शनिवार, 24 जनवरी 2026

कडा़कें कि ठण्ड

कडाके की ठंड और पहाड़ का सच
पहाड़ों की ठंड कोई मौसम भर नहीं होती, यह अनुभव होती है—सीधे हड्डियों में उतरने वाली। जब मैदानों में “हल्की ठंड” की खबरें चलती हैं, तब पहाड़ों में नल पानी छोड़ने से पहले दो बार सोचता है। कुछ दिनों से मौसम ठंड-ठंड हो गया है और एक-आध हफ्ते से तुस्यार पड़नी शुरू हो गई है। अब तो हाल यह है कि अच्यालू पड़ी बड़ी कडाके की ठंड है।
सुबह-सुबह उठकर बाहर निकलना किसी साहसिक अभियान से कम नहीं। हवा का फरफराट ऐसा लगता है जैसे वह पुराने हिसाब चुकाने आई हो। चलने में आदमी नहीं, पहले दाँत काँपते हैं। बिछुणा छोड़ने का मन नहीं करता, और अगर मजबूरी में उठ भी जाएँ तो शरीर पूछता है—“इतनी जल्दी किस बात की?”
ठंड का असली इम्तिहान तब होता है जब हाथ में ठंडा पानी लग जाए। उस एक पल में पूरी तबियत झण्ड हो जाती है। डॉक्टर गरम पानी पीने की सलाह देते हैं, लेकिन पहाड़ का नल बड़ी शांति से कह देता है—“बसंत में मिलते हैं।” तब समझ आता है कि पहाड़ों में स्वास्थ्य केवल दवाइयों से नहीं, धैर्य से चलता है।
इन दिनों पकौड़ी और समोसा सिर्फ़ खाने की चीज़ नहीं रहे, वे ठंड से लड़ने के औज़ार बन गए हैं। लसणेकि चटडि साथ में हो तो लगता है—स्वर्ग हो या नर्क, फिलहाल यही सही जगह है। रसोईघर पहाड़ का अस्थायी हीटर बन जाता है, जहाँ आग और स्वाद दोनों से राहत मिलती है।
टोपी और मफलर अब फैशन नहीं, पहचान हैं। जो ढंग से पहन ले, वही अनुभवी पहाड़ी माना जाता है। बनैन और जैकिट की अहमियत इन दिनों किसी डिग्री से कम नहीं। ठंड में काम वही आता है जो सच में गरम रखे, बाकी सब दिखावा है।
दो महीने की यह ठंड कई बार अनंत लगने लगती है। लेकिन पहाड़ी मन फिर भी धीरज धरता है। हर सुबह यही भरोसा रहता है कि बसंत जरूर आएगा, चाहे थोड़ा देर से ही सही। यही धैर्य पहाड़ को ज़िंदा रखता है।
कडाके की ठंड का धन्यवाद इसलिए भी जरूरी है कि यह हमें हमारी जड़ों की याद दिलाती है—सादा जीवन, मजबूत हौसला और कठिन हालात में भी मुस्कराने की आदत। पहाड़ों में ठंड सिर्फ़ मौसम नहीं, एक शिक्षक है, जो हर साल हमें सहनशील होना सिखा जाती है।
— देव सती
(पहाड़ी बटोही)

