बुधवार, 26 नवंबर 2025

चार गॉव का वो पैदल रास्ता बंद है

आपके गाँवों ईनाण, चौना, गाड़ी और पाखुड़ा को शामिल करके कविता प्रस्तुत है-

चार गाँव का पैदल रास्ता अब बंद है 
(ईनाण — चौना — गाड़ी — पाखुड़ा)

ईनाण की धूप से चलकर
चौना का साया मिलता था
गाड़ी मे पहुँचकर वह शिव धारा मिलता था
पाखुड़ा की ओर चढते ही
मिलता अपनापन हर पल,
संग चलते थे पाँव हमारे
बिना शिकायत, बिना हलचल।

वो रास्ता था चार गाँवों में
रिश्तों का सेतु महान,
हर त्योहार, हर दुख-सुख में
उसी से चलता था मान-सम्मान।

अब सड़कें तो आ गई हैं
पर दिल कहीं तंग है,
तरक्की की इस भीड़ भरे में
वो पैदल रास्ता बंद है।

जहाँ बाँझ क्यारी में
खिलखिलाती थी बचपन की धूप,
और पगडंडी के मोड़ों पर
हँसी छोड़ जाते थे रूप।

बंद हुआ जो रास्ता
मिट्टी का संग छूट गया,
बचपन कहीं वहीं पड़ा है
जहाँ से सफर टूट गया।
देव सती (पहाड़ी बटोही)

गुरुवार, 20 नवंबर 2025

पहाड़ पन ब्या काज

पहाड़ पन ब्या-काज —  व्यंग्यपूर्ण 

पहाड़ पन ब्या-काज को जमाना बदली ग्यो,
अब ब्या कम — “इवेंट मैनेजमेंट” ज्यादा है गो!

एकै दिन में एक बटि जादे न्यौत आणी,
जैसे गौं मैराथन-रैली कूद रयी हो!
क्वे देखो  न देखो—
बस WhatsApp में कार्ड उछाल दीनि
और समझ ल्यो— “फर्ज निभी गो!”

पैली बटि ब्या-घर में
आमा-बुबू, काका-काकी— सब रसोई-चौंतरा मै रौनक अब
घर में सन्नाटा…
काम-काज सब ‘ठ्याक-कंपनी’ के,
और घरवाल—रात भर रील देखण में व्यस्त!

पैली बटि नानका-ठूलका ताऊ-बुबू— लकाड़ फाड़ण,
बुआ-काखी— दुकान बटि चाउ-पिसूं ल्याण,
काकी-भौजी उखो-मस्याल कूटण…
आब?
बस नैपालि बुलाय द्यै—
“काम तमाम”— एकै फोन में सेट!

पैली बटि घरौं-घर जै बै न्यौत दिछी—
मान, माया, बोल-बाणी… सब!
आब—
“इतु पैट ब्या छू—जे बखत आइजा ऐ जाया।”
जैसे ब्या को न्यौता न,
सरकारी नोटिस जारी हो!

बर्याती-बरेतिन कै हालत भी बदलि गई—
पैली बटि पींठा-ले बर्यात बिदाई टैम पर लगाई जाछी,
आब गेट पर बबाल टलाई
क्याऊ प्ंय्या पतैल वाल गेट पर लाल कपड़ वाल स्वागतम्
आब गेट पर टेंट-वाल लाल मैटिंग,
और स्वागत करण वाल डीजे—
जो बजाल— “दुल्हन हम ले जाएंगे!”
(पंडित-ज्यू भी सोचण— कौन ले जाणै, कब ले जाणै?)

लगन-पत्री पढ़ण को टाइम कनै छै—
सबू मान फोटोग्राफर-क!
उ त—
“सात फैरों में कै दीन?”
आठ फ्यार ले लगै द्यै— एंगल बढ़ो छू!

अंत मै—
ब्या काज कम,
दिखावा ज्यादा।
रिवाज कम,
रील ज्यादा।
और पहाड़—
बस पहाड़ रै गो…
ब्या-काज पूर कारोबार बनि गो!
देव सती (पहाड़ी बटोही)

मंगलवार, 18 नवंबर 2025

चाय सोशल मीडिया और पहाड़

🍃 चाय, सोशल मीडिया और पहाड़ 🍃

पहाड़ैं मे चहा  कम, स्टेटस ज्यादा बनौला,
कप ठंडो पड़ि जाला—
पर फोटो “Hot Tea Time”  लगौला।
चौंतरा खाली, पर ग्रुपचैट भरल,
रात-दिन “GMचललो,
उतरण न पड़े घर–बार मैं,
रील मैं ही पहाड़ पललो।

फेसबुक मैं सब–सबूक फिकर,
“देश–दुनिया” बचूण,
और घर मैं दगड़–धूप पड़ै—
पर लाइक-कमेंट मैं लगूण।

