहारा||
अलंकार रस छंद शब्द तुम,तुम बेरा हो प्रणय घड़ी की||
तुम कविता बन जाओ किसी की||
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