गुरुवार, 22 जनवरी 2026

बसंत पंचमी

खेत सब बंजर हैं,
जौ अब खेतों में नहीं,
त्योहार निभाने को
गमलों में बोए जाते हैं।
बचपन का वह पीला रुमाल
आज भी आस लगाए बैठा है—
कि बच्चे पहनकर
खुलकर हँसें, दौड़ें, गाएँ।
पर अब त्योहार
बच्चों में नहीं,
मोबाइल की स्क्रीन में
जिंदा हैं।
उत्तराखण्ड से लोग गए,
खेत बेच दिए गए,
जो बचे
उन्हें जंगली जानवरों ने उजाड़ दिया—
फिर भी हम तसल्ली से कहते हैं,
“संस्कृति ज़िंदा है।”
हाँ, ज़िंदा है—
रिल्स में, पोस्ट में,
सरकारी कार्यक्रम में।
पीला रुमाल दीवार पर टंगा है,
और बसंत
चार इमोजी में निपट जाता है।
बसंत पंचमी से बैठकी होली तक
गीत गूँजते हैं,
पर आँगन खाली हैं।
ढोल बजता है,
पर गाँव चुप है।
जिस दिन
त्योहार फिर बच्चों के हाथ में होंगे,
खेत फिर बीज माँगेंगे—
उस दिन मानेंगे
संस्कृति सच में
जिंदा है।
देव सती पहाड़ी बटोही

उत्तरैणी त्यार

उत्तर में खिचड़ी, पुण्य स्नान।
उत्तराखंड उत्तरायणी, घुघुतों क शान।
पंजाब में लोहड़ी, आग क मान।
हरियाणा माघी, पावन स्नान।
राजस्थान पतंग, नील आसमान।
गुजरात उत्तरायण, “काई पो” जान।
महाराष्ट्र तिलगुल, मीठी बात।
मध्य प्रदेश दान, पुण्य साथ।
आंध्र संक्रांति, फसल मुस्कान।
तेलंगाना रंगोली, घर पहचान।
तमिलनाडु पोंगल, सूर्य सम्मान।
केरल मकरविलक्कु, भक्ति जान।
असम माघ बिहू, भोज महान।
ओडिशा मकर चौला, अन्न दान।
बंगाल पौष संक्रांति, गंगासागर स्नान।

हम त्यौहार बचा रहे हैं या बस उसकी तस्वीरें?
संस्कार बाँट रहे हैं या सिर्फ़ पोस्ट कर रहे हैं? घुगुतिया त्यार की शुभकामनाएँ
🌿 परंपरा निभाएँ, दिखावा नहीं
देव सती(पहाड़ी बटोही)

जौं सग्यानि

जौं सग्यान – प्रकृति, संस्कृति और जीवन क त्यार
जौं सग्यान, प्रकृति क त्यार
ठंडा हाव में गर्मी क एहसास
धूप नरम मन में जगे नई आस
जौं सग्यान ल्या उल्लास
रितू बदल बदल संसार
फुल खिले, बुरांश हँसे
हर डाल पर जीवन अपार
खेतन में लहलहाणि नई फसल
माटी बोलै, बीज हँसै
मेहनत को फल आयो आज
हर दिशा में खुशियाँ मचल
घर-आँगन में हर्ष अपार
नौळ-धार गुनगुनान लागे
हाव दगड़ बग री रंगों क सुर
फिजाँ में घुल्यो मीठ गान
खेतन में छै सरसों को भुड़
पीळ रंग ल्यावै मुस्कान
घसियारी गीत गुनगुनान
बचपन फिर लौटि आयो
यादन में बसी हर क्षण
हर पीळ रुमाव दगड़ बधी छ प्यार
जौं सग्यान पर्व अपार
वीणावादिनी मय्या सरस्वती
ज्ञान-बुद्धि को दीप जलाय
अज्ञान अंधेर हटाय द्ये
सत्य-विवेक को मार्ग दिखाय
कागज-कलम, वीणा-वादन
विद्या को साज सजे
सबों मन मे श्रद्धा भरे
आपूण संस्कृति को त्यार दगड़
रीति-रिवाजन को मान
जो सिखायो पुरखों ने हमूकें
उई छ जीवन को ज्ञान
न मोबाइल, न दिखावा
न बनावटी संसार
साद जीवन, ऊँचो विचार
यै छ पर्व क सार
यै छ संस्कृति, यै छ पहचान
यै छ पहाड़न को आधार
जौं सग्याणि ल्या संदेश
प्रकृति संग जीणो सीख
माटी, पानी, जंगल बचाया
यै छ भविष्य क नींव
आओ मिलिकै यो पर्व मनाया
सबूं के जीवन में उजियालो ल्यावै
जौं सग्यान त्यार।
वसंत पंचमी / जौं सग्यान की
हार्दिक शुभकामनाएँ 🙏
देव सती

