कडाके की ठंड और पहाड़ का सच
पहाड़ों की ठंड कोई मौसम भर नहीं होती, यह अनुभव होती है—सीधे हड्डियों में उतरने वाली। जब मैदानों में “हल्की ठंड” की खबरें चलती हैं, तब पहाड़ों में नल पानी छोड़ने से पहले दो बार सोचता है। कुछ दिनों से मौसम ठंड-ठंड हो गया है और एक-आध हफ्ते से तुस्यार पड़नी शुरू हो गई है। अब तो हाल यह है कि अच्यालू पड़ी बड़ी कडाके की ठंड है।
सुबह-सुबह उठकर बाहर निकलना किसी साहसिक अभियान से कम नहीं। हवा का फरफराट ऐसा लगता है जैसे वह पुराने हिसाब चुकाने आई हो। चलने में आदमी नहीं, पहले दाँत काँपते हैं। बिछुणा छोड़ने का मन नहीं करता, और अगर मजबूरी में उठ भी जाएँ तो शरीर पूछता है—“इतनी जल्दी किस बात की?”
ठंड का असली इम्तिहान तब होता है जब हाथ में ठंडा पानी लग जाए। उस एक पल में पूरी तबियत झण्ड हो जाती है। डॉक्टर गरम पानी पीने की सलाह देते हैं, लेकिन पहाड़ का नल बड़ी शांति से कह देता है—“बसंत में मिलते हैं।” तब समझ आता है कि पहाड़ों में स्वास्थ्य केवल दवाइयों से नहीं, धैर्य से चलता है।
इन दिनों पकौड़ी और समोसा सिर्फ़ खाने की चीज़ नहीं रहे, वे ठंड से लड़ने के औज़ार बन गए हैं। लसणेकि चटडि साथ में हो तो लगता है—स्वर्ग हो या नर्क, फिलहाल यही सही जगह है। रसोईघर पहाड़ का अस्थायी हीटर बन जाता है, जहाँ आग और स्वाद दोनों से राहत मिलती है।
टोपी और मफलर अब फैशन नहीं, पहचान हैं। जो ढंग से पहन ले, वही अनुभवी पहाड़ी माना जाता है। बनैन और जैकिट की अहमियत इन दिनों किसी डिग्री से कम नहीं। ठंड में काम वही आता है जो सच में गरम रखे, बाकी सब दिखावा है।
दो महीने की यह ठंड कई बार अनंत लगने लगती है। लेकिन पहाड़ी मन फिर भी धीरज धरता है। हर सुबह यही भरोसा रहता है कि बसंत जरूर आएगा, चाहे थोड़ा देर से ही सही। यही धैर्य पहाड़ को ज़िंदा रखता है।
कडाके की ठंड का धन्यवाद इसलिए भी जरूरी है कि यह हमें हमारी जड़ों की याद दिलाती है—सादा जीवन, मजबूत हौसला और कठिन हालात में भी मुस्कराने की आदत। पहाड़ों में ठंड सिर्फ़ मौसम नहीं, एक शिक्षक है, जो हर साल हमें सहनशील होना सिखा जाती है।
— देव सती
(पहाड़ी बटोही)