मंगलवार, 29 जुलाई 2025

शाबास म्यर मोतिया बल्दा

शाबास म्यर मोतिया बल्दा त्वीलें धारौ बोला
नौ रुपैं को मोतिया बल्दा सौ रुपैं को सींगा 
लोटि पडौ़ म्यर मोतिया बल्दा टोडि़ ल्यायों सींगा 

शाबास ़़़़़़़़़़
(बोई हाली मैथी बची रौलौ मोतिया बल्दा!
खूब करुंला खेती)
शाबास़़़़़़़़़़़
(धार में कि टूणी पहाड़ नें बसी गई बानर और गुणी )
शाबास़़़़़़़़़़़़
पहाडा़ का धार मजि मंदिरों का गेटा
इज बाबू कणि छोडि़  बेर च्याल ब्वारी देशा)
शाबास ़़़़़
(बूड़ बाणियों दाणा पहाड़ मे पलायनैं क मारा 
कुडि़ बाड़ी छूटी सारी छूटी सारी सारा )
शाबास ़़़़़़़़़़़
(कतू भली बोलि हमरी कतू भलि रीता
चांचरी और न्योलि छपेली कतू भला गीता )शाबास़़़़़़़़़़़
(किलै छोडो़ पहाड़ तुमूलें घर कूडी़  किला छोडी़ 
इज बाबुल बणाई हय हांटा भांटा टोडी़)
शाबास ़़़़़़़

शनिवार, 26 जुलाई 2025

कविता तुम बन जाओ किसी की

(( मित्र तुम और मधुकवि))
मधुर कृत कविता

कविता तुम बन जाओ किसी की||
बजह बनो तुम कहीं हँसी की||

क्यों तुम अहंकार में डूबे||
तुम्हें एक दिन कोई ना पूछे||
सुंदरता स्थिर ना रहती,
कभी कहीं यह भी तो रूठे||
अहंकार से हो कुरूप सब,अहंकार की वृत्ति न नीकी||
कविता तुम बन जाओ किसी की||

मित्र भाव होकर घुल जाओ||
आओ साथ हमारे आओ|
जीवन सुंदर हो जाता है,
जब तुम थोड़ा भी मुसकाओ||
मुख की कान्ति चमका उठती है,आ जाती रितु  प्रेम खुशी की||
कविता तुम बन जाओ किसी की||

करो प्रोत्साहित तुम मुझको||
मै अपना सा समझूँ तुम को||
हृदय धरा हो उठे अंकुरित,
ऐसा बीज बनादो खुदको||
करता हूँ नित यही निवेदन,स्वीकार कर प्रीति दुखी की||
कविता तुम बन जाओ किसी की||

जीवन का तुम हो उजियारा||
फिर भी जाने क्यों अँधियारा||
तुम ऊषा का नव सूरज हो,
मैने कितनी बार निहारा||
अलंकार रस छंद शब्द तुम,तुम बेरा हो प्रणय घड़ी की||
तुम कविता बन जाओ किसी की||

pahadi batohi

परिचय - बाट् में हिटणी कैं बटौव,बटोही या बटौ कैई जाँ,चाहे वील जांण काँईं हो,वीकि मंजिल चाहे क्यै लै हवो,उधैं कैई बटौही जाँ।
  आखिर में कें देखूण चाँ कि 'बटौही आपण पहाड़,गैल पातल,डान-कान,जंगोव-जमीन,गाड़-गध्यार,भिड़-कनाव्,ढुंग-पाथर,बाट् नमस्कार दोस्तों मेरा नाम है देव सती रानीखेत उत्तराखंड से हमारे चैनल मे आपको
कुमाऊनी भाषा से संम्बधित लेख,
कुमाऊनी लेखकों के विचार
कुमाऊनी कविता
कुमाऊनी संस्कृति (त्यार तीज)
कुमाऊनी कल्चर
रंगीलों पहाड़ का प्यारा पर्यावरण
कुमाऊ की प्रसिद्ध रामलीला व
गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरित मानस
सुंदरकांड
एवं भजनों से सम्बधित विडियों देखने हेतु लाईक व सस्क्राईब करेंगें! 

रविवार, 20 जुलाई 2025

चुनाव चिन्ह

!!चुनाव चिन्ह !!
जो उम्मीदवार कभैं नी उठ रत्तिव्यान वी चुनाव चिन्ह छ उगता सुरज निशान!!

 जो उम्मीदवार क नी है रो ब्या उ चुनाव चिन्ह अंगूठी ल्या!!

 जो उम्मीदवार क गौं छ रोड बटी दस किलोमीटर दूर  वी चुनाव चिन्ह छ अंगुर!!