जौं सग्यानि

जौं सग्यान – प्रकृति, संस्कृति और जीवन क त्यार
जौं सग्यान, प्रकृति क त्यार
ठंडा हाव में गर्मी क एहसास
धूप नरम मन में जगे नई आस
जौं सग्यान ल्या उल्लास
रितू बदल बदल संसार
फुल खिले, बुरांश हँसे
हर डाल पर जीवन अपार
खेतन में लहलहाणि नई फसल
माटी बोलै, बीज हँसै
मेहनत को फल आयो आज
हर दिशा में खुशियाँ मचल
घर-आँगन में हर्ष अपार
नौळ-धार गुनगुनान लागे
हाव दगड़ बग री रंगों क सुर
फिजाँ में घुल्यो मीठ गान
खेतन में छै सरसों को भुड़
पीळ रंग ल्यावै मुस्कान
घसियारी गीत गुनगुनान
बचपन फिर लौटि आयो
यादन में बसी हर क्षण
हर पीळ रुमाव दगड़ बधी छ प्यार
जौं सग्यान पर्व अपार
वीणावादिनी मय्या सरस्वती
ज्ञान-बुद्धि को दीप जलाय
अज्ञान अंधेर हटाय द्ये
सत्य-विवेक को मार्ग दिखाय
कागज-कलम, वीणा-वादन
विद्या को साज सजे
सबों मन मे श्रद्धा भरे
आपूण संस्कृति को त्यार दगड़
रीति-रिवाजन को मान
जो सिखायो पुरखों ने हमूकें
उई छ जीवन को ज्ञान
न मोबाइल, न दिखावा
न बनावटी संसार
साद जीवन, ऊँचो विचार
यै छ पर्व क सार
यै छ संस्कृति, यै छ पहचान
यै छ पहाड़न को आधार
जौं सग्याणि ल्या संदेश
प्रकृति संग जीणो सीख
माटी, पानी, जंगल बचाया
यै छ भविष्य क नींव
आओ मिलिकै यो पर्व मनाया
सबूं के जीवन में उजियालो ल्यावै
जौं सग्यान त्यार।
वसंत पंचमी / जौं सग्यान की
हार्दिक शुभकामनाएँ 🙏
देव सती

शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

उत्रैणी

°°°°°°°°घुघुतिया त्यार°°°°°°
( कुमाऊँ की स्मृतियों और पलायन के बीच एक लोक कविता)