चाहा पियू कि न पियू—
फर्क न छ, बस फोटो आलो चाहिं,
कैप्शन लिखूं—
“Life in Mountains ☕✨ #Peace #Vibes #Nature”

चाय कि भाप उड़ी–उड़ी
सोशल मैं फैलि जाली,
हकीकत कि चुस्की सूखी—
पर वर्चुअल जिंदगी चलि जाली।

घाम कि किरन जागीं, चूला भट्टियूँ में आग,
पहाड़ कि गलियाँ बोलि उठीं — “बनौ चहा, ऐलाग!”
कितली में उबलूं पत्ती, जड़-बुटि को सुगंध,
पहाड़ैं क ठंड में चाहा— खुद में ही एक प्रबन्ध।

चौंतरों में बैठि- बैठि, चुस्की-चुस्की दिन कटि जाल,
चाय कि चम्मच जैं घूमें, मन मे घुमण-फिरण लागि जाल।

थकानक जाड़ा खाईं, ब्यथा-म्यथा सब भाग जाल,
चाहा कि दो घूँट पियू निनान ले जाग जाल।
! ☕देवसती (पहाड़ी बटोही)

हवन के पात्र

🌞: *पंडिताई का हवन-हथियार।*
*क्रम से:* 
*स्रुवा, प्रोक्षणी, प्रणीता, सलाका, स्रुची।*
[🌞: *यज्ञ-अनुष्ठानादि में हवनीय कार्य में प्रयोग  लाये जाने वाले पात्र की जानकारी भुदेवो के लिए।* 
*१. स्रुवा*:- ये एक विशेष लकड़ी की बनी हुई कलछी है। इसके सहारे हम हवनादि में घी की आहुति देते हैं। 

*२. प्रोक्षणी*:- इस पात्र के माध्यम से हवन कुण्ड को जलप्रसेचित करते हैं। सामान्य अर्थ में समझें तो इस पात्र में जल लेकर हवन वेदी के बाहर निर्देशित मन्त्रों से चारों दिशाओं में जल डालते हैं। जल प्रसेचित करते समय भावना यह रहती है कि अग्नि के चारों ओर शीतलता का घेरा बना रहे, जो हम सबके लिए शान्तिदायी हो। 
मन्त्र है:- 
पूर्व में प्रसेचन का: ॐ अदितेऽनुमन्यस्व॥
पश्चिम में प्रसेचन मन्त्र: ॐ अनुमतेऽनुमन्यस्व॥
उत्तर में प्रसेचन मन्त्र: - ॐ सरस्वत्यनुमन्यस्व॥
चारों दिशाओं में प्रसेचन का मन्त्र: ॐ देव सवित: प्रसुव यज्ञं, प्रसुव यज्ञपतिं भगाय। दिव्यो गन्धर्व: केतपू:, केतं न: पुनातु, वाचस्पति: वाचं न: स्वदतु॥
              
*३. प्रणीता*: इसमें जल भरकर रखा जाता है। इस प्रणीता पात्र के जल में घी की आहुति देने के उपरान्त बचे हुए घी को “इदं न मम” कहकर टपकाया जाता है। बाद में इस पात्र का घृतयुक्त होठों एवं मुख से लगाया है जिसे 'संसव प्राशन' कहते हैं।

*४. वज्र-यज्ञ में अशुद्ध शक्तियों से संरक्षण करने के लिये उपय मनुकश के बाद यजमान के वाम हस्त में धारण करने के लिये उपयोग में लाया जाता है।

*५. स्रुची*:  इसके माध्यम से यज्ञ अथवा हवन में मिष्ठान की पूर्णाहुति दी जाती है। मिष्ठान की इस आहुति को स्विष्टकृत होम कहते हैं। यह क्रिया यज्ञ अथवा हवन में न्यूनता को पूर्ण करने के लिए की जाती है।

सोमवार, 17 नवंबर 2025

१९९०/२०००

“नब्बे बनाम दू–हजारी – एक तगड़ो व्यंग्य”

✍️ देव सती (पहाड़ी बटोही)

नब्बे वाल बोलू —
“हमन भल जमाना देख,
चौमासें घस्यारी, सौणें रस्यार,
चूलन में धूँ फूक नैख।

स्लेट–पेन्सिल, कापी–पुस्तक,
स्कूल जाण–त्योहार
खेतन में खेल-खालि,
गुल्ली–डंडो हमार।”

दू–हजारी हँसू —
“हम रील बनौला दाज्यू,
तुम गुल्ली–डंडा में अट्क्या,
हमन लाइक–फॉलो मागा,
स्कूल बटि त बस स्टक्या!

ऑनलाइन क्लास में सोया
माइक म्यूट में गप्प मारी,
कैमरा ऑफ करि खोया मार्क्स झटकन पारी!”