 जो उम्मीदवार कै चै गाड़ी मे फ्रंट सीट वी चुनाव चिन्ह छ ईट!!

जो उम्मीदवार ल बजै है आपूण खेती बाडी़ वी चुनाव चिन्ह छ अनाजै बाली!!

जो उम्मीदवार ल कभैं नी पढ़ किताब वी चुनाव चिन्ह छ कलम दवात!!

जो उम्मीदवार ल नी कर आपण गौंक विकास वी चुनाव चिन्ह छ अन्नानास!!

 जो उम्मीदवार ल जंगोंव नी कर हरि भरी ग्रीन विक चुनाव चिन्ह छ आइसक्रीम!!

जो उम्मीदवार सबूहें लेट वी चुनाव चिन्ह छ कप प्लेट!!

जो उम्मीदवार ल नी काट कभैं आपूंण बाटोंक झाड़ी वीक चुनाव चिन्ह छ  कुल्हाड़ी!!

जो उम्मीदवार ना जाण ना पन्यार उनर चुनाव चिन्ह अनार!!

सबका साथ सबका विकास आपूण बोतल आपूण गिलास

देव सती

बुधवार, 16 जुलाई 2025

हरेला

गेहूं,जौ और मक्का के बीजों से 
होती इसकी शुरुआत है।
डलिया में बोया जाता,अंधेरे मे रखा जाता,
कोई ना कोई बात है।।

बैशाखी, होली की तरह,
कृषि प्रधान त्योहार है।
हमारी सामाजिक,पारिवारिक और
धार्मिक सास्कृतियों का आधार है।।

अन्न,धन-धान्य् और प्रतीक
"हरेला" समृद्धि का ।
अंबर सा ऊंचा,धरती सा विशाल,
दूब सा विस्तार,आशीर्वाद है वृद्धि का ।।
ऋतु परिवर्तन का सूचक,
पर्व हरियाली का होता है।
आशीर्वाद मिलता है बड़ों का,
वातावरण ख़ुशहाली का होता है।।
नौ दिन रहता अँधेरे में, 
पतीशा जाता दसवें दिन ।
तिलक चन्दन अक्षत से अभिमंत्रित होता।
देवों को होता प्रथम अर्पित,
शुरु ना होता पूजा बिन।।
 एक पहल हम सब
मिलकर इस बार करें।
हरेला के पावन पर्व पर,
*वृक्ष लगाकर, धरती का श्रृंगार करें।।*

*आप सभी को हरेला पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं*

देव सती(पहाड़ी बटोही)

शनिवार, 5 जुलाई 2025

श्रीमान हि रा बल्लभ पाठक जी की रचना

आब् मीं घरै रूंल्  
🌹🌿🌹🌿🌹
अहो दाज्यु लछीकाक् च्यल् घर ऐ रौ 
सूट-बूट पैरिबेर् बुलबुलि फटके ल्यैरौ
हाय अंकल हाय आन्टी 
क्याप्-क्याप् कुंण लैरौ 
अहो दाज्यु लछीकाक् .........।
मिकैं मिलि पड़ौ कुंण लागौ हाऊ आर यू 
मिल् इथां-उथां चा कां छ रे यू (कुकूर)
तब कूंणौ यू आर फूल 
मिल् कौ आयि लगैई नि रै कां बटी फुल्ल।
अहो दाज्यू लछीकाक् ......... ।
आंगण में मोवक् थुपुड़ देखिबेर
छी: छी: कूंण लैरौ
यौ गन्दगीक् ढेर घर आघिल् क्यले लगै रौ
अपणि ईज थैं कूंण लैरौ
अहो दाज्यू लछीकाक् ......।
गन्दगीक् ढेर न्हाति प्वथा
जैविक खाद छु यौ
खेतन् में हालिबेर भलौ-भल् नांज 
और साग-पात लै हुंछ यौ खादैल्
जै में स्वाद और मिठास लै हैंछ
और हैंछ तागत, क्यै पगली रौछै
अहो दाज्यू लछीकाक् ......।
हमर् पहाड़ैकि ठन्डि हव
शहर  में कां छू एसि फिजा
होइ इजा सई कुनैछै 
भबरि गयूं शहर जै बै
अहो दाज्यू लछीकाक् ......।
इजा आब् यांई रूंल् 
अपणि खेति कमिन करूल्
गोरु बाछा भैंस बाकर 
पाइ बेर जीवन बचूल्
शहरी जिनगी बेकार छु इजा
आब् मी घरै रूंल , आब् मी घरै रूंल्
अहो दाज्यू लछीकाक् .......।
○•○•○•○•○•○•○•
( हीराबल्लभ पाठक "निर्मल",  
स्वर साधना संगीत विद्यालय