नान छनां, मैं सोचछीं—
य चार-चार-चार (४४४)
किलै बनूं री?
कौ किताब मैं लेख रो?
कौ मास्टर, कौ पंडित
ज्यूल पढ़ै रो?
यैक क्यें हिसाब लगूं रो?
और यैक नाम घुघुत
किलैं कू रो?
ना पाँख, ना पूँठ,
ना मुनव, ना खुट,
ना हिटणी, ना उड़ाणी,
ना फरफड़ाणी—
फिर ले यैहू
घुघुत किलैं कू रो?
यू त गुड़ क पाक मैं
घ्यूँ-पिसू मिलै बैर,
हाथूं क साँच मैं
ढलैं बैर—
मीठो, सादा,
खास-खास
बनूं रो।
नान छनां जब हम
माघा क दिन गिनछीं,
त्यारों क इंतजार करछीं—
उ दिवाई ना होई,
धुधुती त्यार हूछी।
ईज रत्ति-फजल उठी,
चूल्हौ फूँकि,
घ्यूँ चढ़ी,
पिसू सानी,
हम भैं-बैणी
आस-पास भै रोछीं—
“ईज, घुघुत बणै बैर?”
पैली घुघुत
काव है धरैछी,
लम्ब-लम्ब धुधुती माव
हमूंहू गठें दीछी।
घुघुत धागूं मैं बांधि,
खिड़की-छज्जा
सजी जांछी।
फिर दूहर दिन
कौवां कै बूलोछी—
“काले कव्वा,
काले घुघुती,
माला खाले कूछी!”
पर आज…
हमर गों मैं
खिड़की बंद छ,
छज्जा सूना छ।
ना धागूं मैं
घुघुत लटकूं,
ना नानतिनों क
हंसी छ।
गों-गों पलायनैं
मार झैलें रौं।
क्वैं रोज़गार न्हैं,
क्वैं पढ़ाई न्हैं,
क्वैं स्वास्थ्य सुविधा न्हैं—
यई मजबूरी छ।
गों बटी निकल बैर
भाबरों मैं
भबरी जारो।
गों मैं आज
लम्ब-चौड़ बाखई न्हैती,
एक हाथ लम्ब
घुघुती क माव
अब कहानी बणी गै।
काले-काले,
कालें कैबैर—
आज बुलांणि वाल
उ आवाज
आज सुन्न छ?
आज ना काव बच री,
ना घुघुती माव,
ना उ रंगत,
ना उ स्वाद,
जो नानछनों क
संज्ञानों मैं हूछी।
आज त्यार छ—
पर फोटो मैं,
रील मैं,
स्टेटस मैं।
घुघुती हाथ मैं कम,
मोबाइल हाथ मैं ज्याद।
फिर भी…
माघा आयो छ,
उत्तरैणि आयी छ।
सूरज मकर राशि मैं
आज प्रवेश करूं छ।
नव उज्यालों,
नव शुरुआत—
पर पहाड़
आज ले भी
अपण बात कहूं छ।
माघा क मंगल हूनी,
पूषाक इतवार,
य बार उत्तरैणी कौतिक
जाया बागेश्वरै बजार!
ढोल-दमाऊँ,
झोड़ा-चांचरी
आज ले बाट देखनि।
क्वैं मनै ल्या भों,
क्वैं मनै ल्या आज—
पर अपूंण संस्कार,
अपूंण बोली,
अपूंण त्यार
ना छूटण दिया।
घुघुती भले
आज कम बणी,
पर यादूं मैं
आज भी मीठी छ।
✍️ देव सती
(पहाड़ी बटोही)

बुधवार, 14 जनवरी 2026

उत्तरैणी त्यार

उत्तर में खिचड़ी, पुण्य स्नान।
उत्तराखंड उत्तरायणी, घुघुतों क शान।
पंजाब में लोहड़ी, आग क मान।
हरियाणा माघी, पावन स्नान।
राजस्थान पतंग, नील आसमान।
गुजरात उत्तरायण, “काई पो” जान।
महाराष्ट्र तिलगुल, मीठी बात।
मध्य प्रदेश दान, पुण्य साथ।
आंध्र संक्रांति, फसल मुस्कान।
तेलंगाना रंगोली, घर पहचान।
तमिलनाडु पोंगल, सूर्य सम्मान।
केरल मकरविलक्कु, भक्ति जान।
असम माघ बिहू, भोज महान।
ओडिशा मकर चौला, अन्न दान।
बंगाल पौष संक्रांति, गंगासागर स्नान।

हम त्यौहार बचा रहे हैं या बस उसकी तस्वीरें?
संस्कार बाँट रहे हैं या सिर्फ़ पोस्ट कर रहे हैं? घुगुतिया त्यार की शुभकामनाएँ
🌿 परंपरा निभाएँ, दिखावा नहीं
देव सती(पहाड़ी बटोही)

