पहाड़ पन ब्या-काज — व्यंग्यपूर्ण
पहाड़ पन ब्या-काज को जमाना बदली ग्यो,
अब ब्या कम — “इवेंट मैनेजमेंट” ज्यादा है गो!
एकै दिन में एक बटि जादे न्यौत आणी,
जैसे गौं मैराथन-रैली कूद रयी हो!
क्वे देखो न देखो—
बस WhatsApp में कार्ड उछाल दीनि
और समझ ल्यो— “फर्ज निभी गो!”
पैली बटि ब्या-घर में
आमा-बुबू, काका-काकी— सब रसोई-चौंतरा मै रौनक अब
घर में सन्नाटा…
काम-काज सब ‘ठ्याक-कंपनी’ के,
और घरवाल—रात भर रील देखण में व्यस्त!
पैली बटि नानका-ठूलका ताऊ-बुबू— लकाड़ फाड़ण,
बुआ-काखी— दुकान बटि चाउ-पिसूं ल्याण,
काकी-भौजी उखो-मस्याल कूटण…
आब?
बस नैपालि बुलाय द्यै—
“काम तमाम”— एकै फोन में सेट!
पैली बटि घरौं-घर जै बै न्यौत दिछी—
मान, माया, बोल-बाणी… सब!
आब—
“इतु पैट ब्या छू—जे बखत आइजा ऐ जाया।”
जैसे ब्या को न्यौता न,
सरकारी नोटिस जारी हो!
बर्याती-बरेतिन कै हालत भी बदलि गई—
पैली बटि पींठा-ले बर्यात बिदाई टैम पर लगाई जाछी,
आब गेट पर बबाल टलाई
क्याऊ प्ंय्या पतैल वाल गेट पर लाल कपड़ वाल स्वागतम्
आब गेट पर टेंट-वाल लाल मैटिंग,
और स्वागत करण वाल डीजे—
जो बजाल— “दुल्हन हम ले जाएंगे!”
(पंडित-ज्यू भी सोचण— कौन ले जाणै, कब ले जाणै?)
लगन-पत्री पढ़ण को टाइम कनै छै—
सबू मान फोटोग्राफर-क!
उ त—
“सात फैरों में कै दीन?”
आठ फ्यार ले लगै द्यै— एंगल बढ़ो छू!
अंत मै—
ब्या काज कम,
दिखावा ज्यादा।
रिवाज कम,
रील ज्यादा।
और पहाड़—
बस पहाड़ रै गो…
ब्या-काज पूर कारोबार बनि गो!
देव सती (पहाड़ी बटोही)
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