शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

जल कैसे भरु यमुना गहरी आधुनिक होली कविता

“जल कसै भरूँ जमुना गहरी”
(बुरा ना मानो होली है)
जल कसै भरूँ जमुना गहरी,
य तो हर गौं–गौं क कहानी ठहरी।
गौं को पाणी सूखि गै छै,
नौला–धारा बूसी गै छ,
पर नेता जी क बंगला भितर
रंगों की बरसात हू रै छ।
जल कसै भरूँ जमुना गहरी…
पलायन की बस रोज भरै छ,
छोड़ि गै आँगन–खेत सारी,
ईजा बैठी बाट जोहै,
सूनी भई चौक–द्वारी।
कागज मा विकास छपा छ,
धरती मा बंजर हालत,
भाषण मा हरियाली फूली,
गाँव मा सन्नाटा ही सन्नाट।
जल कसै भरूँ जमुना गहरी…
बानर, सूअर, बाघ डूडाट पड़ छ,
खेत भयो जंगली घर,
हल–बैलों की आवाज मिटी,
किसान शहर मा दर–दर।
स्कूल खुला पर मास्साब गायब,
अस्पताल मा ताला भारी,
फोटो खिंचि गै योजनन की,
जनता फिर भी लाचारी।
जल कसै भरूँ जमुना गहरी…
नेता जी रंग लगै कै बोल्या —
“सब बढ़िया छ, घबराना नी!”
हम बोल्या — “पैली विकास ल्याओ,
फिर बात करौ तरक्की की।”
सुख गयो पाणी गौं को सारा,
पर सूखो नी कुर्सी प्यारा,
जनता जब रंग बदलि दै छ,
हिल जाल दरबार सारा।
जल कसै भरूँ जमुना गहरी…
अब जवाब भी दिणो ठहरी,
होली छ, पर बात गहरी।
बुरा ना मानो होली है —
पर सच को रंग आज गाढ़ो है!
  बुरा ना मानों होली है
आंपू सबों के होली क हार्दिक शुभकामनायें
देव सती पहाड़ी बटोही

बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

ग्वेल ज्यू को समर्पित होली

हॉं हाँ हाँ ग्वेल ज्यू दुदाधारी,
हाँ हाँ हाँ ग्वेल ज्यू …।।
न्याय के धनी दरबार तुम्हारो,
घंटीऽऽ बाजें भारीऽऽ…
अरज सुनो जी भक्तों की तुम,
लीजो खबर हमारीऽऽ…

चंपावत धरती पावन भई रे,
जन्म लियो अवतारीऽऽ…
भक्तन की अरज सुनी झटपट,
फरियाद हमारी
सफेद घोड़ा सवार भए आयो
छवि लागे अति प्यारी

ढोल दमाऊँ बाजन लागे
रंग उडें अति भारी
अबीर गुलाल उडा़वन लागे
होली खेलें अति न्यारी

अल्मोड़ा बटि गूँजी होली,
चितई घंटी बाजें भारीऽऽ…
नैनीताल घोड़ाखाल में,
छवि लागे अति प्यारीऽऽ…

बागेश्वर-पिथौरागढ़ गावे होली ,
महिमा अपरंपारीऽऽ…
तराई ऊधमसिंह नगर में,
रंग बरसे अति न्यारीऽऽ…

देहरादून हरिद्वार धुन में,
गंगा बहे सुधारीऽऽ…
पौड़ी-टिहरी-रुद्रप्रयाग में,
जय-जयकार तुम्हारीऽऽ…

चमोली-उत्तरकाशी गावें,
हिम छाया सुखकारीऽऽ…
कुमाऊँ-गढ़वाल एक सुर भये,
होली खेलन हारीऽऽ…

आऽऽऽ हाँ हाँ हाँऽऽऽ…
रंग भरो न्याय की झोली…
जय-जय ग्वेल ज्यू दुदाधारी…
देव सती पहाड़ी बटोही

सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

पहाड़ कै छोडबैर शहर जाण पडो़

पहाड़ के छोडबैर शहर जाण पडो़
मन नी लाग वा पर लगूण पडो़
बाजे बोटों को छॉव बाखई की बात
सब मूबैलें की स्क्रीन मे खोजण पडो़
ईजा की रोटी मडूव रव्टाक स्वाद
या पिज्जा बर्गर गव उतारण पडो़
गौं मा खेत सूख गया गध्यार रुठ गया
कागजों मे विकास छपाण पडो़
नेता मंच बटि छाती ठोकी बोली गयो
रोजगार भरमार पलायन रुकी गयो
जाणि कस तुमार ख्वर बज्जर पडो़
गौ मा स्कूल छ मास्टर न्हैती
अस्पताल छ डाक्टर न्हैती
रिपोर्ट मे चकाचक जमीनें धूल उडी़ पडो़
फार्म ले भरो और फीस ले भरो
लेन मे खालि ठाड़ दिन गवाण पडो़
फिर रिजल्ट ले स्थगित है ई पडो़
डिग्री हाथ मे छ जैब छ खाली
नेताओं लिजी खालि बजाओ ताली
नि मिलेरई नानि जा न्हैती नौकरी सरकारी
रुजगारे चक्करम पलायन है ई पडो़
राजनीति क पैट भराण खातिर
हम भीड़ मे भीतेर घूसीण पडो़
वोट दिन तका दिन भर लैनों मे ठाड़
फिर पॉच बरस भुलाण पडो़
जब जड़ पूर सूख जाल
तब पहाड़ के हिलाण पडो़
लेखी है लो कागज म
तबै ते बूलाण पडो़
भलि लागली य बाता
कमेंट करना रया
विडीयो के आघिल सरकाते रया
आज मन नी लाग शहर मा
पर पेट खातिर झुकाण पड़ो।
जड़ सूखगीं जब मातृभूमि की
तब पत्थर के ले  हिलाण पड़ो।
जब जागि जाल नौजवान
तब सत्तन क सिंहासन डोलाण पड़ो।
झूठ क कागज फट जाल जो दिन मे
सच क मूछ्याव फिर जलाण पड़ो।
अब चुप बैठणो पाप होलो
आवाज के उठाण पड़ो।
अपणों हक, अपणों पहाड़ खातिर
भीड़ नि, तूफान बनाण पड़ो।
नारों  सिर्फ लगाणे ले  नी होलो,
हक सच में दिलाण पडलों।
जगाण पड़ो, ललकारण पड़ो,
अब पहाड़ के  बचाण पड़ो
@देव सती पहाड़ी बटोही