कौआ की नई मॉग

कोवा की नई माँग
नहीं आऊँगा, लाख बुला लो,
मैं ना खाऊँगा, तुम ही खा लो।
मेरे लिए सूखे घुगुतें
अपना मोमो खाते हो,
मेरे लिए दाड़िम, डमरू,
अपना पिज़्ज़ा मंगवाते हो।
मेरी माला में भी जब
चाउमीन लिपटाओगे,
तब सोचूँगा आने की
जब बर्गर भी लटकाओगे।
वरना तेरे चिल्लाने से
क्यों आऊँ मैं? बँधा नहीं,
कान खोल के सुन ले तू,
कोवा हूँ मैं, गधा नहीं।

अब कोवा भी समझदार हो गया,
समय के साथ बदल गया,
डमरु, दाड़िम,घुगुतें  की माला
अब कहानी बन गया।
पहले छज्जे-छज्जे घूमते थे 
काले कंठ में बोलते थे,
आज शहर की छतों पर
प्लास्टिक, धुआँ, शोर भरा।
कहता है—
“मेरे हिस्से का संस्कार
तुमने खुद ही खा डाला,
मेरे नाम का त्यौहार
तस्वीरों में सजा डाला।
मेरे लिए सूखा टुकड़ा,
अपने लिए थाली भर,
मेरे गीत बस ‘काँव-काँव’,
अपने लिए DJ का स्वर।
मैं त्यौहार का बहाना था,
तुम अपनों से मिलने का,
आज मुझे ही भूल गए
शौक़ मोबाइल में रहने का।
अगर बुलाना है तो ऐसे बुलाओ,
जैसे पहले बुलाते थे,
थोड़ा मन, थोड़ा अपनापन
छज्जों पर लटकाते थे।
वरना मत बुलाओ अब,
मैं भी आत्मसम्मान रखता हूँ,
कोवा हूँ, मजबूर नहीं,
समय की भाषा समझता हूँ।”
और पहाड़ चुपचाप खड़ा है,
सब कुछ देख-सुन रहा,
कोवे की इस नई माँग में
अपना ही सच चुन रहा।

यह कविता सवाल पूछती है
हम त्यौहार बचा रहे हैं या बस उसकी तस्वीरें?
संस्कार बाँट रहे हैं या सिर्फ़ पोस्ट कर रहे हैं? घुगुतिया त्यार की शुभकामनाएँ
परंपरा निभाएँ, दिखावा नहीं
देव सती (पहाड़ी बटोही)

शनिवार, 10 जनवरी 2026

मनुष्य के 100कर्म

काशी में मणिकर्णिका घाट पर चिता जब शांत हो जाती है तब मुखाग्नि देने वाला व्यक्ति चिता भस्म पर 94 लिखता है।
यह सभी को नहीं मालूम है। खांटी बनारसी लोग या अगल बगल के लोग ही इस परम्परा को जानते हैं। बाहर से आये शवदाहक जन इस बात को नहीं जानते।

जीवन के शतपथ होते हैं। 100 शुभ कर्मों को करने वाला व्यक्ति मरने के बाद उसी के आधार पर अगला जीवन शुभ या अशुभ प्राप्त करता है। 94 कर्म मनुष्य के अधीन हैं। वह इन्हें करने में समर्थ है पर 6 कर्म का परिणाम ब्रह्मा जी के अधीन होता है।हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश- अपयश ये 6 कर्म विधि के नियंत्रण में होते हैं। 

अतः आज चिता के साथ ही तुम्हारे 94 कर्म भस्म हो गये। आगे के 6 कर्म अब तुम्हारे लिए नया जीवन सृजित करेंगे।
अतः 100 - 6 = 94 लिखा जाता है।

गीता में भी प्रतिपादित है कि मृत्यु के बाद मन अपने साथ 5 ज्ञानेन्द्रियों को लेकर जाता है। यह संख्या 6 होती है। मन और पांच ज्ञान इन्द्रियाँ।
अगला जन्म किस देश में कहाँ और किन लोगों के बीच होगा यह प्रकृति के अतिरिक्त किसी को ज्ञात नहीं होता है। अतः 94 कर्म भस्म हुए 6 साथ जा रहे हैं।
विदा यात्री। तुम्हारे 6 कर्म तुम्हारे साथ हैं।

आपके लिए इन 100 शुभ कर्मों का विस्तृत विवरण दिया जा रहा है जो जीवन को धर्म और सत्कर्म की ओर ले जाते हैं एवं यह सूची आपके जीवन को सत्कर्म करने की प्रेरणा देगी......

