शनिवार, 24 जनवरी 2026

कडा़कें कि ठण्ड

कडाके की ठंड और पहाड़ का सच
पहाड़ों की ठंड कोई मौसम भर नहीं होती, यह अनुभव होती है—सीधे हड्डियों में उतरने वाली। जब मैदानों में “हल्की ठंड” की खबरें चलती हैं, तब पहाड़ों में नल पानी छोड़ने से पहले दो बार सोचता है। कुछ दिनों से मौसम ठंड-ठंड हो गया है और एक-आध हफ्ते से तुस्यार पड़नी शुरू हो गई है। अब तो हाल यह है कि अच्यालू पड़ी बड़ी कडाके की ठंड है।
सुबह-सुबह उठकर बाहर निकलना किसी साहसिक अभियान से कम नहीं। हवा का फरफराट ऐसा लगता है जैसे वह पुराने हिसाब चुकाने आई हो। चलने में आदमी नहीं, पहले दाँत काँपते हैं। बिछुणा छोड़ने का मन नहीं करता, और अगर मजबूरी में उठ भी जाएँ तो शरीर पूछता है—“इतनी जल्दी किस बात की?”
ठंड का असली इम्तिहान तब होता है जब हाथ में ठंडा पानी लग जाए। उस एक पल में पूरी तबियत झण्ड हो जाती है। डॉक्टर गरम पानी पीने की सलाह देते हैं, लेकिन पहाड़ का नल बड़ी शांति से कह देता है—“बसंत में मिलते हैं।” तब समझ आता है कि पहाड़ों में स्वास्थ्य केवल दवाइयों से नहीं, धैर्य से चलता है।
इन दिनों पकौड़ी और समोसा सिर्फ़ खाने की चीज़ नहीं रहे, वे ठंड से लड़ने के औज़ार बन गए हैं। लसणेकि चटडि साथ में हो तो लगता है—स्वर्ग हो या नर्क, फिलहाल यही सही जगह है। रसोईघर पहाड़ का अस्थायी हीटर बन जाता है, जहाँ आग और स्वाद दोनों से राहत मिलती है।
टोपी और मफलर अब फैशन नहीं, पहचान हैं। जो ढंग से पहन ले, वही अनुभवी पहाड़ी माना जाता है। बनैन और जैकिट की अहमियत इन दिनों किसी डिग्री से कम नहीं। ठंड में काम वही आता है जो सच में गरम रखे, बाकी सब दिखावा है।
दो महीने की यह ठंड कई बार अनंत लगने लगती है। लेकिन पहाड़ी मन फिर भी धीरज धरता है। हर सुबह यही भरोसा रहता है कि बसंत जरूर आएगा, चाहे थोड़ा देर से ही सही। यही धैर्य पहाड़ को ज़िंदा रखता है।
कडाके की ठंड का धन्यवाद इसलिए भी जरूरी है कि यह हमें हमारी जड़ों की याद दिलाती है—सादा जीवन, मजबूत हौसला और कठिन हालात में भी मुस्कराने की आदत। पहाड़ों में ठंड सिर्फ़ मौसम नहीं, एक शिक्षक है, जो हर साल हमें सहनशील होना सिखा जाती है।
— देव सती
(पहाड़ी बटोही)

गुरुवार, 22 जनवरी 2026

बसंत पंचमी

खेत सब बंजर हैं,
जौ अब खेतों में नहीं,
त्योहार निभाने को
गमलों में बोए जाते हैं।
बचपन का वह पीला रुमाल
आज भी आस लगाए बैठा है—
कि बच्चे पहनकर
खुलकर हँसें, दौड़ें, गाएँ।
पर अब त्योहार
बच्चों में नहीं,
मोबाइल की स्क्रीन में
जिंदा हैं।
उत्तराखण्ड से लोग गए,
खेत बेच दिए गए,
जो बचे
उन्हें जंगली जानवरों ने उजाड़ दिया—
फिर भी हम तसल्ली से कहते हैं,
“संस्कृति ज़िंदा है।”
हाँ, ज़िंदा है—
रिल्स में, पोस्ट में,
सरकारी कार्यक्रम में।
पीला रुमाल दीवार पर टंगा है,
और बसंत
चार इमोजी में निपट जाता है।
बसंत पंचमी से बैठकी होली तक
गीत गूँजते हैं,
पर आँगन खाली हैं।
ढोल बजता है,
पर गाँव चुप है।
जिस दिन
त्योहार फिर बच्चों के हाथ में होंगे,
खेत फिर बीज माँगेंगे—
उस दिन मानेंगे
संस्कृति सच में
जिंदा है।
देव सती पहाड़ी बटोही

उत्तरैणी त्यार

उत्तर में खिचड़ी, पुण्य स्नान।
उत्तराखंड उत्तरायणी, घुघुतों क शान।
पंजाब में लोहड़ी, आग क मान।
हरियाणा माघी, पावन स्नान।
राजस्थान पतंग, नील आसमान।
गुजरात उत्तरायण, “काई पो” जान।
महाराष्ट्र तिलगुल, मीठी बात।
मध्य प्रदेश दान, पुण्य साथ।
आंध्र संक्रांति, फसल मुस्कान।
तेलंगाना रंगोली, घर पहचान।
तमिलनाडु पोंगल, सूर्य सम्मान।
केरल मकरविलक्कु, भक्ति जान।
असम माघ बिहू, भोज महान।
ओडिशा मकर चौला, अन्न दान।
बंगाल पौष संक्रांति, गंगासागर स्नान।

