मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

welcm 2026

साल २०२५बिदा, साल २०२६ स्वागत
जाणि वाल साल बिदा तू कै
सुख-दुख द्विनूं बाटी दीं।
गिरि-पड़ि बै जे सिख मिलि
तूल जीणूं ढंग समझाई दीं।
आणि साल, स्वागत छ तेरो,
नयी उज्यालो, नयी सवेरो।
टूटी सपन फिर पंख पावो,
हर मन मा मुस्कान भरि जावो।
जो छूटि गो याद बणि रो
जो मिलि गो संग निभैं जो
बीति  दिन अनुभव बणि जो
जाणि साल—धन्यबाद तेरो
आणि साल—खुशी बसै जो।
देव सती पहाड़ी बटोही

रविवार, 21 दिसंबर 2025

कुमाऊँ का गॉव (विकास क नाम पर विनाश)

कुमाऊँ का गाँव : विकास क नाम पर विनाश

आज़ादी बाद कुमाऊँ का गौं गौंनों मे विकास क नाम पर खेल चलो
हर साल पैड़ लगाई  , हर साल फोटो खिंची
पर जंगल आज ले  नंग छन।
पौध लगै दी, पर बचै कतुक?
जंगोव क नाम पर सोंव भरि गो
पानी सूखि गो, माटी सरकण लाग गो
काग़ज़ मै हरियाली,
गौं मा सुवर बानरों क उजाड़।
सड़क क नाम पर पहाड़ काट दी
न तो ढाल समझी, न पाणिक  धार।
आज सड़क छ,
भों भूस्खलन छ।
खेत गो, घर गो,
पर रिपोर्ट मे सब ठीक छ।
पाणि बचाण क योजना बनी।
नौला बूसी  गी  धारा चुप छी।
खाल खन्ती काग़ज़ मा चलि,
गों मै पाणिक टंकी आय ले सुन्न छी
सबूहें ठूल गलती
गौंक आदमी क कोई मोल न्हैति
स्याण बलो त चुप करै दीनि
ठेकेदार बलो त योजना पास।
विकास अगर यई छ,
तो पहाड़ कसिक बचाल?
हर साल काम हूण बटि मतलब न्हैति
काम ठीक कसिक हल 
पहाड़ कै बचाण छ,
तो दिखावा छोड़ों।
माट ज सीख,
पाणि ज चल,
अर गौंक आदिम है पूछ।
नतर य विकास
सिर्फ़ नक़्श मे रै जाल,
और गौ याद मा।
देव सती पहाड़ी बटोही

गुरुवार, 18 दिसंबर 2025

मनरेगा के कामदारों की व्यथा

मनरेगा के कामदारों की व्यथा

मजदूरीक ले कर ल्यो हिसाब,
कागज में स्वर्ग, धरातल में ख्वाब।
धूप-पानी में देह गलाय,
फिर भी पेट खाली घर जांय।

फावड़ा बोले—मेहनत साँच,
फाइल बोले—“कल आना आज”।
भोट बखत नेता सब साथ,
मजदूरी बखत बंद मिलै हाथ।

खण दगै नूण अर प्याज,
गरीब क भाग्य स्यै रो समाज।
प्रधान-ठेकेदार रचैं खेल,
मजदूर रहै बस नामक मेल।

कार्यस्थल पर न छ दवाई,
न छ छाया, न छ सुनवाई।
लागै चोट तो राम सहार,
अस्पताल छ कोसों पार।

शासन कहै—“हम मजबूर”,
कानून बैठी छ खुद अपाहिज़-नूर।
बीमा, सुरक्षा सब भाषण-ढोंग,
हकीकत में मजदूरक शोषण भोग।

कामदार माँगै दया न दान,
माँगै सिर्फ़ अपना हक-सम्मान।
टैम पर मजदूरी मिलै अपार,
तब साँच कहौं—विकास छ यार ॥

✍️पहाडी़ बटोही (देव सती)

बुधवार, 17 दिसंबर 2025

अंगीठी मे रखा कोयला

🔥 सगट में धरी क्वैल
(कुमाऊनी राजनीतिक व्यंग्य)

सगट में धरी क्वैल जस,
राज चलणो छ चुपचाप,
मंचन में ठंड हँसण,
भितर-भितर जलणो छ ताप।

नेताजी बोलि — सब ठीक,
महँगाई बोलि — चुप र,
जनता हाथ लगै भैठी,
हाथ जली, आवाज़ ए गुम र।

कागजन में विकास चमकण,
धरातल माजूण जस ठंड,
सवाल करो जो आम आदिम,
वी पर मुकदमा — देशद्रोही

वोट बखत फूँक मारण,
क्वैल जलो त फोटो खिंचो,
सगट सरकार हाथन में छ,
क्वैल जनता की साँस।

जैं दिन सगट उलटि जाल,
उ दिन बदलल इतिहास।

✍️ पहाड़ी बटोही (देव सती)

मंगलवार, 16 दिसंबर 2025

पूषक मैहैण बैसी

🪔 पूष क महैंण बैसी 🪔

पूष क महैण पैल पैट पहाड़ क धूणियों में प्रार्थना,
घामक इंतजार में ठिठुरी विश्वास।
धूणियोंक चौखट पर
दीये की लौ के हो,
आज बटिक बैसी छ।

बाईस दिनी…
टैम ले मॉठू मॉठ चलू,
कदम कदम में अनुशासन,
आँखों में श्रद्धा क उज्याव।
घंटी क ध्वनि में पिरोई जानि
दिन, रात और मौन क क्षण।