  100 शुभ कर्मों की गणना धर्म और नैतिकता के कर्म-
1.सत्य बोलना
2.अहिंसा का पालन
3.चोरी न करना
4.लोभ से बचना
5.क्रोध पर नियंत्रण
6.क्षमा करना
7.दया भाव रखना
8.दूसरों की सहायता करना
9.दान देना (अन्न, वस्त्र, धन)
10.गुरु की सेवा
11.माता-पिता का सम्मान
12.अतिथि सत्कार
13.धर्मग्रंथों का अध्ययन
14.वेदों और शास्त्रों का पाठ
15.तीर्थ यात्रा करना
16.यज्ञ और हवन करना
17.मंदिर में पूजा-अर्चना
18.पवित्र नदियों में स्नान
19.संयम और ब्रह्मचर्य का पालन 
20.नियमित ध्यान और योग सामाजिक और पारिवारिक कर्म                                      
21.परिवार का पालन-पोषण
22.बच्चों को अच्छी शिक्षा देना
23.गरीबों को भोजन देना
24.रोगियों की सेवा
25.अनाथों की सहायता
26.वृद्धों का सम्मान
27.समाज में शांति स्थापना
28.झूठे वाद-विवाद से बचना
29.दूसरों की निंदा न करना
30.सत्य और न्याय का समर्थन
31.परोपकार करना
32.सामाजिक कार्यों में भाग लेना
33.पर्यावरण की रक्षा
34.वृक्षारोपण करना
35.जल संरक्षण
36.पशु-पक्षियों की रक्षा
37.सामाजिक एकता को बढ़ावा देना
38.दूसरों को प्रेरित करना
39.समाज में कमजोर वर्गों का उत्थान
40.धर्म के प्रचार में सहयोग आध्यात्मिक और व्यक्तिगत कर्म                                           
41.नियमित जप करना
42.भगवान का स्मरण
43.प्राणायाम करना
44.आत्मचिंतन
45.मन की शुद्धि
46.इंद्रियों पर नियंत्रण
47.लालच से मुक्ति
48.मोह-माया से दूरी
49.सादा जीवन जीना
50.स्वाध्याय (आत्म-अध्ययन)
51.संतों का सान्निध्य
52.सत्संग में भाग लेना
53.भक्ति में लीन होना
54.कर्मफल भगवान को समर्पित करना
55.तृष्णा का त्याग
56.ईर्ष्या से बचना
57.शांति का प्रसार
58.आत्मविश्वास बनाए रखना
59.दूसरों के प्रति उदारता
60.सकारात्मक सोच रखना सेवा और दान के कर्म
61.भूखों को भोजन देना
62.नग्न को वस्त्र देना
63.बेघर को आश्रय देना
64.शिक्षा के लिए दान
65.चिकित्सा के लिए सहायता
66.धार्मिक स्थानों का निर्माण
67.गौ सेवा
68.पशुओं को चारा देना
69.जलाशयों की सफाई
70.रास्तों का निर्माण
71.यात्री निवास बनवाना
72.स्कूलों को सहायता
73.पुस्तकालय स्थापना
74.धार्मिक उत्सवों में सहयोग
75.गरीबों के लिए निःशुल्क भोजन
76.वस्त्र दान
77.औषधि दान
78.विद्या दान
79.कन्या दान
80.भूमि दान, नैतिक और मानवीय कर्म                                          
81.विश्वासघात न करना
82.वचन का पालन
83.कर्तव्यनिष्ठा
84.समय की प्रतिबद्धता 
85.धैर्य रखना
86.दूसरों की भावनाओं का सम्मान
87.सत्य के लिए संघर्ष
88.अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना
89.दुखियों के आँसू पोंछना
90.बच्चों को नैतिक शिक्षा
91.प्रकृति के प्रति कृतज्ञता
92.दूसरों को प्रोत्साहन
93.मन, वचन, कर्म से शुद्धता
94.जीवन में संतुलन बनाए रखना