हम त्यौहार बचा रहे हैं या बस उसकी तस्वीरें?
संस्कार बाँट रहे हैं या सिर्फ़ पोस्ट कर रहे हैं? घुगुतिया त्यार की शुभकामनाएँ
🌿 परंपरा निभाएँ, दिखावा नहीं
देव सती(पहाड़ी बटोही)

जौं सग्यानि

जौं सग्यान – प्रकृति, संस्कृति और जीवन क त्यार
जौं सग्यान, प्रकृति क त्यार
ठंडा हाव में गर्मी क एहसास
धूप नरम मन में जगे नई आस
जौं सग्यान ल्या उल्लास
रितू बदल बदल संसार
फुल खिले, बुरांश हँसे
हर डाल पर जीवन अपार
खेतन में लहलहाणि नई फसल
माटी बोलै, बीज हँसै
मेहनत को फल आयो आज
हर दिशा में खुशियाँ मचल
घर-आँगन में हर्ष अपार
नौळ-धार गुनगुनान लागे
हाव दगड़ बग री रंगों क सुर
फिजाँ में घुल्यो मीठ गान
खेतन में छै सरसों को भुड़
पीळ रंग ल्यावै मुस्कान
घसियारी गीत गुनगुनान
बचपन फिर लौटि आयो
यादन में बसी हर क्षण
हर पीळ रुमाव दगड़ बधी छ प्यार
जौं सग्यान पर्व अपार
वीणावादिनी मय्या सरस्वती
ज्ञान-बुद्धि को दीप जलाय
अज्ञान अंधेर हटाय द्ये
सत्य-विवेक को मार्ग दिखाय
कागज-कलम, वीणा-वादन
विद्या को साज सजे
सबों मन मे श्रद्धा भरे
आपूण संस्कृति को त्यार दगड़
रीति-रिवाजन को मान
जो सिखायो पुरखों ने हमूकें
उई छ जीवन को ज्ञान
न मोबाइल, न दिखावा
न बनावटी संसार
साद जीवन, ऊँचो विचार
यै छ पर्व क सार
यै छ संस्कृति, यै छ पहचान
यै छ पहाड़न को आधार
जौं सग्याणि ल्या संदेश
प्रकृति संग जीणो सीख
माटी, पानी, जंगल बचाया
यै छ भविष्य क नींव
आओ मिलिकै यो पर्व मनाया
सबूं के जीवन में उजियालो ल्यावै
जौं सग्यान त्यार।
वसंत पंचमी / जौं सग्यान की
हार्दिक शुभकामनाएँ 🙏
देव सती

जौं सग्यानि

जौं सग्यान – प्रकृति, संस्कृति और जीवन क त्यार
जौं सग्यान, प्रकृति क त्यार
ठंडा हाव में गर्मी क एहसास
धूप नरम मन में जगे नई आस
जौं सग्यान ल्या उल्लास
रितू बदल बदल संसार
फुल खिले, बुरांश हँसे
हर डाल पर जीवन अपार
खेतन में लहलहाणि नई फसल
माटी बोलै, बीज हँसै
मेहनत को फल आयो आज
हर दिशा में खुशियाँ मचल
घर-आँगन में हर्ष अपार
नौळ-धार गुनगुनान लागे
हाव दगड़ बग री रंगों क सुर
फिजाँ में घुल्यो मीठ गान
खेतन में छै सरसों को भुड़
पीळ रंग ल्यावै मुस्कान
घसियारी गीत गुनगुनान
बचपन फिर लौटि आयो
यादन में बसी हर क्षण
हर पीळ रुमाव दगड़ बधी छ प्यार
जौं सग्यान पर्व अपार
वीणावादिनी मय्या सरस्वती
ज्ञान-बुद्धि को दीप जलाय
अज्ञान अंधेर हटाय द्ये
सत्य-विवेक को मार्ग दिखाय
कागज-कलम, वीणा-वादन
विद्या को साज सजे
सबों मन मे श्रद्धा भरे
आपूण संस्कृति को त्यार दगड़
रीति-रिवाजन को मान
जो सिखायो पुरखों ने हमूकें
उई छ जीवन को ज्ञान
न मोबाइल, न दिखावा
न बनावटी संसार
साद जीवन, ऊँचो विचार
यै छ पर्व क सार
यै छ संस्कृति, यै छ पहचान
यै छ पहाड़न को आधार
जौं सग्याणि ल्या संदेश
प्रकृति संग जीणो सीख
माटी, पानी, जंगल बचाया
यै छ भविष्य क नींव
आओ मिलिकै यो पर्व मनाया
सबूं के जीवन में उजियालो ल्यावै
जौं सग्यान त्यार।
वसंत पंचमी / जौं सग्यान की
हार्दिक शुभकामनाएँ 🙏
देव सती

शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

उत्रैणी

°°°°°°°°घुघुतिया त्यार°°°°°°
( कुमाऊँ की स्मृतियों और पलायन के बीच एक लोक कविता)

नान छनां, मैं सोचछीं—
य चार-चार-चार (४४४)
किलै बनूं री?
कौ किताब मैं लेख रो?
कौ मास्टर, कौ पंडित
ज्यूल पढ़ै रो?
यैक क्यें हिसाब लगूं रो?
और यैक नाम घुघुत
किलैं कू रो?
ना पाँख, ना पूँठ,
ना मुनव, ना खुट,
ना हिटणी, ना उड़ाणी,
ना फरफड़ाणी—
फिर ले यैहू
घुघुत किलैं कू रो?
यू त गुड़ क पाक मैं
घ्यूँ-पिसू मिलै बैर,
हाथूं क साँच मैं
ढलैं बैर—
मीठो, सादा,
खास-खास
बनूं रो।
नान छनां जब हम
माघा क दिन गिनछीं,
त्यारों क इंतजार करछीं—
उ दिवाई ना होई,
धुधुती त्यार हूछी।
ईज रत्ति-फजल उठी,
चूल्हौ फूँकि,
घ्यूँ चढ़ी,
पिसू सानी,
हम भैं-बैणी
आस-पास भै रोछीं—
“ईज, घुघुत बणै बैर?”
पैली घुघुत
काव है धरैछी,
लम्ब-लम्ब धुधुती माव
हमूंहू गठें दीछी।
घुघुत धागूं मैं बांधि,
खिड़की-छज्जा
सजी जांछी।
फिर दूहर दिन
कौवां कै बूलोछी—
“काले कव्वा,
काले घुघुती,
माला खाले कूछी!”
पर आज…
हमर गों मैं
खिड़की बंद छ,
छज्जा सूना छ।
ना धागूं मैं
घुघुत लटकूं,
ना नानतिनों क
हंसी छ।
गों-गों पलायनैं
मार झैलें रौं।
क्वैं रोज़गार न्हैं,
क्वैं पढ़ाई न्हैं,
क्वैं स्वास्थ्य सुविधा न्हैं—
यई मजबूरी छ।
गों बटी निकल बैर
भाबरों मैं
भबरी जारो।
गों मैं आज
लम्ब-चौड़ बाखई न्हैती,
एक हाथ लम्ब
घुघुती क माव
अब कहानी बणी गै।
काले-काले,
कालें कैबैर—
आज बुलांणि वाल
उ आवाज
आज सुन्न छ?
आज ना काव बच री,
ना घुघुती माव,
ना उ रंगत,
ना उ स्वाद,
जो नानछनों क
संज्ञानों मैं हूछी।
आज त्यार छ—
पर फोटो मैं,
रील मैं,
स्टेटस मैं।
घुघुती हाथ मैं कम,
मोबाइल हाथ मैं ज्याद।
फिर भी…
माघा आयो छ,
उत्तरैणि आयी छ।
सूरज मकर राशि मैं
आज प्रवेश करूं छ।
नव उज्यालों,
नव शुरुआत—
पर पहाड़
आज ले भी
अपण बात कहूं छ।
माघा क मंगल हूनी,
पूषाक इतवार,
य बार उत्तरैणी कौतिक
जाया बागेश्वरै बजार!
ढोल-दमाऊँ,
झोड़ा-चांचरी
आज ले बाट देखनि।
क्वैं मनै ल्या भों,
क्वैं मनै ल्या आज—
पर अपूंण संस्कार,
अपूंण बोली,
अपूंण त्यार
ना छूटण दिया।
घुघुती भले
आज कम बणी,
पर यादूं मैं
आज भी मीठी छ।
✍️ देव सती
(पहाड़ी बटोही)

बुधवार, 14 जनवरी 2026

उत्तरैणी त्यार

उत्तर में खिचड़ी, पुण्य स्नान।
उत्तराखंड उत्तरायणी, घुघुतों क शान।
पंजाब में लोहड़ी, आग क मान।
हरियाणा माघी, पावन स्नान।
राजस्थान पतंग, नील आसमान।
गुजरात उत्तरायण, “काई पो” जान।
महाराष्ट्र तिलगुल, मीठी बात।
मध्य प्रदेश दान, पुण्य साथ।
आंध्र संक्रांति, फसल मुस्कान।
तेलंगाना रंगोली, घर पहचान।
तमिलनाडु पोंगल, सूर्य सम्मान।
केरल मकरविलक्कु, भक्ति जान।
असम माघ बिहू, भोज महान।
ओडिशा मकर चौला, अन्न दान।
बंगाल पौष संक्रांति, गंगासागर स्नान।

हम त्यौहार बचा रहे हैं या बस उसकी तस्वीरें?
संस्कार बाँट रहे हैं या सिर्फ़ पोस्ट कर रहे हैं? घुगुतिया त्यार की शुभकामनाएँ
🌿 परंपरा निभाएँ, दिखावा नहीं
देव सती(पहाड़ी बटोही)