“जल कसै भरूँ जमुना गहरी”
(बुरा ना मानो होली है)
जल कसै भरूँ जमुना गहरी,
य तो हर गौं–गौं क कहानी ठहरी।
गौं को पाणी सूखि गै छै,
नौला–धारा बूसी गै छ,
पर नेता जी क बंगला भितर
रंगों की बरसात हू रै छ।
जल कसै भरूँ जमुना गहरी…
पलायन की बस रोज भरै छ,
छोड़ि गै आँगन–खेत सारी,
ईजा बैठी बाट जोहै,
सूनी भई चौक–द्वारी।
कागज मा विकास छपा छ,
धरती मा बंजर हालत,
भाषण मा हरियाली फूली,
गाँव मा सन्नाटा ही सन्नाट।
जल कसै भरूँ जमुना गहरी…
बानर, सूअर, बाघ डूडाट पड़ छ,
खेत भयो जंगली घर,
हल–बैलों की आवाज मिटी,
किसान शहर मा दर–दर।
स्कूल खुला पर मास्साब गायब,
अस्पताल मा ताला भारी,
फोटो खिंचि गै योजनन की,
जनता फिर भी लाचारी।
जल कसै भरूँ जमुना गहरी…
नेता जी रंग लगै कै बोल्या —
“सब बढ़िया छ, घबराना नी!”
हम बोल्या — “पैली विकास ल्याओ,
फिर बात करौ तरक्की की।”
सुख गयो पाणी गौं को सारा,
पर सूखो नी कुर्सी प्यारा,
जनता जब रंग बदलि दै छ,
हिल जाल दरबार सारा।
जल कसै भरूँ जमुना गहरी…
अब जवाब भी दिणो ठहरी,
होली छ, पर बात गहरी।
बुरा ना मानो होली है —
पर सच को रंग आज गाढ़ो है!
बुरा ना मानों होली है
आंपू सबों के होली क हार्दिक शुभकामनायें
देव सती पहाड़ी बटोही