 विधि के अधीन 6 कर्म                                         
95.हानि jn
96.लाभ श्री
97.जीवन
98.मरण
99.यश
100.अपयश

🙏🙏

गुरुवार, 8 जनवरी 2026

इंसाफ हल्का झंडा भारी


अंकिता की लाश पर खड़े हो
तुम झंडे ऊँचे कर रहे हो,
शर्म अगर ज़िंदा होती
तो ये रंग खुद झुक रहे होते।
न्याय माँगने आए हो या
भीड़ में अपना नाम चमकाने?
CBI की पुकार से ज़्यादा
तुम्हें पोस्टर हैं छपवाने।
जिस बेटी की साँस छीनी गई,
उसका कोई दल नहीं था,
वो वोट नहीं थी, वो नारा नहीं,
बस एक ज़िंदा इंसान थी—
या शायद अब वो भी कम था?
अगर आंदोलन सच्चा है,
तो झंडे घर छोड़ आओ,
अंकिता के नाम पर
अपनी राजनीति मत सजाओ।
क्योंकि याद रखना—
इतिहास सवाल करेगा,
तुम न्याय के साथ थे
या झंडे के पीछे छिपे थे।
देव सती( पहाड़ी बटोही)

शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

ब्याक पोस्टमार्टम

गौं में रुणी वाल च्यल और ब्याक फॉर्म
— देव सती (पहाड़ी बटोही)
गौंक च्यल लैन में ठाढ़ है र
हाथ में कुनई, दिल में भरोस ल्ये र।
च्यैलि वाल पूछनि:
“नौकरी कै करु?”
बस यई रिश्त मर र।
च्यल कू:
“गौं में खेती करनू, ईज बाज्यूक सहार छू।”
च्यैलि वाल कूनी:
“अरे! य त सब टैम पास छ।
तिपर सब डिग्री छ, पर पैकेज न्हैती।
संस्कार छ, पर सैलरी न्हैती।
ईमानदारी भारी पड़ गै च्यला,
क्यैलैकि त्यर बैंक में डबल न्हैति।
शहर में हमर च्यल लै ओपिसु में चहा पैऊ,
उ लै ‘सेटल’ छ।
च्येलि न्हैति दोषी इमें पूर,
उकैं सिखाई गै मजबूरी।
‘खेती-पाति, घरबार बाद देखियल,
पैली बैंक बैलेंस ज़रूरी।’”
गौं क च्यल फिर पू छू:
“क्यै मैं इंसान न्हैति?”
जवाब उ:
“छै, त सई नै, पर हमर च्यैलिक लेक न्हैते।”
च्यैलि क घर जाओ तो दै ख हमूल।
च्येलि क ददा ले भै रोछी:
“पूछो, उन्हू तुम क्य़ै करछा?”
बढ़ मुस्करातें हुए क आई त कै नी करन,
पै हमूंल क जवैं लिजी शर्त भारि।
बैणी क ब्योल चै सरकारी,
तुम खुद छा बेरोज़गारी में,
हमूहू कुरछा हम छू सरकारी नौकरी क तैयारी में।
ए घर, द्वी माप,
यई पहाड़ क कड़ू हिसाब।
कटु सत्य, मगर साफ़ बात,
रिश्त अब मेहनत ना हालात देखनि आज।
य एक खा लि कविता न्हैति,
रिश्तों क पोस्टमार्टम रिपोर्ट छ।
जा बेरोज़गारी अपराध छ,
और पहाड़ आपण गौ में रुण वी है बै ले ठूल अपराध।