नब्बे वाल चाहा पीनी,
चुल्हा–धुँए में छनकै,
दू–हजारी — “कप फोम वाला दो दाज्यू,
इंस्टा स्टोरी में जमकै!”

नब्बे बोले — “हमन काम में पक्क,
काटि दै खेत–खलां।”
दू–हजारी — “हम पबजी में पक्क,
चलूनू आंगू छलां!”

अँतिम में द्वी भिड़्या —
नब्बे बोली — “हम चलन पहाड़।”
दू–हजारी बोली — “हम चलौँ प्लेन्स,
औ ट्रेंड क रोडा़

साँच यो छ —
दोनो पीढ़ी महान, बस चाल अलग–अलग छ,
एक जमीन से जुड़ेलो,
एक वाई–फाई पर टॉगी छ!

शुक्रवार, 14 नवंबर 2025

कै लेखू

यह कविता पहले से ही बहुत गहरी है—दर्द भी है, सवाल भी, और पहाड़ की सच्चाई भी।

❖ मैं लेखूँ त क्ये लेखूँ — (कुमाऊँनी कविता)

क्ये लेखनूँ?
देवभूमि तूँ, मैं राक्षसौं क ताँडव लेखूँ—
नेताओँक खोखलो विकास लेखूँ—
कर्मचारियूकी ठगणी नीयत लेखूँ।

दगडियो, तुमै बताओ—
आब मैं को एंगल बटिक?

पहाड़ेकि कसि-कसि खूबसूरती लेखूँ?
मैं लेखूँ त क्ये लेखूँ?

बांज गौं मैं कुरी बुज लेखूँ?
टुटि-फूटी कुड़ी-बांज बाडि-ख्वाडि लेखूँ?
बिन नानौंक सुन्न स्कूल लेखूँ?
खाल्ली सड़केकि अलख पीड़ लेखूँ?
बिन डाक्टरों क सूनौ असपताव लेखूँ?

मैं लेखूँ त क्ये लेखूँ?

एकलै थड़ि बैठी,
आम-बुबुक कवीड़ कहाणी लेखूँ?
ब्वारि गोरबाछ्नेकि पीड़ लेखूँ?
बागौंक डुडाट—सुंअर-बानरनौक उज्याड़ लेखूँ?

दगडियो, आब तुमै बताओ—
मैं लेखूँ त क्ये लेखूँ?
देव सती (पहाड़ी बटोही)

शनिवार, 8 नवंबर 2025

उत्तराखंड राज्य स्थापना दिवस पर

एक बीसी पॉंच साल क उत्तराखंड देखों कस बीत गो
पच्चीस साल क उत्तराखंड कस आज है गो।
कुमाऊँनीं क मधुरता का गै
गढ़वाली क गहराई का गै
जौनसारी त हराई गो
फूलदेई घूगूती त्यार 
हरर्याव त्यार हरई गो
पहाडो़ं विकास आज काथा आज
न्हैं गो 
कुर्सी क दौड़ में कभैं  कमल तो कभैं हाथ जीत गो।
आवाद छी जो खेत बाडी़, उ सब बंजर पड़ गो
पुश्तैनी मकानों क बूनैदू कै पलायन  जर्जर कर गो।
पहाड़ों क रौनक गौ गौनों के सुनसान कर गो!
विकास पहाड़ों में आन है पैली, धरातल मे डर गो!
स्कूलों में लटकि ताव, अस्पतालों में सन्नाटा छ!
सड़कों को जाल बिछा पर, रोज़गार का कई ना अत्त -पत्त  छ!
गध्योरों  क कल-कल, फूलों क खुशबू, सब फीक कर गो!
जवानी क जोश के पहाड़ों बै, शहरों क ओर भबरै  गो!
देवभूमि क नाम तो छ, पर द् य्प्तों क वास का?
मंदिरों के कपाट खुली छ, पर उ भक्तों का विश्वास का?
शहादत क बल पर मिलों छि , हमूंके य धाम,
आज ले विकास क नाम पर, पहाड़ों के  मिलरो आराम!!
चलो फिर से संवारुल मिलकर, अपण   उत्तराखंड के
विकास की नई राह दिखूल , रोकूल  पलायन के
संघर्षों ल जो जन्मी रो
उ स्वाभिमान क शान छ
देवभूमि उत्तराखंड,
त्यर हर शहीदों पर अभिमान छ
हम उत्तराखंडवासी छू
संघर्ष हमैरी पहचान छ
संस्कृति हम री साँसों में,
शौर्य हम र मान छ
देवभूमि के हर अंश में,
बसू हिन्दुस्तान,
जय-जय उत्तराखंड हमरी —
जय भारत, जय देवभूमि महान!
@देव सती (पहाड़ी बटोही)