हवन की अग्नि
साँसों कै गरम करै,
मंत्रों क धार
ह् यू ठण्ड चीरतें न्हैं जा।
एक टैमक खण,
धरती बिछौण,
और ईष्ट क नाम—
यई त छ बैसी क सार।

घामतैल लागि गौं गौं क सयाण मैंस,
आपणि थकान उतारु।
बुज़ुर्गों क आँखों में
पुरखों क काथ चमक उठे।
और उ कौनि
पूषक मैहैंण करी जै जो साधना,
देवों क द्वार तक सीध्ध न्हैं जै।

रात भौत लम्ब हूनी,
पर विश्वास जागतें रु।
ठण्ड हड्डियों तक उतरें,
पर संकल्प पिघलन नी दिन।
हर श्वास क दगाड़,
ईष्ट नाम का सहार—
यई त बैसी क परीक्षा छ।

जब बाईसवाँ सूरज उगू,
तब लागू,
मानो ईष्टदेव स्वयं उतर ऐगी पहाड़ पन।

बैसी कोई रस्म न्हैती,
य पहाड़ क आत्मा छ—
तप, त्याग और धैर्य की पछ्याण।
पूष क ठण्ड में
जो इके निभै ल्यू,
विक जीवन
ईष्ट क कृपा महक जा।

— पहाड़ी बटोही (देव सती)

रविवार, 14 दिसंबर 2025

राम राम रैम रैम

राम-राम तो लोगों से अब होती ही नहीं,
पर मोबाइल की रैम हर महीने बढ़ती जा रही है।
रिश्तों की गर्माहट कहाँ बची आजकल,
पर फ़ोन की गर्मी सबके हाथ जलाती जा रही है।

पहले देहरी पर बैठकर गप्पें जमती थीं,
आज चैट में ही दुनिया बसाई जा रही है।
इंसान इंसान से दूर होता चला गया,
पर रैम देखकर ख़ुशियाँ मनाई जा रही हैं।

आँखों में आँखें डाल बात होती थी कभी,
अब “सीन” पर ही दोस्ती निभाई जा रही है।
सुख-दुख पूछने का वक़्त किसे है यहाँ,
स्टेटस से ही संवेदनाएँ जताई जा रही हैं।

माँ की पुकार भी वाइब्रेशन में दब गई,
बाप की सीख “नोटिफ़िकेशन” में खो गई।
घर के आँगन सूने, चौपालें वीरान,
पर स्क्रीन पे भीड़ रोज़ सजाई जा रही है।

राम-राम कम हुई, रैम बढ़ती गई,
संस्कार पीछे छूटे, सुविधा आगे बढ़ती गई।
तकनीक बुरी नहीं, नीयत का दोष है,
मोबाइल अपडेड
इंसानियत ही सबसे ज़्यादा “डाउनग्रेड” हो गई।

गौरंया

दाना चुगती, मेरे घर को अपना घर समझ गौरंया

दाना चुगती— मेरे घर को,
अपना घर समझती गौरैया…
छोटे पंखों की फड़फड़ाहट,
मन में भर दे मीठी छैयाँ… 


कभी खिड़की, कभी आंगन में,
बैठ के गुनगुन गाती है…
जैसे कोई पुरानी दोस्त,
हर सुबह मिलने आती है…

पहाड़ कि पीड़ा और बेरोजगार पहाड़

पहाड़ी बटोही

मैं पहाड़ी बटोही हूँ,
राहों से मेरी पहचान है।
पगडंडी मेरी गुरु बनी,
हर मोड़ मेरी जान है।

देवदार की छाया में
मैंने सपने सींचे हैं,
पत्थरों से टकरा कर भी
हौसलों के दीप जले हैं।

न शहर की चकाचौंध मुझे भाती,
न दौलत का दिखावा चाहिए,
दो वक्त की रोटी, सच्ची नींद
और पहाड़ का साया चाहिए।

नदियों से सीखा बहते रहना,
चट्टानों से सीखा सहना,
बर्फ़ ने सिखाया धैर्य रखना,
तूफ़ानों से डरना नहीं कहना।

मैं पलायन की पीड़ा भी जानूँ,
माँ की सूनी आँखें पहचानूँ,
फिर भी लौट आने का सपना
हर साँस में रोज़ बुनता जाऊँ।

मैं पहाड़ी बटोही हूँ,
मंज़िल से ज्यादा सफ़र जरूरी है,
क्योंकि चलना ही मेरी पूजा है
और पहाड़ मेरी मजबूरी नहीं—
मेरे लिये ज़रूरी है

पहाड़ी बटोही

पहाड़ी बटोही

मैं पहाड़ी बटोही हूँ,
राहों से मेरी पहचान है।
पगडंडी मेरी गुरु बनी,
हर मोड़ मेरी जान है।

देवदार की छाया में
मैंने सपने सींचे हैं,
पत्थरों से टकरा कर भी
हौसलों के दीप जले हैं।

न शहर की चकाचौंध मुझे भाती,
न दौलत का दिखावा चाहिए,
दो वक्त की रोटी, सच्ची नींद
और पहाड़ का साया चाहिए।

नदियों से सीखा बहते रहना,
चट्टानों से सीखा सहना,
बर्फ़ ने सिखाया धैर्य रखना,
तूफ़ानों से डरना नहीं कहना।

मैं पलायन की पीड़ा भी जानूँ,
माँ की सूनी आँखें पहचानूँ,
फिर भी लौट आने का सपना
हर साँस में रोज़ बुनता जाऊँ।

मैं पहाड़ी बटोही हूँ,
मंज़िल से ज्यादा सफ़र जरूरी है,
क्योंकि चलना ही मेरी पूजा है
और पहाड़ मेरी मजबूरी नहीं—
मेरे लिये ज़रूरी है